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    <title>منتظری</title>
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    <description></description>
    <language>fa</language>
          <item>
    <title>خائنان، فاسدها، و  بی‌ترمزها</title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/politics/2013/02/17/24604</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/politics/2013/02/17/24604&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-nevisandeh&quot;&gt;
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                    مجید محمدی        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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                    &lt;img  class=&quot;imagefield imagefield-field_maghaleh_image&quot; width=&quot;1500&quot; height=&quot;1000&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/sites/default/files/kha.jpg?1361110600&quot; /&gt;        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;مجید محمدی &amp;ndash; آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای در سخنانی که پیرامون رویدادهای روز استیضاح وزیر کار در مجلس &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;و حمله به لاریجانی در قم&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; بیان کرد، عملا نزدیکان و وفاداران به حکومت را به سه دسته تقسیم کرد. او هیچ&amp;zwnj;گاه در یک سخنرانی، نیروهای وفادار به حاکمیت را این چنین ننواخته بود. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای این سه گروه را به ترتیب زیر دسته&amp;zwnj;بندی کرد:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) مقامات بالا که بی&amp;zwnj;صلاحیت و خلافکار هستند. او قبلا آنها را در صورت عمومی کردن اختلافات خود خائن و &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;بداخلاق و سپس ناقض شرع و اخلاق و قانون نامیده بود&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;نزدیکان مقامات و مدیران آنها که فاسدند و مقامات بالا یا فساد آنها را نادیده می&amp;zwnj;گیرند یا با این فساد همراهی می&amp;zwnj;کنند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) ن&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;یروهای بسیجی و لباس شخصی (نور چشمان نظام و حافظ همیشگی آن) که ترمز بریده&amp;zwnj;اند و صرفا بر اساس دستوراتی که از بیت می&amp;zwnj;آید دست به سرکوب و حمله نمی&amp;zwnj;زنند. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;برادرانی که رفتند&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;علی خامنه&amp;zwnj;ای برای آن که با هم نسلان خود در زمینه حرف&amp;zwnj;شنوی و رعایت مطلقه&amp;zwnj;خواهی و فصل&amp;zwnj;الخطاب بودن درگیری نداشته باشد، یک به یک آنها را به تدریج حذف کرد. رفسنجانی، &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;کروبی، موسوی،&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;موسوی خویینی&amp;zwnj;ها&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;، خاتمی، عبدالله نوری، حسینعلی منتظری و نسلی از نزدیکان به خمینی یک به یک متهم، محاکمه، زندانی، برکنار و مطرود شدند و برچسب&amp;zwnj;هایی مثل فتنه&amp;zwnj;گر، بی&amp;zwnj;بصیرت، سران جنگ نرم و مانند آنها خوردند. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای تلاش کرد از طریق انتصابات یا انتخابات مهندسی شده، به جای این چهره&amp;zwnj;ها، افرادی &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۰&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; تا &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۰&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; سال جوان&amp;zwnj;تر از آنها و از نسلی بر سر کار آورد که در انقلاب نیز مشارکتی جدی نداشتند و طعم زندان و شکنجه و حکومت استبدادی پهلوی را نچشیده بودند. این گروه کسانی هستند که باید:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) روش&amp;zwnj;های او را با حکومت پهلوی مقایسه نکنند،&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) از خود نیز مشروعیتی نداشته باشند تا هر چه دارند از خامنه&amp;zwnj;ای بدانند،&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) با پیروی از اصل پیرسالاری از وی اطاعت مطلق کنند. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;رهبر&amp;zwnj;ی با دست&amp;zwnj;های بسته&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;انتظار خامنه&amp;zwnj;ای از نسل جوان&amp;zwnj;تر نیروهایی که می&amp;zwnj;خواهند قهرمان مسابقه&amp;zwnj;ای بی رقیب باشند برآورده نشد. (مثل دیکتاتور فیلم ساشا بارون کوهِن که در مسابقه&amp;zwnj; دو، رقبای خود را با تیر اندازی به سوی آنها حذف می&amp;zwnj;کرد تا قهرمان شود). &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/dava.jpg&quot; style=&quot;width: 180px; height: 114px; float: right;&quot; /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;انتظار خامنه&amp;zwnj;ای از نسل جوان&amp;zwnj;تر نیروهایی که می&amp;zwnj;خواهند قهرمان مسابقه&amp;zwnj;ای بی رقیب باشند برآورده نشد. اکنون همکاران جوان&amp;zwnj;تر او بیش از همکاران گذشته بر وی می&amp;zwnj;شورند. او یک روز جدال آنها بر سر قدرت و ثروت بیشتر را &amp;quot;خیانت&amp;quot;، روزی دیگر بداخلاقی و در جایی دیگر خلاف شرع و اخلاق می&amp;zwnj;خواند اما در این میان، گوشی بدهکار نیست. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;اکنون همکاران جوان&amp;zwnj;تر او بیش از همکاران گذشته بر وی می&amp;zwnj;شورند. او یک روز جدال آنها بر سر قدرت و ثروت بیشتر را &amp;quot;خیانت&amp;quot;، روزی دیگر بد اخلاقی و در جایی دیگر خلاف شرع و اخلاق می&amp;zwnj;خواند اما در این میان، گوشی بدهکار نیست. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;روسای سه قوه&amp;zwnj; نظام ولایت کارهایی می&amp;zwnj;کنند که اگر مردم عادی آنها را انجام دهند محاکمه می&amp;zwnj;شوند: &amp;laquo;در این ماجرا متأسفانه رئیس یک قوه به استناد یک اتهام ثابت نشده و حتی مطرح نشده در دادگاه، دو قوه دیگر یعنی مجلس و قوه قضاییه را متهم ساخت که کاری بد، &amp;zwnj;غلط، نامناسب، خلاف شرع، خلاف قانون و خلاف اخلاق بود.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;آنها کارهایی می&amp;zwnj;کنند که به قول رهبر کشور ایجاد تنش و تشویش در جامعه می&amp;zwnj;کند و ارتکاب آنها مجازات دو تا شش سال زندان دارد: &amp;laquo;این رفتار، حقوق اساسی مردم را نیز تضییع کرد چرا که زندگی در آرامش و امنیت روانی و اخلاقی، جزو حقوق اساسی ملت است.&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقامات بالای حکومتی همچنین تعهد خود در انجام وظایف خاصی را نقض کرده&amp;zwnj;اند. &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای می&amp;zwnj;گوید&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;: &amp;laquo;اما این رفتارها، متناسب با سوگندها و تعهدات نیست.&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;با این همه او &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;چون می&amp;zwnj;داند که سخنان و توصیه&amp;zwnj;هایش خطاب به مقامات با بی&amp;zwnj;توجهی روبرو می&amp;zwnj;شود، مجبور است آنها را با خواست خدا گره بزند: &amp;laquo;ان&amp;zwnj;شاءالله این نصیحت خیرخواهانه و مشفقانه مورد توجه مسئولان بخصوص مسئولان بالا قرار گیرد و به آن پایبند باشند.&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;او البته پس از آن که سخنانش توسط روسای قوا نادیده گرفته شد، عقب نشینی می&amp;zwnj;کند: &amp;laquo;بنده فعلاً نصیحت می&amp;zwnj;کنم که این کار شایسته&amp;zwnj;ای برای نظام جمهوری اسلامی نیست.&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;او از یک سو رئیس قوه&amp;zwnj; مقننه را تقبیح می&amp;zwnj;کند: &amp;laquo;استیضاح باید فایده&amp;zwnj;ای داشته باشد اما چند ماه مانده به پایان کار دولت، &amp;zwnj;استیضاح یک وزیر آن هم به خاطر مسئله&amp;zwnj;ای که مربوط به وزیر نیست، &amp;zwnj;چه علت و فایده&amp;zwnj;ای دارد؟... در داخل مجلس هم کسانی حرف&amp;zwnj;های نامناسب بر زبان آوردند که آن هم غلط بود... دفاع رئیس محترم مجلس هم قدری زیاده روی بود و لزومی نداشت.&amp;raquo; و از طرف دیگر، کار رئیس قوه&amp;zwnj; مجریه را &amp;laquo;بد، غلط، نامناسب، خلاف شرع، خلاف قانون و خلاف اخلاق&amp;raquo; می&amp;zwnj;خواند تا در این میان بی&amp;zwnj;طرف جلوه کند.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;رهبری که به مدیریت خرد امور در &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۳&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; سال گذشته مشغول بوده، یکباره ظاهرا از کنش دست بر می&amp;zwnj;دارد چون در عین محکوم کردن رفتار سران دو قوه از برکناری آن&amp;zwnj;ها ناتوان است: &amp;laquo;نه آن متهم کردن، نه آن برخورد کردن و نه آن استیضاح، &amp;zwnj;مسائل مناسبی نبود.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/kafan.jpg&quot; style=&quot;width: 180px; height: 119px; float: right;&quot; /&gt;خامنه&amp;zwnj;ای که &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۶&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; سال دو دولت رفسنجانی و خاتمی را با به میدان آوردن کفن&amp;zwnj;پوشان و نیروهای لباس شخصی از حرکت&amp;zwnj;هایی باز می&amp;zwnj;داشت که مورد نظرش نبود، اکنون با گروه&amp;zwnj;هایی مواجه است که همین کار را با نیروهای وفادار به خودش &amp;nbsp;می&amp;zwnj;کنند و ممکن است روزی به سراغ خود او نیز بیایند.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای رفتار&amp;zwnj;های سران سه قوه را از هر نظر محکوم کرده اما از برکناری و تغییر آنها ناتوان است. او همچنین می&amp;zwnj;داند که اگر جای این سه نفر هر کس دیگری را بیاورد آنها نیز همین یا بدتر خواهند بود. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;منصوبان فاسد و نزدیکان فاسد آنها&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای می&amp;zwnj;گوید&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;:&lt;/span&gt; &lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;چند سال قبل درباره مبارزه با فساد اقتصادی، نامه&amp;zwnj;ای به رؤسای قوا نوشتم مکرر می&amp;zwnj;گویند فساد اقتصادی اما این کار به زبان گفتن تمام نمی&amp;zwnj;شود بلکه نیازمند مبارزه عملی است، در عمل چه کار شد؟ در عمل چه کار کردید؟ &amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;سوال خامنه&amp;zwnj;ای از جنس استفهام انکاری است بدین معنا که فساد در ایران تعقیب نمی&amp;zwnj;شود و ظاهرا نشدنی است. او از یک سو باید از منصوبان فاسد و نزدیکان فاسد آنها دفاع کند یا برخی از آنها را به حال خود وابگذارد، اما از سوی دیگر مجبور است خود را از فساد با سخنانی از این دست مبرا سازد.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;بی&amp;zwnj;ترمزها&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای که &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۶&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; سال دو دولت رفسنجانی و خاتمی را با به میدان آوردن کفن&amp;zwnj;پوشان و نیروهای لباس شخصی از حرکت&amp;zwnj;هایی باز می&amp;zwnj;داشت که مورد نظرش نبودند، اکنون با گروه&amp;zwnj;هایی مواجه است که همین کار را با نیروهای وفادار به خودش &amp;nbsp;می&amp;zwnj;کنند و ممکن است روزی به سراغ خود او نیز بیایند.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;او به درستی از این تحول نگران است: &amp;laquo;البته گله امروز من از برخی سران و مسئولان موجب نشود عده&amp;zwnj;ای راه بیفتند و علیه این و آن شعار دهند که با این کار هم مخالف هستیم.&amp;raquo; او هم&amp;zwnj;چنین می&amp;zwnj;داند گروه&amp;zwnj;هایی از این بسیجی&amp;zwnj;ها و لباس شخصی&amp;zwnj;ها که &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;نماینده&amp;zwnj;اش&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; در روزنامه کیهان آنها را بی&amp;zwnj;ترمز&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; می&amp;zwnj;نامد، به هشدارهای وی توجهی نخواهند کرد: &amp;laquo;کسانی که راه می&amp;zwnj;افتند و شعار می&amp;zwnj;دهند اگر واقعاً حزب&amp;zwnj;اللهی و مؤمن هستند بدانند که این کارها به ضرر کشور و خلاف شرع است و اگر هم اعتنایی به این حرفها ندارند که حسابشان جداست.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
	&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای برچسب&amp;zwnj;زنی و اتهام&amp;zwnj;زنی را تنها برای خود می&amp;zwnj;خواهد و حمله به افراد را صرفا بر اساس اشارات خود. او متوجه نیست که وقتی قطار برچسب&amp;zwnj;زنی و حمله به راه افتاد، همه سوار آن می&amp;zwnj;شوند و همه از آن متضرر خواهند شد: &amp;laquo;این&amp;zwnj;که عده&amp;zwnj;ای برخی را ضد ولایت و ضد بصیرت بنامند و شعار بدهند نظیر آنچه اخیراً در قم روی داد، اقدامی غلط است و بنده کاملاً مخالف این کارها هستم که قبلاً هم نظیر آن در مرقد مطهر حضرت امام اتفاق افتاد و به مسئولان تذکر دادم جلوی این کارها را بگیرند.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;این در حالی است که گوش احمدی&amp;zwnj;نژاد&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; و طرفدارانش به &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;نبوده و نیست و آنها در هر دوره یکی از گروه&amp;zwnj;ها یا جناح&amp;zwnj;های قدرت را هدف قرار می&amp;zwnj;دهند. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
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     <comments>https://archive.radiozamaneh.com/politics/2013/02/17/24604#comments</comments>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/taxonomy/term/19366">بسیجی</category>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/taxonomy/term/2987">خاتمی</category>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/taxonomy/term/3276">خامنه‌ای</category>
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 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/taxonomy/term/19090">مجید محمدی</category>
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 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/politics">گوی سیاست</category>
 <pubDate>Sun, 17 Feb 2013 14:16:40 +0000</pubDate>
 <dc:creator>politics</dc:creator>
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    <title>اوج بحران؟ نظام در آستانه‌ی فروپاشی؟ </title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/politics/2013/02/07/24289</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/politics/2013/02/07/24289&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-nevisandeh&quot;&gt;
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                    اکبر گنجی        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اکبر گنجی &amp;ndash; افشاگری احمدی&amp;zwnj;نژاد در باره ملاقات فاضل لاریجانی و سعید مرتضوی در جلسه استیضاح وزیر کار، بازداشت سعید مرتضوی و آزادی او پس از ۲۴ ساعت، انتشار فیلم کامل ملاقات لاریجانی و مرتضوی و حملات متقابل احمدی&amp;zwnj;&amp;zwnj;نژاد و لاریجانی به یکدیگر، برخی را به این نتیجه رسانده که آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای دیگر قادربه مدیریت بحران نیست.&lt;/p&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;افشاگری احمدی&amp;zwnj;نژاد درباره&amp;zwnj; ملاقات فاضل لاریجانی و سعید مرتضوی در جلسه&amp;zwnj; استیضاح وزیر کار در ۱۵/۱۱/۹۱، پاسخ متقابل علی لاریجانی، انتشار فیلم&amp;zwnj;های ملاقات لاریجانی و سعید مرتضوی، انتشار فیلم کامل پاسخ علی لاریجانی به احمدی&amp;zwnj;نژاد، بازداشت سعید مرتضوی در شامگاه ۱۶/۱۱/۹۱، واکنش تند محمود احمدی نژاد (&amp;quot;&lt;a href=&quot;http://www.president.ir/fa/44888&quot;&gt;قوه قضائيه بايد متعلق به ملت و نه يک سازمان ويژه خانوادگی باشد&lt;/a&gt;&amp;quot;)، &lt;a href=&quot;http://www.farsnews.com/newstext.php?nn=13911117001443&quot;&gt;ملاقات&lt;/a&gt; رئیس قوه&amp;zwnj; قضائیه با آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای در ۱۷/۱۱/۹۱، آزادی سعید مرتضوی پس از ۲۴ ساعت، اعلان این که: &amp;quot;&lt;a href=&quot;http://www.aryanews.com/Lct/fa-ir/News/20130204/20130204135103778.htm&quot;&gt;احمدی نژاد يک برگ از هزار برگی که درباره تخلفات افراد در اختيار دارد را منتشر کرد&lt;/a&gt;&amp;quot;، سخنان &lt;a href=&quot;http://farsnews.com/newstext.php?nn=13911118000599&quot;&gt;صادق لاریجانی&lt;/a&gt; مبنی بر این که: &amp;quot;نسبت&amp;zwnj;های رئیس&amp;zwnj;جمهور را کذب و افترا و برخلاف تمام موازین شرعی و قانونی و جرم می&amp;zwnj;دانم و در فرصتی دیگر ماهیت جریان&amp;zwnj;های انحراف و فتنه و فساد اقتصادی و عقیدتی و عملی آنان را فاش خواهم کرد&amp;quot; و ادامه&amp;zwnj; این نزاع&amp;zwnj;های جدید، برخی را به این نتیجه رسانده که گویی در وضعیت جدیدی قرار داریم و آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای دیگر قادر به مدیریت بحران نیست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;پیرامون این رویدادها چند نکته قابل ذکر است:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;یکم-&lt;/strong&gt; تک تک گروه&amp;zwnj;های مخالف از ابتدای انقلاب به بعد، فقط و فقط نزاع خود با زمام&amp;zwnj;داران جمهوری اسلامی را واقعی و نزاع دیگران را &amp;quot;خیمه شب بازی&amp;quot; یا &amp;quot;جنگ زرگری&amp;quot; قلمداد کرده و می&amp;zwnj;کنند. درباره&amp;zwnj; نزاع&amp;zwnj;های احمدی نژاد با اصول&amp;zwnj;گرایان و آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای نیز این مدعا از سوی بسیاری طرح شد. اما جنگ بر سر منابع کمیاب قدرت/ثروت/معرفت/منزلت اجتماعی از ابتدای جمهوری اسلامی وجود داشته و همیشه واقعی و جدی بوده است، نه بازی.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;این نزاع&amp;zwnj;ها را به یاد بیاورید: نزاع با مهندس بازرگان و نهضت آزادی، نزاع با سازمان مجاهدین خلق و بنی صدر، نزاع با گروه&amp;zwnj;های مارکسیستی، نزاع خامنه&amp;zwnj;ای و میرحسین موسوی، نزاع آیت&amp;zwnj;الله منتظری با آیت&amp;zwnj;الله خمینی، نزاع چپ و راست مذهبی و حذف چپ&amp;zwnj;ها پس از درگذشت آیت&amp;zwnj;الله خمینی (طرح شعار: &amp;quot;دشمن هاشمی دشمن پیغمبر است&amp;quot; در این دوران)، نزاع راست&amp;zwnj;ها و انشقاق کارگزاران سازندگی از راست&amp;zwnj;های سنتی، نزاع اصول&amp;zwnj;گرایان و اصلاح&amp;zwnj;طلبان، نزاع احمدی&amp;zwnj;نژاد با طبقه&amp;zwnj; حاکمه&amp;zwnj; دوران ماقبل خود، نزاع با سبزها به رهبری موسوی و کروبی، نزاع احمدی&amp;zwnj;نژاد و خامنه&amp;zwnj;ای.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;دوم-&lt;/strong&gt; برخی این گمان را می&amp;zwnj;پراکنند که این سطح از نزاع در گذشته وجود نداشته و جنگ قدرت فعلی نظام را به سوی فروپاشی سوق می&amp;zwnj;دهد. شیرازه&amp;zwnj; امور پاشیده است و نزاع&amp;zwnj;ها نمادی از فروپاشی رژیم&amp;zwnj;اند. اما عمر ۳۳ ساله&amp;zwnj; جمهوری اسلامی در تعارض با این مدعا قرار دارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;نزاع بنی صدر و حزب جمهوری اسلامی را به یاد آورید که ماه&amp;zwnj;ها طول کشید. آیت&amp;zwnj;الله خمینی می&amp;zwnj;کوشید تا اختلاف قوا را حل کند و طرفین بدون اعتنا به فرامین او به جنگ علنی ادامه می&amp;zwnj;دادند. آیت&amp;zwnj;الله خمینی تا یک ماه قبل از عزل بنی صدر از فرماندهی کل قوا، همچنان از او حمایت می&amp;zwnj;کرد. اما وقتی نزاع&amp;zwnj;ها از حدی عبور کرد، در یک سخنرانی علنی در دیدار با نمایندگان مجلس شورای اسلامی، خطاب به بنی صدر گفت: &amp;laquo;نمی&amp;zwnj;شود از شما پذیرفت که ما قانون را قبول نداریم.&lt;em&gt; &lt;strong&gt;غلط می&amp;zwnj;کنی قانون را قبول نداری&lt;/strong&gt;! &lt;/em&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;قانون تو را&lt;/em&gt; &lt;em&gt;قبول ندارد&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; نباید از مردم پذیرفت، از کسی پذیرفت، ما شورای نگهبان را قبول نداریم. نمی&amp;zwnj;توانی قبول نداشته باشی.&amp;raquo; (&lt;em&gt;صحیفه امام&lt;/em&gt;، جلد ۱۴، ص ۳۷۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/org-z13059674890ca7522d698e4a1b687a9bf0d74a8213d6082e0f.jpg&quot; style=&quot;width: 180px; height: 141px; float: right;&quot; /&gt;جنگ علنی قدرت یکی از ارکان این رژیم است. به تعبیر ذات گرایانه- رژیم&amp;zwnj;های سیاسی فاقد ذات ارسطویی اند- جنگ بر سر منابع کمیاب قدرت/ثروت/معرفت/منزلت اجتماعی؛ ذاتی جمهوری اسلامی است. گویی رژیم از این منبع تغذیه کرده و این نزاع&amp;zwnj;ها بدان انرژی می&amp;zwnj;بخشد. اگرچه ولی فقیه به عنوان فصل&amp;zwnj;الخطاب در بالا وجود دارد و در موقع مقتضی تصمیم نهایی را اتخاذ خواهد کرد.&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;تصویب عدم کفایت سیاسی بنی صدر که با ۳۰ خرداد ۱۳۶۰ همراه شد، هزاران کشته برجای نهاد. مسعود رجوی اعلام کرد که در یک ساله&amp;zwnj; پس از ۳۰ خرداد ۱۳۶۰، سازمان مجاهدین خلق بیش از دو هزار تن را ترور کرده و به قتل رسانده است. رژیم هم متقابلاً صدها تن را در همان مدت اعدام کرد. آن نزاع به شدت خونبار- که ضمن حملات تروریستی سازمان مجاهدین تعدادی زیادی از سران رژیم (رئیس جمهور، نخست وزیر، رئیس قوه&amp;zwnj; قضائیه، وزرا، نمایندگان مجلس و...) کشته شدند- موجب سرنگونی رژیم نشد و آنان با تشدید سرکوب و جایگزین کردن افراد جدید به بقای خود ادامه دادند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;نزاع آیت&amp;zwnj;الله منتظری با آیت&amp;zwnj;الله خمینی به عزل آیت&amp;zwnj;الله منتظری از رهبری آینده جمهوری اسلامی منتهی شد. آیت&amp;zwnj;الله خمینی برای عزل آیت&amp;zwnj;الله منتظری- در نامه&amp;zwnj; ۶/۱/۶۸- تمامی فضیلت&amp;zwnj;های اخلاقی را زیر پا نهاد و نوشت: &amp;laquo;روشن شده است که شما این کشور و انقلاب اسلامی عزیز مردم مسلمان ایران را پس از من به دست لیبرال&amp;zwnj;ها و از کانال آنها به منافقین می&amp;rlm;سپارید، شما در اکثر نامه&amp;rlm;ها و صحبت&amp;zwnj;ها و موضعگیری&amp;zwnj;هایتان نشان دادید که معتقدید لیبرال&amp;zwnj;ها و منافقین باید بر کشور حکومت کنند، مطالبی که می&amp;rlm;&amp;zwnj;گفتید دیکته شده منافقین بود، در همین دفاعیۀ شما از منافقین تعداد بسیار معدودی که در جنگ مسلحانه علیه اسلام و انقلاب محکوم به اعدام شده بودند را منافقین از دهان و قلم شما به آلاف و الوف رساندند، چه خدمت ارزنده&amp;rlm;ای به استکبار کرده&amp;zwnj;&amp;rlm;اید، مسلماً منافقین صلاح نمی&amp;rlm;دانند و شما مشغول به نوشتن چیزهایی می&amp;rlm;شوید که آخرت&amp;zwnj;تان را خرا&amp;zwnj;ب&amp;zwnj;تر می&amp;rlm;کند، افراد بیت خود را عوض کنید تا سهم مبارک امام بر حلقوم منافقین و گروه مهدی هاشمی و لیبرا&amp;zwnj;ها نریزد، شاید خدا از سر تقصیرات شما بگذرد، برای این که در قعر جهنم نسوزید خود اعتراف به اشتباه و گناه کنید، شاید خدا کمکتان کند، اگر این گونه کارهاتان را ادامه دهید مسلماً تکلیف دیگری دارم و می&amp;rlm;دانید که از تکلیف خود سرپیچی نمی&amp;rlm;کنم.&amp;raquo; (&lt;em&gt;صحیفه امام&lt;/em&gt;، جلد ۲۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بعدها هم آن مرد آزاده را به مدت ۵ سال در منزلش زندانی کردند. آیت&amp;zwnj;الله منتظری دارای پایگاه اجتماعی قوی و حامیان بسیار در ساختار سیاسی بود. اما جمهوری اسلامی این بحران را هم پشت سر نهاد و خامنه&amp;zwnj;ای به جای آیت&amp;zwnj;الله منتظری جانشین آیت&amp;zwnj;الله خمینی شد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;حرکت اعتراضی پس از انتخابات ریاست جمهوری ۲۲ خرداد ۱۳۸۸ که با هزاران بازداشت و ده&amp;zwnj;ها کشته، در نهایت به حصر موسوی و کروبی و رهنورد انجامید، حرکت کوچکی نبود. بسیاری از وزرا، نمایندگان مجلس و معاونان وزرای قبلی بازداشت و به حبس&amp;zwnj;های طولانی مدت محکوم شدند. بسیاری از تحلیل&amp;zwnj;گران خارجی و افراد و گروه&amp;zwnj;های اپوزیسیون ایران، کار رژیم را تمام شده تلقی می&amp;zwnj;کردند. اما خامنه&amp;zwnj;ای حرکت سبز را سرکوب کرد و اوضاع را به حالت عادی باز گرداند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بدین ترتیب، جمهوری اسلامی جنگ قدرت&amp;zwnj;های حادتر از این را هم پشت سر نهاده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;دوم- &lt;/strong&gt;جنگ علنی قدرت یکی از ارکان این رژیم است. به تعبیر ذات گرایانه- رژیم&amp;zwnj;های سیاسی فاقد ذات ارسطویی اند- جنگ بر سر منابع کمیاب قدرت/ثروت/معرفت/منزلت اجتماعی؛ ذاتی جمهوری اسلامی است. گویی رژیم از این منبع تغذیه کرده و این نزاع&amp;zwnj;ها بدان انرژی می&amp;zwnj;بخشد. اگرچه ولی فقیه به عنوان فصل&amp;zwnj;الخطاب در بالا وجود دارد و در موقع مقتضی تصمیم نهایی را اتخاذ خواهد کرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;سوم-&lt;/strong&gt; این وجه جمهوری اسلامی را با رژیم&amp;zwnj;های دیکتاتوری موجود (روسیه، چین، کوبا، عربستان سعودی، قطر، امارات، و...) مقایسه کنید. آنان یا فاقد این شکل از نزاع&amp;zwnj;اند و یا جنگ قدرت مطلقا در این سطح در آنها دیده نمی&amp;zwnj;شود. رژیم&amp;zwnj;های محمدرضا پهلوی، صدام حسین، قذافی، حافظ اسد، حسنی مبارک، بن علی، کره&amp;zwnj; شمالی و... یک&amp;zwnj;پارچگی تمام عیاری از خود به نمایش می&amp;zwnj;گذاردند. این تفاوت اساسی جمهوری اسلامی با دیگر رژیم&amp;zwnj;های استبدادی، دارای کارکردهای مثبت و منفی است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;چهارم- &lt;/strong&gt;رژیم&amp;zwnj;های استبدادی مردم را سرکوب کرده و نمی&amp;zwnj;گذارند تا آنان از سیاست&amp;zwnj;ها و زمامداران انتقاد کرده و فسادهای حکومت را برملا سازند. این امر موجب می&amp;zwnj;شود تا حجم عظیمی انرژی جمع شده و در وقت مناسب (به عنوان مثال در وضعیت انقلابی) به صورت انفجاری خود را ظاهر سازد. اما جنگ قدرت جمهوری اسلامی کار را معکوس کرده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/ahmadinejad-khamenei8.jpg&quot; style=&quot;width: 180px; height: 132px; float: right;&quot; /&gt;خامنه&amp;zwnj;ای هم چنان بر این سر است که چند ماه باقی مانده&amp;zwnj; ریاست جمهوری احمدی نژاد را &amp;quot;تحمل&amp;quot; کرده و نگذارد او به قهرمانی سیاسی تبدیل شود. احمدی&amp;zwnj;نژاد می&amp;zwnj;کوشد با کشاندن نزاع به مردم، آنان را به سود خود و علیه طبقه&amp;zwnj; حاکمه&amp;zwnj; فاسد سه دهه&amp;zwnj; گذشته بسیج کند. در نزاع احمدی&amp;zwnj;نژاد و اصول&amp;zwnj;گرایان، گذشت زمان به سود آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای و به زیان احمدی&amp;zwnj;نژاد است.&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;زمام&amp;zwnj;داران اصلی در قلمرو عمومی به افشاگری علیه یکدیگر پرداخته و فسادها را برملا می&amp;zwnj;سازند. اگر مردم و مخالفان قصد دارند فریاد برآورند که مسئولان دزد هستند، رئیس جمهور با فیلم&amp;zwnj;های رنگی و در پشت تریبون مجلس فسادهای سران قوا را افشا می&amp;zwnj;کند. اگر می&amp;zwnj;خواهند فاسد یاران رئیس جمهور بر زبان آورند، دو قوه&amp;zwnj; دیگر (قضائیه و مجلس) این کار را برای آنها انجام می&amp;zwnj;دهند. اگر مقصودشان افشای طرح مدل &amp;quot;پوتین- مدودف&amp;quot; در ایران است، نمایندگان مجلس رژیم این هدف احمدی&amp;zwnj;نژاد را برملا می&amp;zwnj;سازند. اگر آرزوی شان سخن گفتن درباره&amp;zwnj; نقش مجتبی- فرزند آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای- در ساختار سیاسی است، حداد عادل به جای همه شایعات را طرح کرده و به عنوان پدر زن پاسخ می&amp;zwnj;گوید.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اگر مخالفان می&amp;zwnj;کوشیدند تا کشتن زندانیان سیاسی در تابستان ۶۷ برملا سازند، قائم مقام رهبری طی نامه&amp;zwnj;های شدیداللحن به آیت&amp;zwnj;الله خمینی به افشای این مسئله و پیامدهای حکم او پرداخته بود. اگر می&amp;zwnj;خواهید خاندان هاشمی رفسنجانی را بکوبید، عضو کمیسیون اصل ۹۰ مجلس در نطق علنی از &amp;quot;خاندان اختاپوسی&amp;quot; او سخن می&amp;zwnj;گوید. اگر می&amp;zwnj;خواهید علیه آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای حرف بزنید، زندانیان سیاسی به طور مداوم نامه&amp;zwnj;های سرگشاده علیه او منتشر می&amp;zwnj;سازند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بدین ترتیب، میزان زیادی از انرژی انفجاری آزاد می&amp;zwnj;گردد. به اپوزیسیون مقیم خارج بنگرید که همگی در حال توزیع فیلم سخنان احمدی&amp;zwnj;نژاد، علی لاریجانی، فاضل لاریجانی و سعید مرتضوی هستند. احمدی&amp;zwnj;نژاد که هیچ نهادی- از جمله رهبری- را به رسمیت نمی&amp;zwnj;شناسد، همه را فاسد و خود را نماد پاکی قلمداد می&amp;zwnj;کند، گامی پیش نهاده و از جلسات خصوصی مسئولان فیلم گرفته و منتشر می&amp;zwnj;سازد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;پنجم-&lt;/strong&gt; وضعیت کنونی ایران با گذشته دارای تفاوتی بنیادین است. ایران اینک تحت تحریم&amp;zwnj;های اقتصادی فلج کننده قرار دارد. دولت&amp;zwnj;های غربی به رهبری دولت آمریکا روز به روز کار را بر ایران و ایرانیان سخت تر و حیات و ممات را دشوارتر خواهند کرد. با این همه، آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای همچنان سرسختی کرده و دعوت&amp;zwnj;های اوباما و بایدن برای مذاکره&amp;zwnj; مستقیم ایران و آمریکا را رد می&amp;zwnj;کند. یعنی، جنگ قدرت داخلی، در بستری که جمهوری اسلامی تحت شدیدترین فشارهای تاریخ خود قرار گرفته، روی می&amp;zwnj;دهد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای آن قدر مغرور است که گمان می&amp;zwnj;کند توازن قوا در سطح منطقه و داخل کاملاً به سود او پیش می&amp;zwnj;رود و از این گردنه هم عبور خواهد کرد. آیا این ارزیابی صادق است؟ او هم چنان بر این سر است که چند ماه باقی مانده&amp;zwnj; ریاست جمهوری احمدی نژاد را &amp;quot;تحمل&amp;quot; کرده و نگذارد او به قهرمانی سیاسی تبدیل شود. اگر چه بارها اصول&amp;zwnj;گرایان اعلام کرده&amp;zwnj;اند که به فرمان آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای این مدت را تحمل می&amp;zwnj;کنند، اما در شرایطی که آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای و پیروانش دلایل تحمل &amp;quot;خیانت&amp;quot; را به مردم توضیح نمی&amp;zwnj;دهند، احمدی&amp;zwnj;نژاد می&amp;zwnj;کوشد با کشاندن نزاع به مردم، آنان را به سود خود و علیه طبقه&amp;zwnj; حاکمه&amp;zwnj; فاسد سه دهه&amp;zwnj; گذشته بسیج کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در نزاع احمدی&amp;zwnj;نژاد و اصول&amp;zwnj;گرایان، گذشت زمان به سود آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای و به زیان احمدی&amp;zwnj;نژاد است. چهار ماه تا برگزاری انتخابات ریاست جمهوری باقی مانده است. احمدی&amp;zwnj;نژاد فرصت زیادی برای امتیاز گرفتن یا عزل سیاسی ندارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;هیچ کس به طور قاطع نمی&amp;zwnj;تواند دوام یا فروپاشی جمهوری اسلامی را پیش بینی کند. ما خدا یا پیامبر نیستیم. اما یک چیز روشن است: دیکتاتورها در چنبره&amp;zwnj; دنیای خیالی&amp;zwnj;ای که برای خود می&amp;zwnj;سازند، گرفتار می&amp;zwnj;شوند. خامنه&amp;zwnj;ای نیز اینک در دام توهمات خودساخته اسیر شده است.&lt;/p&gt;
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 <pubDate>Thu, 07 Feb 2013 20:02:45 +0000</pubDate>
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    <title> بررسی دلایل قرآنی مشروعیت حاکمیت پیامبر در اندیشه آیت الله منتظری</title>
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    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2011/11/30/8686&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-nevisandeh&quot;&gt;
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                    حسن یوسفی اشکوری         &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;حسن یوسفی اشکوری &amp;minus; امروز در ذهن و زبان عموم مسلمانان این امر بدیهی دانسته می&amp;zwnj;شود که فرمانروایی محمد، پیامبر اسلام، همتای شأن نبوت الهی و آسمانی او بوده است. به دیگر سخن، همان گونه که پیامبر از جانب خداوند مأمور ابلاغ پیام خداوند (=وحی) به مردمان بوده، مأمور به تأسیس حکومت و فرمانروایی نیز بوده است. اما این تفکر، مانند شماری دیگر از افکار و آموزه&amp;zwnj;های رایج و سنتی اسلامی، نادرست می&amp;zwnj;نماید و حداقل از دلایل استواری بی بهره است. برای پژوهشگران و جویندگان حقیقت آگاهی از مستندات باور به منشاء الهی قدرت و حکومت بسیار مهم است. در منابع پر شمار اسلامی مستندات عقلی و نقلی فراوانی برای این مدعا اقامه و عرضه شده که بخشی از آنها مستندات قرآنی است.&lt;/p&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بی گمان یکی از نظریه پردازان اندیشه سیاسی اسلامی-شیعی متأخر زنده یاد آیه الله حسینعلی منتظری است. ایشان در کتاب مبسوط خود &amp;laquo;دراسات فی ولایة الفقیه&amp;raquo; به شیوۀ سنتی و مألوف به اثبات مبانی ولوازم حکومت اسلامی با منشاء الهی قدرت پرداخته است. از جمله ایشان به برخی آیات برای مدلل کردن نظریه رایج و مختار خود استناد کرده است. در ترجمه فارسی کتاب ایشان با عنوان &amp;laquo;مبانی فقهی حکومت اسلامی&amp;raquo; (جلد اول)، برای اثبات مدعای فرمانروای پیامبر به ۹ آیه ارجاع و استناد شده و ایشان با جهدی بلیغ و به تفصیل (حدود هشتاد صفحه) در این باب بحث و استدلال کرده که در نهایت به گمانم به فرجامی نیکو و مقنع نرسیده است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در دومین سالگرد درگذشت آیه الله منتظری با استفاده از متن فارسی تحقیق ایشان، که مبسوط&amp;zwnj;ترین اثر در باب حکومت اسلامی است و در اختیار همگان قرار دارد&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref1&quot; href=&quot;#_ftn1&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[1]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;، آیات مورد استناد حضرت ایشان را به ترتیبی که در آنجا آمده است، می&amp;zwnj;آورم و آنها را به کوتاهی تمام در معرض نقد و بررسی قرار می&amp;zwnj;دهم:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۱- آیه &amp;laquo;&lt;/b&gt;&lt;b&gt; وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِیمَ&lt;/b&gt;&lt;b&gt; ... &amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;b&gt; وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُك لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِن ذُرِّيتِي قَالَ لاَ ينَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ &lt;/b&gt;&lt;b&gt;&amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref2&quot; href=&quot;#_ftn2&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;&lt;span&gt;[2]&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; (بقره/ ۱۲۴)&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;از آیات مشهور برای اثبات شأن الهی حاکمیت سیاسی حضرت ابراهیم و پیامبر اسلام این آیه است. &amp;laquo;امام&amp;raquo; به معنای پیشوا یا &amp;laquo;پیشتاز&amp;raquo; است و وصفی است عام برای هر نوع پیشوایی، اعم از سیاسی، اجتماعی، اخلاقی و علمی. عالمان مسلمان معمولا امامت را به معنای سیاسی و حکومتی می&amp;zwnj;&amp;zwnj;دانند و مقام امامت را حتی بالاتر از رسالت می&amp;zwnj;شمارند و در ارتباط با این آیه می&amp;zwnj;&amp;zwnj;گویند ابراهیم پس از آن که مورد ابتلاء و امتحان قرار گرفت و به مقام رسالت رسید آنگاه خداوند او را به مقام رهبری و امامت منصوب کرد. آیت الله منتظری می&amp;zwnj;گوید: &amp;laquo;از امامت به عنوان عهد الهی یاد شده و عهد یک امر تکوینی نیست، بلکه امری اعتباری است که به جعل و قرار داد الهی بر عهده امام قرار داده می&amp;zwnj;شود و به همین جهت است که وی واجب الاطاعه می&amp;zwnj;شود. این مقام و منصب از جانب خداوند هرگز به ستمکاران نخواهد رسید و افراد ظالم و ستمگر به هیچوجه حق حکومت بر بندگان خدا را نخواهند داشت و در صورت تسلط، حکومت آنان غاصبانه و غیر شرعی است.&amp;raquo;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref3&quot; href=&quot;#_ftn3&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[3]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;روشن نیست که چرا از این آیه زعامت سیاسی ابراهیم و مهمتر از آن زعامت الهی پیامبر اسلام استنباط شده است. چند نکته در این باب قابل توجه است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱- با توجه به این که &amp;laquo;امام&amp;raquo; وصف عام است و مصداقاً معانی مختلف دارد، حداقل قاطعانه نمی&amp;zwnj;توان گفت که منظور از این عنوان امامت، حاکمیت سیاسی است. اتفاقاً بر عکس، روشن است که ابراهیم هرگز حاکم نبوده و به شهادت تاریخ و قرآن، هرگز در مقام دستیابی به قدرت سیاسی و تشکیل حکومت هم نبود و این خود دلیل و حداقل قرینه&amp;zwnj;ای است بر این که منظور امامت و رهبری دینی و اخلاقی و معنوی ابراهیم است نه امامت سیاسی وفرمانروایی. استفاده از واژه جاعل و جعل نیز مانع از این تفسیر نیست، چرا که نبوت و امامت دینی هم جعل است. چنان که صاحب مجمع&amp;zwnj;البیان (جلد ۱ ص ۲۰۱) گوید &amp;laquo;معناه قال الله تعالی اني جاعلك اما يقتدي بك في افعالك و اقوالك&amp;raquo; این که برخی از جمله &amp;laquo;و من ذریتی، قال لاینال عهد الظالمین&amp;raquo; نتیجه گرفته&amp;zwnj;&amp;zwnj;اند که این عهد امامت است، که چنین نیست. زیرا نبوت و یا امامت نیز نوعی عهد است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲- اگر هم امامت را همان جعل خلافت و زعامت سیاسی بدانیم، احتمال دارد که از باب توصیف امر واقع باشد، مانند این که خداوند بگوید من به تو ثروت دادم. هر چند در صورت قطعی شمردن امامت به معنای حاکمیت، استفاده از واژه جعل و این که خداوند می&amp;zwnj;فرماید &amp;laquo;تو را امام قرار دادم&amp;raquo; محتمل&amp;zwnj;تر و مقبولتر است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳- فرض کنیم که امامت ابراهیم حاکمیت سیاسی بود و از جانب خداوند، چرا آن را به پیامبر اسلام تعمیم می&amp;zwnj;دهیم؟ بدیهی است که این تعمیم محتاج دلیل مستقل است. به ویژه که می&amp;zwnj;دانیم در میان پیامبران فقط چند پیامبر دارای حاکمیت بوده&amp;zwnj;اند. نمی&amp;zwnj;توان اقل را بر اکثر تعمیم داد. یعنی امامت و حاکمیت سیاسی در سلسله پیامبران استثناست و استثنا محتاج دلیل است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img width=&quot;350&quot; vspace=&quot;10&quot; align=&quot;left&quot; hspace=&quot;10&quot; height=&quot;603&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;http://radiozamaneh.com/sites/default/files/montazeri-mabani.jpg&quot; /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font size=&quot;2&quot;&gt;&lt;b&gt;۲- آيه &amp;laquo;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;يا دَاوُودُ إِنَّا جَعَلْنَاك خَلِيفَةً &lt;/b&gt;&lt;b&gt;. . .&amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font size=&quot;2&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;b&gt;يا دَاوُودُ إِنَّا جَعَلْنَاك خَلِيفَةً فِي الْأَرْضِ فَاحْكم بَينَ النَّاسِ بِالْحَقِّ&lt;/b&gt; . . .&amp;raquo; &lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref4&quot; href=&quot;#_ftn4&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[4]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; (ص/۲۶)&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;آیت الله منتظری در مقام استدلال برای اثبات شأن الهی حاکمیت داود فرموده&amp;zwnj;اند: &amp;laquo;آنچه از آیه فوق استفاده می&amp;zwnj;شود این است که حضرت داود با این که از پیش پیامبر بود و مقام نبوت را داشت، اما اگر خداوند مقام خلافت را به وی عطا نفرموه بود، احکام مولوی و حکومتی برای وی مسلم نمی&amp;zwnj;گشت، و اطاعت از وی بر مردم واجب نمی&amp;zwnj;شد، لکن پس از آن که خداوند وی را به عنوان جانشین خود در زمین برگزید مشروعیت ولایت و پیشوایی یافت حکومت و داوری بین مردم حق وی گردید و به همین جهت در آیه شریفه، این معنی با &amp;laquo;فاء&amp;raquo; &amp;laquo;تفریع&amp;raquo; فاحکم، پس حکم کن، مشخص شده است.&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref5&quot; href=&quot;#_ftn5&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[5]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;درارتباط با این آیه دو نکته قابل توجه است یکی معنا ومفهوم &amp;laquo;خلیفه فی&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;الارض&amp;raquo; است و دیگرمعنای &amp;laquo;فاحکم&amp;raquo;. با توجه به این نکته مهم که در قرآن واژه و مفهوم خلیفه و جمع آن خلفاء وخلائف مصداقا در معانی مختلف به کاررفته وجز همین یک مورد که به فرد خطاب شده جملگی به صورت جمع و نوع است و معنای آن نیز جانشینی گروهی از گروه منقرض شده آدمی می&amp;zwnj;باشد (هفت آیه) (جز درمورد آیه ۳۰ سوره بقره : &amp;laquo;&lt;b&gt;وَ إِذْ قَالَ رَبُّك لِلْمَلاَئِکةِ إِنِّی جَاعِلٌ فِی الأَرْضِ خَلِیفَةً &lt;/b&gt;. . .&amp;raquo; که بسیاری معتقدند مسئله جانشینی آدم و بنی&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;آدم از خداوند است) شدیداً محل تأمل و تردید است که در این آیه نیز منظور جعل حاکمیت سیاسی باشد. نکته دوم مربوط است به &amp;laquo;فاحکم&amp;raquo; که به نظرمی&amp;zwnj;رسد حکم به معنای داوری و قضاوت باشد و جمله بالحق نیز مؤید این احتمال است. درعین حال حکومت و حاکمیت نیز شکلی ازداوری است و در واقع قضاوت درمتن نقش و وظایف حکومت نهفته است. جمع بندی این است که:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;left&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱- حداقل قاطعانه نمی&amp;zwnj;توان گفت که منظور از &amp;laquo;انا جعلناك خلیفه فی&amp;zwnj;الارض&amp;raquo; درمورد داود جعل نمایندگی او در مورد حاکمیت ازجانب خداوند باشد.&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;left&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲- احتمال قوی آن است که منظوراز حکم نیز قضاوت باشد نه لزوماً حاکمیت و زعامت سیاسی. چرا که روشن است که حکومت با شکلی از داوری ملازمه دارد و اساساً از شاخه&amp;zwnj;های حاکمیت قضاوت و فیصله بخشی به دعاوی روزمره مردم است، اما هر قضاوتی لزوماً متکی و مستلزم حکومت نیست. چنانکه فقیهان مسلمان و شیعه تا عصر رضاشاه امر قضاوت را در میان مردم برعهده داشته اما حاکم نبودند و حتی ارتباط مستقیمی با حاکمیت نداشتند. قابل ذکراست که طبق گفته علما قضاوت یکی از شئون نبوت است و لذا پیامبری می&amp;zwnj;&amp;zwnj;تواند قاضی باشد ولی حاکم نباشد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳- اینکه آیت الله منتظری می&amp;zwnj;گویند اگر خداوند مقام خلافت را به وی عطا نفرموده بود احکام مولوی و حکومتی برای وی مسلم نمی&amp;zwnj;گشت و اطاعت از وی بر مردم واجب نمی&amp;zwnj;شد، نیز محل تأمل است چرا که این استدلال از پیش فرض&amp;zwnj;هایی چون اعتقاد جازم به مشروعیت آسمانی قدرت و نیز وجوب اطاعت از حاکمیت منصوب و منصوص الهی نتیجه می&amp;zwnj;شود اما دو نکته دراین مقام قابل ذکراست، یکی این که درصورت نفی آن دو پیش فرض، این استدلال نیز بی بنیاد می&amp;zwnj;شود، و دوم این که حاکمیت عرفی و البته دموکراتیک نیز براساس مبانی نظام دموکراسی واجب الاطاعه است و لذا می&amp;zwnj;توان گفت حاکمیت داود عرفی و درعین حال مفترض الطاعه هم بوده است. این دو مانعه الجمع نیستند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴- همان گونه که در مورد آیه مربوط به امامت حضرت ابراهیم گفتیم، محتمل است که خداوند به نحو پسینی حاکمیت و اقتدار بالفعل داود را به طور ضمنی مورد تأیید قرار داده و او را تشویق به رعایت حق وعدالت کرده است. لحن آیه نشان می&amp;zwnj;دهد که هدف از آن سفارش به حق است و جمله وصفی آغاز آیه مراد حداقل بالذات نبوده است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵- صرفنظراز تمام مطالب بالا و با فرض اثبات جعل حاکمیت و فرمانروایی داود از جانب خداوند، هرگز&amp;zwnj;&amp;zwnj;به استناد این آیه زعامت آسمانی هیچ شخص دیگر از جمله پیامبر&amp;zwnj;اسلام اثبات نمی&amp;zwnj;شود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۳- آیه &amp;laquo;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;النَّبِی أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِینَ مِنْ أَنفُسِهِمْ&lt;/b&gt;&lt;b&gt; . . .&amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&amp;nbsp;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;b&gt;النَّبِی أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِینَ مِنْ أَنفُسِهِمْ وَأَزْوَاجُهُ أُمَّهَاتُهُمْ وَأُوْلُو الْأَرْحَامِ &lt;/b&gt;(ظاهرا در مورد میراث ) &lt;b&gt;بَعْضُهُمْ أَوْلَى بِبَعْضٍ فِی کتَابِ اللَّهِ مِنَ الْمُؤْمِنِینَ وَالْمُهَاجِرِینَ&lt;/b&gt; &lt;b&gt;...&lt;/b&gt;&amp;raquo; &lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref6&quot; href=&quot;#_ftn6&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[6]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; (احزاب/۶ )&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;این آیه از مهمترین استنادات مدافعان حکومت تئوکراتیک پیامبر اسلام است و حتی ولایت مطلقه پیامبر را از آن استنباط کرده&amp;zwnj;اند. چرا که آیه می&amp;zwnj;گوید ظاهراً پیامبر از خود مؤمنان و در امر ولایت و تصرف در امور زندگی سزاوارتر است. اما درتفسیر آن مفهوماً و مصداقاً معرکه&amp;zwnj;ای از آرا پدید آمده است. به روایت منتظری چهار احتمال در مورد محدوده این ولایت پدید آمده است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱- اولویت پیامبر درتمام مسائل مردم، چه شخصی و چه اجتماعی. براساس این احتمال پیامبراکرم (ص) درتمام مسائل از انسان نسبت به خودش اولی و مقدم است. یعنی هرآنچه را شخص مؤمن و مسلمان برای خویش می&amp;zwnj;پسندد و بدان تمایل دارد، اعم ازحفظ جان، علاقه به ذات خویش، حفظ آبرو، اعمال نظر و اراده درکارها&amp;zwnj;ی مختلف زندگی و . . . پیامبراکرم نسبت به همه آنها اولی باشد و باید وی را به خویش درتمام مراحل زندگی مقدم داشت.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲- اولویت درتشخیص مصالح. مطابق این احتمال اولویت آن حضرت درمواردی است که وی چیزی را برای مؤمنین مصلحت تشخیص می&amp;zwnj;دهد . . . با تعمق بیشتر می&amp;zwnj;توان گفت نسبت امت به پیامبراکرم (ص) همانند نسبت بنده به مولای خویش است، زیرا تصرف درجان ومال آنان درحقیقت تصرف دراموال ودارایی خویش است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳- اولویت دراموراجتماعی و عمومی. براساس این احتمال، آن حضرت فقط در امور عمومی- اجتماعی اولویت دارد، به این معنی که وی نسبت به امور عمومی جامعه از همه اولی است. مسائلی نظیر اقامه حدود، تصرف دراموال غایب و ناتوان، حفظ و حراست از نظام اجتماعی جامعه، گردآوری مالیاتها ومصرف آن در درمصالح عمومی مردم، بستنقراردادهایبین&amp;zwnj;المللی &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;با سایر ملل.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;
۴- اولویت نسبت به سایر والیان و اولیا. مطابق این احتمال، پیامبر اکرم (ص) اولی است نسبت به سایر ولایتمدارانی که درجامعه وجود دارند که دراین صورت معنی آیه این گونه می&amp;zwnj;شود که ولایت آن حضرت از سایر ولایت&amp;zwnj;ها قویتر و محکمتر و حکم وی از سایر حکم&amp;zwnj;های صادره از دیگران نافذتر است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;درتفسیر مجمع البیان (جلد ۴، ص ۳۳۸- جزء هفتم-) ذیل همین آیه مطلبی نقل شده که مؤید همین احتمال است: روایت شده هنگامی که پیامبر اکرم (ص) می&amp;zwnj;خواستند به جنگ تبوک عزیمت کنند به مردم دستور دادند برای شرکت درجنگ از شهر خارج شوند، برخی افراد گفتند باید از پدر ومادرهایمان کسب اجازه کنیم، دراین هنگام این آیه نازل شد. آنچه درباره این آیه می&amp;zwnj;توان گفت دونکته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱-احتمال اول قطعاً منتفی است، چرا که اطلاق آیه به معنای ولایت مطلقه پیامبراست واین غیرقابل قبول است. زیرا اولاً پذیرفتن اطلاق آیه در اولویت پیامبر در تمام زندگی مؤمنان، به معنای قبول ولایت مطلقه پیامبراست و آن باید از طریق دیگر ثابت شود و نه تنها ثابت نیست بلکه دلایلی برخلاف آن ثابت است. ازجمله منتظری نیز اطلاق را رد می&amp;zwnj;کند (فقیه بزرگی چون آخوند خراسانی نیز ولایت مطلقه پیامبر وامامان معصوم را قبول ندارد&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref7&quot; href=&quot;#_ftn7&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[7]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;). ثانیاً قبول اطلاق به معنای الغای حقوق شخصی مؤمنان است (مانند حق حیات، حق انتخاب، حق ازدواج، حق مالکیت و . . .). ثالثاً ولایت مطلقه نبی با اصول مسلم اسلامی سازگارنیست و حتی درتعارض با آنهاست. اصولی چون: آزادی ایمان و عقیده، نفی هرنوع سلطه پیامبر، نفی پیروی جاهلانه از پیامبر، نفی&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt; وکالت و حفیظ بودن ازپیامبر و . . . درعین حال با توجه به شأن حکومتی پیامبر (نه البته نبوت)، احتمالات سه گانه بعدی، البته با حفظ چهارچوبهای ایمانی و حفظ حقوق اساسی مردم، بلا&amp;zwnj; اشکال به نظرمی&amp;zwnj;رسد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;اما نکته مهم آن است که باز به گفته آیت الله منتظری تعدادی از مفسرین با توجه به آیات قبلی این آیه چنین نتیجه گرفته&amp;zwnj;اند که آیه مربوط به جریان زیدبن حارثه است و در واقع یک جریان خصوصی و شخصی است و نمی&amp;zwnj;توان ازآن به عنوان یک قانون کلی و عمومی استفاده کرد . . . برای روشن شدن مسئله، این آیات نازل گردید: &amp;laquo;. . . و مَا جَعَلَ أَدْعِیاءکمْ أَبْنَاءکمْ ذَلِکمْ قَوْلُکم بِأَفْوَاهِکمْ . . .&amp;raquo; و به دنبال آن، این آیه نازل گردید که: &amp;laquo;النبی اولی . . .&amp;raquo; و لذا درچند آیه بعد در همین سوره می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;و مَا کانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَن یکونَ لَهُمُ الْخِیرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ وَمَن یعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُّبِینًا &amp;raquo;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref8&quot; href=&quot;#_ftn8&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[8]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; (آیه ۳۶ )&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲- معنی آیه و شأن نزول آن هرچه باشد، مسلم آن است که ازاین آیه جعل الهی حاکمیت پیامبر ثابت نمی&amp;zwnj;شود، حداکثر آیات مورد بحث در مقام حل یک مشکل جاری پیامبر حاکم است، وحتی اگراز آن ولایت مطلقه استنباط شود، باز ربطی به مقوله مشروعیت آسمانی یا زمینی قدرت سیاسی و امرحکومتی پیامبر ندارد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۴- آيه &amp;laquo;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;و مَا كانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّهُ و رَسُولُهُ . . .&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&amp;nbsp;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;b&gt;و مَا كانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَن يكونَ لَهُمُ الْخِيرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ وَمَن يعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُّبِينًا&lt;/b&gt;&amp;raquo; (احزاب /۳۶ )&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;درباره این آیه پیش از این صحبت شده و گفته شد که آیه دربارۀ ماجرای زیدبن حارثه بوده و لذا پیام و معنای خاص خود را دارد، و حداکثر چیزی که می&amp;zwnj;توان از آن برداشت و استنباط کرد، این است که درمورد خاص در ارتباط با اصلاح یک سنت نامعقول اجتماعی به فرمان مسقیم خداوند، پیامبر می&amp;zwnj;تواند اختیار و حقوق شخصی افراد را نقض یا محدود کند. درعین حال در این مورد دو نکته قابل توجه است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱- اگر ازاین آیه ولایت مطلقه پیامبر به طورعام استفاده شود، همان اشکالی پدید می&amp;zwnj;آید که قبلاً به آن اشارت رفت. یعنی ازیک طرف مغایر با به رسمیت شناختن حقوق فردی و شخصی است و از سوی دیگر با آزادی ایمان و نفی جباریت و سلطه&amp;zwnj;گری به وسیله پیامبر در تعارض است. به ویژه باید دقت کرد که نفی مطلق اراده واختیار در برابر خداوند و رسول، با شأن نزول آیه سازگارنیست، چرا که زینب هنگام ازواج با زید رضایت کامل داشته است و لذا سلب اختیاری در کار نبوده است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲- صرف نظر از معنا و مراد و مصداق آیه، قدرمسلم این است که از این آیه نیز نمی&amp;zwnj;توان شأن الهی حاکمیت سیاسی پیامبراسلام را نتیجه گرفت. حداکثر خداوند برآن بوده است یک مشکل را حل کند و یا یک سنت نادرست را تغییر دهد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۵- آیه &amp;laquo;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;إِنَّمَا وَلِیکمُ اللّهُ و رَسُولُهُ&lt;/b&gt;&lt;b&gt; . . .&amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;ا&lt;b&gt;نَّمَا وَلِیکمُ اللّهُ و رَسُولُهُ وَالَّذِینَ آمَنُواْ الَّذِینَ یقِیمُونَ الصَّلاَةَ و یؤْتُونَ الزَّکاةَ و هُمْ رَاکعُونَ&lt;/b&gt;&amp;raquo; (مائده/۵۵).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;طبق روایات زیادی ازشیعه و سنی، این آیه دربارۀ حضرت علی نازل شده است که هنگام نماز انگشتر و یا چیزی دیگر را به نیازمندی بخشید.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تمام شواهد و قراین حالیه و مقالیه، حکایت از آن دارد که منظور از ولایت در اینجا زمامداری نیست بلکه دوستی و پیوند انسانی و مؤمنانه است. چرا که اولاً &amp;laquo;والذین آمنوا&amp;raquo; هم در شمار اولیا آمده است و روشن است مؤمنان هرگز زمامدار نیستند، ثانیاً مصداق آیه یعنی امام علی درآن زمان ولی زمامداران نبوده و حال آن که آیه ازحال صحبت می&amp;zwnj;کند و به اعتبار آینده نیز مشکلی حل نخواهد شد و اساساً چنین سخن گفتنی معقول و ادیبانه نیست. ثالثاً طبق روایتی که منتظری از طبرانی در کتاب &amp;laquo;الدرالمنثور&amp;raquo; (جلد دوم، صفحه ۲۹۳) آورده است پیامبر در ارتباط با شأن نزول آیه فرمود: &amp;laquo;من کنت مولاه فعلی مولاه، اللهم وال من والاه وعاد من عاداه. &amp;raquo;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;این جمله که به گفته منتظری دومین بار پیش از داستان غدیرگفته شده، به خوبی نشان می&amp;zwnj;دهد که منظور از ولایت همان مؤمنین و مؤمنات بعضهم اولیاء بعض است نه حاکمیت سیاسی. (قابل توجه این که استفاده مکرر از من کنت مولاه فعلی مولاه، نشانه آن نیست که درغدیرهم ولایت به معنای خلافت و زعامت نبوده است؟ )&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۶- آيه &amp;laquo;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;أَطِيعُواْ اللّهَ و أَطِيعُواْ الرَّسُولَ و أُوْلِي الأَمْرِ مِنكمْ &lt;/b&gt;&lt;b&gt;. . .&amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&amp;nbsp;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;b&gt;يا أَيهَا الَّذِينَ آمَنُواْ أَطِيعُواْ اللّهَ و أَطِيعُواْ الرَّسُولَ وَ أُوْلِي الأَمْرِ مِنكمْ فَإِن تَنَازَعْتُمْ فِي شَيءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى اللّهِ و الرَّسُولِ إِن كنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللّهِ وَ الْيوْمِ الآخِرِ ذَلِك خَيرٌ و أَحْسَنُ تَأْوِيلاً&lt;/b&gt;&amp;raquo; (نساء/۵۹ ).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;این آیه نیزازمستندات مشهور درباره شأن الهی حاکمیت پیامبر اسلام است. اما این آیه نیز دلیل و حتی قرینه&amp;zwnj;ای برای اثبات شأن الهی قدرت سیاسی پیامبر نیست. دربارۀ این آیه و تفسیر و مصداق آن، بین مفسران و متکلمان شیعه و سنی و حتی مفسران وابسته به یک گروه، اختلافات فراوانی است. چهار اختلاف (و شاید بیشتر) در این آیه قابل تشخیص است، یکی دربارۀ معنا و مصداق اولی الامر، دوم دربارۀ معنا و مفهوم و محدودة اطاعت ازخداوند و رسول و به ویژه ازاولی الامر و سوم دربارۀ معنا و مفهوم اختلاف و چگونگی رجوع به خدا و رسول و بالاخره چهارم ارتباط این آیه با شأن الهی حاکمیت پیامبر و ولی&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;امر.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;درباره معنای اولی&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;الامر ظاهراً تردیدی نیست که منظور حکومت و زمامداری است و حداقل می&amp;zwnj;توان گفت این معنا بیشترمحتمل است، اما مصداقاً، می&amp;zwnj;دانیم که درعالم سنت وجماعت آرا متفاوت است، گروهی مطلق زمامدار را مصداق آن می&amp;zwnj;شمارند، گروهی علما را، گروهی دیگر اهل حل و عقد را، گروهی عدول مؤمنین را، وگروهی امراءالسرایا- فرماند&amp;zwnj;هان جنگ- را. اما شیعیان پیامبر و پس از آن امامان دوازده&amp;zwnj;گانه را مصداق انحصاری اولی&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;الامرمی&amp;zwnj;دانند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در مورد دوم نیز آرا متنوع است. بعضی اطاعت از اولی&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;الامر را مانند اطاعت از خدا و رسول می&amp;zwnj;دانند و دربارۀ هر سه ولی به اطاعت محض و مطلق و بی&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;چون و چرا عقیده دارند و بعضی دیگر بین اطاعت از خدا و رسول در امر حکومت فرق می&amp;zwnj;گذارند و نیز بین رسول و ولی امر تفاوت و تمایز می&amp;zwnj;نهند و به هرحال ولی امر را منتخب مردم می&amp;zwnj;دانند و اطاعت از او نیز مشروط است به رعایت احکام شریعت و عدالت و یا طبق معیارهای دموکراتیک به رعایت قوانین موضوعه و اجرای عدالت و آزادی و حقوق مردم. به ویژه باید روشن کرد که منظور از اطاعت از اولی&amp;zwnj;الامر و یا حتی رسول در امرحکومت، امر مولوی است و یا ارشادی، چرا که هرنظری اتخاذ کنیم درتفسیر آیه مهم است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در مورد سوم نیز اختلافاتی دیده می&amp;zwnj;شود. فی&amp;zwnj;المثل آیا منظور از اختلافات، اختلاف درامرحکومت است؟ ، اختلاف در مشروعیت حاکمیت و یا اموری که مربوط به حاکمیت و حاکم است؟ ، که ظاهراً هیچ کدام محتمل نیست، چرا که اختلاف درمشروعیت بلاموضوع است برای این که فرض این است که حاکم مشروع است و گرنه رجوع به آن لغو است و نیز احتمال دوم عملاً مورد ندارد، زیرا که اگراختلاف در امری که در قلمرو وظایف حاکم قرار دارد پدید آید، حتماً باید به حاکم رجوع کرد و عملاً مرجع دیگری برای رفع اختلاف وجود ندارد، ضمن این که مفهوماً چنین اختلافی رخ نمی&amp;zwnj;دهد و نمی&amp;zwnj;تواند رخ بدهد. احتمال دارد که اختلاف در امراحکام شرعی باشد که چاره&amp;zwnj;ای جز رجوع به مرجعیت و داوری خدا و رسول نیست.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;و اما در مورد چهارم، عموماً از این آیه برای اثبات مدعای شأن الهی حاکمیت پیامبر استفاده می&amp;zwnj;کنند، ولی کسانی نیز چنین استنباطی ندارند. بنابراین اتخاذ دلیل از این آیه برای اثبات در معانی مورد بحث، آسان نیست. به نظرمی&amp;zwnj;رسد که این آیه، مانند بسیاری ازآیات دیگر در مقام تثبیت و تحکیم حاکمیت سیاسی و تقویت ولایت و مدیریتی پیامبر و نیز اولیای امور در هر زمانی است و این به معنای آن نیست که پیامبر و یا ولی&amp;zwnj;الامر، هرکه باشد، ازجانب خداوند مأمور به تشکیل حکومت و یا در آمریت خود معصوم است و لذا نمی&amp;zwnj;توان گفت که اطاعت یک اطاعت محض و یک طرفه است و جای هیچ گونه ایراد و انتقاد و اعتراض نیست. چنان که در روایات اسلامی (ازجمله در نهج&amp;zwnj;البلاغه) از حقوق متقابل حاکم و مردم سخن رفته است. اگر قرار بر اطاعت محض باشد، دیگر سخن گفتن از حقوق متقابل حکومت و مردم لغو خواهد بود. به هرحال خداوند از مردم خواسته است که از حکومت&amp;zwnj;هایتان اطاعت کنید، این سفارش قطعاً مشروط است و نیز با منطق دموکراسی و وکالت بیشتر سازگاراست تا ولایت الهی و آمریت از بالا با توجیهاتی چون ولایت کبیر بر صغیر و یا عاقل بر دیوانه وسفیه.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ازاین رو آیت الله منتظری به درستی می&amp;zwnj;گوید: &amp;laquo;درشرع مقدس اسلام حق فرمانروایی منحصر به معصوم نیست بلکه هرکس که حاکمیت وی مشروع باشد دارای چنین حقی است، چه حاکمیت او به نصب مستقیم از جانب معصوم باشد و یا این که به وسیله مردم برای انجام این مسئولیت انتخاب شده و حاکمیت وی مورد امضای شارع باشد که در محدودة مسئولیت خویش دارای حق حاکمیت است&amp;raquo; &lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref9&quot; href=&quot;#_ftn9&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[9]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۷- آيه &amp;laquo;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;فَلاَ وَ رَبِّك لاَ يؤْمِنُونَ حَتَّىَ يحَكمُوك &lt;/b&gt;&lt;b&gt;. . .&amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&amp;nbsp;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;b&gt;فَلاَ و رَبِّك لاَ يؤْمِنُونَ حَتَّىَ يحَكمُوك فِيمَا شَجَرَ بَينَهُمْ ثُمَّ لاَ يجِدُواْ فِي أَنفُسِهِمْ حَرَجًا مِّمَّا قَضَيتَ وَ يسَلِّمُواْ تَسْلِيمًا&lt;/b&gt;&amp;raquo;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref10&quot; href=&quot;#_ftn10&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[10]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; (نساء /۶۵).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مضمون و شأن نزول آیه روشن می&amp;zwnj;کند که اولاً موضوع مربوط به قضاوت و داوری است نه حاکمیت سیاسی، ثانیاً اگر موضوع عام و مربوط به حاکمیت هم باشد، باز دلیلی برانتصاب یا شأن الهی حاکمیت پیامبر نیست، حداکثر این است که خداوند درمقام تحکیم حاکمیت پیامبر مؤمنان را به اطاعت در برابر داوری و یا دستور نبی سفارش کرده است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;جمله فیما شجربینهم و مما قضیت، آشکار می&amp;zwnj;کند که آیه مربوط به قضاوت است نه حاکمیت سیاسی. آیت الله منتظری نیز می&amp;zwnj;پذیرد که موضوع و شأن نزول مربوط به قضاوت است ولی ایشان با استفاده از یک اصطلاح علم اصول معتقد است &amp;laquo;مورد مخصص نیست&amp;raquo; و می&amp;zwnj;گوید مراد ولایت مطلقه پیامبر در تمام اختلافات داخلی امت اسلامی است، اعم از شخصی و اجتماعی&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref11&quot; href=&quot;#_ftn11&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[11]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. قابل توجه این که خود ایشان قبلاً (صفحه ۱۲۵-۱۲۶) ذیل آیه &amp;laquo;&lt;b&gt;النبی اولی بالمومنین انفسهم&lt;/b&gt; &amp;raquo; ولایت مطلقه پیامبر را نپذیرفته و به صراحت فرموده بودند: &amp;laquo;نمی&amp;zwnj;توان به اطلاق لفظ تمسک جست، زیرا الزام به اولویت درمسائلی نظیر روابط و حقوق شخصی زن و شوهر بلکه تصرف در اموال شخصی و ازدواج و طلاق دیگران و مسائل دیگری از این قبیل امکان پذیرنیست&amp;raquo;. بنابراین نمی&amp;zwnj;توان از این آیه اطلاق فهمید و قضاوت را به حاکمیت سیاسی تعمیم داد و حاکمیت سیاسی را هم به تمام امورزندگی مردم تعمیم داد و ولایت مطلقه از آن استنباط کرد. مطهری نیز آیه را درمورد قضاوت می&amp;zwnj;داند&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref12&quot; href=&quot;#_ftn12&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[12]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; از نظر شأن نزول هم گفته شده است (طبق نقل مجمع&amp;zwnj;البیان) که بین حاطب بن ابی بلتعه انصاری و زبیر دربارۀ آب دادن درختان خرمایشان اختلاف پیش آمد و نزد پیامبر آمدند و از او داوری خواستند و پیامبر فرمود اولویت در آب دادن با زبیر است اما حاطب برآشفت و پیامبر را متهم به حمایت از فامیل و خویش کرد و آن حضرت غضبناک شد و به زبیرفرمود: ای زبیر، آب را به روی زمین خود ببند و آنقدر صبر کن تا بیخ درختهایت را پرکند- نخلستان کاملا سیراب شود، حق خودت را بگیر، آنگاه آب را روی زمین همسایه&amp;zwnj;ات بفرست.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;از آنجا که از منظر قرآن می&amp;zwnj;دانیم که پیامبر هیچ گونه چیرگی فکری و ذهنی بر مؤمنان ندارد، ممکن است کسانی - از جمله آخر آیه مبنی بر این که به قضاوت پیامبر رضایت دهید و از دل و جان تسلیم پیامبر باشید - چنین استنباط کنند که این دو گزارش متناقض هستند، اما به نظر می&amp;zwnj;رسد چنین نیست، چرا که اولاً آیات مربوط به نفی جباریت و سلطه&amp;zwnj;&amp;zwnj;گری به پیامبر و اکراه در دین و آزادی ایمان چندان زیاد و قاطع هستند که آنها اصل حاکمند و آیات دیگر را باید در پرتو آنها تفسیر و تحلیل کرد، ثانیاً آیه مورد بحث مربوط به حادثه خاص و حداکثر امر قضاوت نبی است و در واقع خداوند اتهام حاطب را بر پیامبر نفی می&amp;zwnj;کند نه بیش از آن و لذا نمی&amp;zwnj;توان از آن یک قاعده استخراج کرد و گرنه اصولی چون حق اعتراض و انتقاد از اشخاص و یا حاکمان منتفی خواهد شد و در نتیجه مردم باید عقل و تشخیص و حق انتخاب و آزادی خود را با دست خود تعطیل کنند، و ثالثاً با توجه به مجموعه دلایل و شواهد و قراین، باید گفت امر خداوند یک امر ارشادی است نه مولوی، چرا که اساساً امور قلبی و ذهنی چندان اختیاری نیستند تا مشمول اوامر و نواهی قطعی کسی قرار بگیرند. جالب این که اعتراض آشکار حاطب نشان می&amp;zwnj;دهد که مخالفت و اعتراض و انتقاد به قضاوت یا اعمال حاکمیت سیاسی پیامبر یک حق شناخته شده بوده و لذا کاملاً عادی تلقی شده است. هر چند در نهایت خداوند پیامبرش را از اتهام تبرئه می&amp;zwnj;کند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۸- آيه &amp;laquo;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;انَّا أَنزَلْنَا إِلَيك الْكتَابَ بِالْحَقِّ لِتَحْكمَ بَينَ النَّاسِ&lt;/b&gt;&lt;b&gt; . . .&amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&amp;nbsp;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;b&gt;إِنَّا أَنزَلْنَا إِلَيك الْكتَابَ بِالْحَقِّ لِتَحْكمَ بَينَ النَّاسِ بِمَا أَرَاك اللّهُ و لاَ تَكن لِّلْخَآئِنِينَ خَصِيمًا&lt;/b&gt;&amp;raquo;. (نساء /۱۰۵)&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;آیت الله منتظری از این آیه اطلاق فهمیده و گفته است: &amp;laquo;از اطلاق این آیه استفاده می&amp;zwnj;شود که پیامبر اکرم (ص) از جانب خداوند متعال مأموریت می&amp;zwnj;یابد در بارة تمام شئون و کارهای جامعه بین مردم- اعم از مسلمان و غیره مسلمان &amp;ndash;حکم نماید، عمومیت از ظاهر آیه آشکار است، مگر این که باز ادعا شود که حکم فقط ظهور در قضاوت دارد&amp;raquo;.&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref13&quot; href=&quot;#_ftn13&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[13]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;دو نکته در این مورد قابل تأمل است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span&gt;1-&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;مدعای ما این است که قطعاً موضوع آیه مربوط به قضاوت است. سه دلیل و یا قرینه مؤید این مدعا است: یکی&amp;laquo;انا انزلنا الیک الکتاب&amp;raquo; است، چرا که کتاب به ویژه با قید &amp;laquo;بالحق&amp;raquo; موضوعاً با امر قضاوت و اظهار رأی و نظر و ارتباط و تناسب دارد نه با حاکمیت سیاسی. دوم واژة &amp;laquo;لتحکم بین الناس&amp;raquo; است که با توجه به آیات دیگر قرآن در ارتباط با واژه حکم و نیز شأن نزول آیه مسلماً مراد قضاوت است، و سوم شأن نزول آیه است که مفسران گفته&amp;zwnj;اند این آیه در حق طعمه بن ابیرق نازل شده است. نقل است که طعمه زرهی را از کسی به سرقت برده بود در عین حال طوری صحنه سازی کرده بود که اتهام سرقت متوجه یک یهودی باشد و او را متهم کرده بود. پیامبر در این مورد به قضاوت نشست در نهایت خواست یهودی بیگناه را مجازات کند، این آیه و آیات بعدی نازل شد و قضاوت پیامبر را تصحیح کرد (قابل توجه این که پیامبر در همه حال علم غیب ندارد و بر اساس ظواهر قضاوت می&amp;zwnj;کند و از این رو احتمال دارد دچار خطا نیز شود).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲- این که منتظری می&amp;zwnj;گویند &amp;laquo;از اطلاق این آیه استفاده می&amp;zwnj;شود که پیامبر اکرم از جانب خداوند متعال مأموریت می&amp;zwnj;یابد دربارۀ تمام شئون و کارهای جامعه بین مردم - اعم از مسلمان و غیر مسلمان -حکم نماید&amp;raquo; محل اشکال و تأمل است. چرا اگر منظور از حکم قضاوت باشد، درست و قابل قبول است و آن هم با این تفسیر که چون پیامبر حاکم امت هم هست، خداوند به او توصیه می&amp;zwnj;کند به عدالت و حق عمل کند و جانبدار خائنان نباشد و این سفارش نیز کاملاً طبیعی و منطقی است، اما اگر مراد حاکمیت سیاسی باشد، از این آیه مأموریت الهی برای آمریت و فرمانروایی استنباط نمی&amp;zwnj;شود. وانگهی حتی اگر مراد حاکمیت سیاسی هم باشد، باز به دلیل حاکم بالفعل بودن پیامبر، خداوند فرمان به عدل و حق داده است و این به معنای شأن الهی حاکمیت پیامبر نیست. از سوی دیگر اگر منظور ایشان از مأموریت پیامبر دربارۀ تمام شئون و کارهای جامعه ولایت مطلقه باشد، این هم با محکمات قرآنی و اسلامی سازگار نیست و هم با نظر سابق ایشان متناقض است که بدان اشارت رفت.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۹- آيه &amp;laquo;ا&lt;/b&gt;&lt;b&gt;نَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ و رَسُولِهِ&lt;/b&gt;&lt;b&gt; . . .&amp;raquo;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&amp;nbsp;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;b&gt;إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ و رَسُولِهِ وَ إِذَا كانُوا مَعَهُ عَلَى أَمْرٍ جَامِعٍ لَمْ يذْهَبُوا حَتَّى يسْتَأْذِنُوهُ إِنَّ الَّذِينَ يسْتَأْذِنُونَك أُوْلَئِك الَّذِينَ يؤْمِنُونَ بِاللَّهِ و رَسُولِهِ فَإِذَا اسْتَأْذَنُوك لِبَعْضِ شَأْنِهِمْ فَأْذَن لِّمَن شِئْتَ مِنْهُمْ و اسْتَغْفِرْ لَهُمُ اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ&lt;/b&gt;&lt;b&gt;/&lt;span&gt;لَا تَجْعَلُوا دُعَاء الرَّسُولِ بَينَكمْ كدُعَاء بَعْضِكم بَعْضًا قَدْ يعْلَمُ اللَّهُ الَّذِينَ يتَسَلَّلُونَ مِنكمْ لِوَاذًا فَلْيحْذَرِ الَّذِينَ يخَالِفُونَ عَنْ أَمْرِهِ أَن تُصِيبَهُمْ فِتْنَةٌ أَوْ يصِيبَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; &amp;raquo;. (نور/ ۶۲-۶۳ ).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;laquo;همانا مؤمنان کسانی هستند که به خداوند و پیامبر او ایمان دارند و چون با او درکاری همداستان شدند [به جایی] نمی&amp;zwnj;روند مگر که از او اجازه بگیرند. بی&amp;zwnj;گمان کسانی که از تو اجازه می&amp;zwnj;گیرند همان کسانی هستند که به خداوند و پیامبر او ایمان دارند، چون برای بعضی&amp;zwnj;کارهایشان از تو اجازه خواستند، به هرکس از آنان که خواستی اجازه بده و برای آنان از خداوند آمرزش بخواه، چرا که خداوند آمرزگار مهربان است / خواندن پیامبر را در میان خودتان همانند خواندن بعضی از شما بعضی دیگر مشمارید، به راستی که خداوند کسانی را از شما که پنهانی و پناه جویانه خود را بیرون می&amp;zwnj;کشند می&amp;zwnj;شناسد، باید کسانی &amp;zwnj;که از فرمان او سر پیچی می&amp;zwnj;کنند برحذر باشند از این که بلایی یا عذابی دردناک به آنان برسد&amp;raquo;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مفسران درباره شأن نزول این آیات به تفصیل سخن&amp;zwnj; گفته&amp;zwnj;اند و از جمله گفته&amp;zwnj;اند آنها مربوط&amp;zwnj;اند به روز خندق و کندن خندق که بعضی از منافقان بدون اجازه پیامبرکار را ترک می&amp;zwnj;کردند. یا گفته شده مربوط است به روز جمعه و هنگام خطابه خواندن پیامبر بر منبر.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;آیت الله منتظری می&amp;zwnj;گویند: &amp;laquo;آیه اول از دو آیه فوق دلالت دارد بر این که علاوه بر مقام رسالت برای پیامبر اکرم (ص) مقام و منصب ولایت و امامت در امور سیاسی، اجتماعی مسلمین نیز هست و بر مردم لازم است در این گونه مسائل از آن حضرت شنوایی و اطاعت داشته باشند. آیه دوم نیز دلالت بر حرمت مخالفت از فرمانها و دستورات آن حضرت دارد، که از ظواهر آن استفاده می&amp;zwnj;شود مراد فرمانهای مولوی (حکومتی) آن حضرت است نه فرمانها و اوامر ارشادی که در مقام بیان احکام الله بیان می&amp;zwnj;فرمایند&amp;raquo;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftnref14&quot; href=&quot;#_ftn14&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[14]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. این که آیة اول دلالت بر احراز مقام و منصب سیاسی و اجتماعی برای پیامبر دارد، تردید نیست، اما سخن این است که آیا پیامبر این مقام را از جانب خداوند یافته و در واقع خداوند او را به این مقام نصب فرموده است، سخن دیگری است و از این آیه استنباط نمی&amp;zwnj;شود. نیز مسئله اطاعت از پیامبر در امر حکومت و اوامر و نواهی حکومتی، از آیة دوم و آیات دیگر قرآن استفاده می&amp;zwnj;شود (هر چند مشروط نه مطلق) اما باز این سفارش به معنای شأن الهی حاکمیت پیامبر نیست.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;در جمع بندی می&amp;zwnj;توان گفت که هر تفسیر و رأیی که دربارۀ آیات نه&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;گانه مذکور داشته باشیم، یک امر مسلم است و آن این که هیچ یک از این آیات فرآن این مدعا را ثابت نمی&amp;zwnj;کند که پیامبر گرامی اسلام از جانب خداوند مأموریت برای تشکیل حکومت داشته و حاکمیت سیاسی و فرمانروایی وی شأنی از شئون نبوت بوده است.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;پانویس&amp;zwnj;ها&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;hr width=&quot;33%&quot; size=&quot;1&quot; align=&quot;left&quot; /&gt;
&lt;div id=&quot;ftn1&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn1&quot; href=&quot;#_ftnref1&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[1]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. به دو دلیل متن فارسی را مأخذ قرار دادم: ۱- قابل استفاده بودن آن برای عموم، ۱- ترجمه فارسی توضیحاتی در پاورقی دارد که مفید است و در متن عربی غالبا دیده نمی&amp;zwnj;شود.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn2&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn2&quot; href=&quot;#_ftnref2&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[2]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. و چون ابراهیم را پروردگارش با کلماتى بیازمود و وى آن همه را به انجام رسانید [خدا به او] فرمود من تو را پیشواى مردم قرار دادم [ابراهیم] پرسید از دودمانم [چطور] فرمود پیمان من به بیدادگران نمى&amp;rlm;رسد.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn3&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn3&quot; href=&quot;#_ftnref3&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[3]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. مبانی فقهی حکومت اسلامی، جلد ۱، ص ۱۲۰&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn4&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn4&quot; href=&quot;#_ftnref4&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[4]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. &lt;span&gt;اى داوود ما تو را در زمین خلیفه [و جانشین] گردانیدیم پس میان مردم به حق داورى کن ...&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn5&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn5&quot; href=&quot;#_ftnref5&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[5]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. مبانی فقهی حکومت اسلامی، جلد ، ص ۱۲۲&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn6&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn6&quot; href=&quot;#_ftnref6&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[6]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. پیامبر به مؤمنان از خودشان سزاوارتر [و نزدیکتر] است و همسرانش مادران ایشانند و خویشاوندان [طبق] کتاب خدا بعضى [نسبت] به بعضى اولویت دارند [و] بر مؤمنان و مهاجران [مقدمند]....&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn7&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn7&quot; href=&quot;#_ftnref7&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[7]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. در این مورد بنگرید به کتاب &amp;laquo;سیاست نامه خراسانی&amp;raquo; اثر دکتر محسن کدیور.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn8&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn8&quot; href=&quot;#_ftnref8&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[8]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. مبانی فقهی حکومت اسلامی جلد ۱، ص ۱۲۲-۱۲۷&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn9&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn9&quot; href=&quot;#_ftnref9&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[9]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. مبانی فقهی حکومت اسلامی جلد ۱، ص ۱۶۴&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn10&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn10&quot; href=&quot;#_ftnref10&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[10]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. ولى چنین نیست به پروردگارت قسم که ایمان نمى&amp;rlm;آورند مگر آنکه تو را در مورد آنچه میان آنان مایه اختلاف است داور گردانند سپس از حکمى که کرده&amp;rlm;اى در دلهایشان احساس ناراحتى [و تردید] نکنند و کاملاً سر تسلیم فرود آورند&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn11&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn11&quot; href=&quot;#_ftnref11&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[11]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. مبانی فقهی حکومت اسلامی، جلد ۱، ص ۱۶۶&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn12&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn12&quot; href=&quot;#_ftnref12&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[12]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. مقاله ولا و ولایت&amp;zwnj;ها، منتشر شده در کتاب خلافت و ولایت از نظر قران و سنت، اثر محمد تقی شریعتی، ص ۳۶۴&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn13&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn13&quot; href=&quot;#_ftnref13&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[13]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. مبانی فقهی حکومت اسلامی، جلد۱، ص ۱۶۷&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;ftn14&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a title=&quot;&quot; name=&quot;_ftn14&quot; href=&quot;#_ftnref14&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;[14]&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;. مبانی فقهی حکومت اسلامی، جلد۱، ص ۱۶۷-۱۶۸&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
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 <pubDate>Wed, 30 Nov 2011 08:42:13 +0000</pubDate>
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