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    <title>ولایت</title>
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    <language>fa</language>
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    <title>خائنان، فاسدها، و  بی‌ترمزها</title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/politics/2013/02/17/24604</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/politics/2013/02/17/24604&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-nevisandeh&quot;&gt;
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                    مجید محمدی        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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                    &lt;img  class=&quot;imagefield imagefield-field_maghaleh_image&quot; width=&quot;1500&quot; height=&quot;1000&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/sites/default/files/kha.jpg?1361110600&quot; /&gt;        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;مجید محمدی &amp;ndash; آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای در سخنانی که پیرامون رویدادهای روز استیضاح وزیر کار در مجلس &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;و حمله به لاریجانی در قم&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; بیان کرد، عملا نزدیکان و وفاداران به حکومت را به سه دسته تقسیم کرد. او هیچ&amp;zwnj;گاه در یک سخنرانی، نیروهای وفادار به حاکمیت را این چنین ننواخته بود. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای این سه گروه را به ترتیب زیر دسته&amp;zwnj;بندی کرد:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) مقامات بالا که بی&amp;zwnj;صلاحیت و خلافکار هستند. او قبلا آنها را در صورت عمومی کردن اختلافات خود خائن و &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;بداخلاق و سپس ناقض شرع و اخلاق و قانون نامیده بود&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;نزدیکان مقامات و مدیران آنها که فاسدند و مقامات بالا یا فساد آنها را نادیده می&amp;zwnj;گیرند یا با این فساد همراهی می&amp;zwnj;کنند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) ن&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;یروهای بسیجی و لباس شخصی (نور چشمان نظام و حافظ همیشگی آن) که ترمز بریده&amp;zwnj;اند و صرفا بر اساس دستوراتی که از بیت می&amp;zwnj;آید دست به سرکوب و حمله نمی&amp;zwnj;زنند. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;برادرانی که رفتند&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;علی خامنه&amp;zwnj;ای برای آن که با هم نسلان خود در زمینه حرف&amp;zwnj;شنوی و رعایت مطلقه&amp;zwnj;خواهی و فصل&amp;zwnj;الخطاب بودن درگیری نداشته باشد، یک به یک آنها را به تدریج حذف کرد. رفسنجانی، &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;کروبی، موسوی،&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;موسوی خویینی&amp;zwnj;ها&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;، خاتمی، عبدالله نوری، حسینعلی منتظری و نسلی از نزدیکان به خمینی یک به یک متهم، محاکمه، زندانی، برکنار و مطرود شدند و برچسب&amp;zwnj;هایی مثل فتنه&amp;zwnj;گر، بی&amp;zwnj;بصیرت، سران جنگ نرم و مانند آنها خوردند. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای تلاش کرد از طریق انتصابات یا انتخابات مهندسی شده، به جای این چهره&amp;zwnj;ها، افرادی &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۰&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; تا &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۰&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; سال جوان&amp;zwnj;تر از آنها و از نسلی بر سر کار آورد که در انقلاب نیز مشارکتی جدی نداشتند و طعم زندان و شکنجه و حکومت استبدادی پهلوی را نچشیده بودند. این گروه کسانی هستند که باید:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) روش&amp;zwnj;های او را با حکومت پهلوی مقایسه نکنند،&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) از خود نیز مشروعیتی نداشته باشند تا هر چه دارند از خامنه&amp;zwnj;ای بدانند،&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;) با پیروی از اصل پیرسالاری از وی اطاعت مطلق کنند. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;رهبر&amp;zwnj;ی با دست&amp;zwnj;های بسته&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;انتظار خامنه&amp;zwnj;ای از نسل جوان&amp;zwnj;تر نیروهایی که می&amp;zwnj;خواهند قهرمان مسابقه&amp;zwnj;ای بی رقیب باشند برآورده نشد. (مثل دیکتاتور فیلم ساشا بارون کوهِن که در مسابقه&amp;zwnj; دو، رقبای خود را با تیر اندازی به سوی آنها حذف می&amp;zwnj;کرد تا قهرمان شود). &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/dava.jpg&quot; style=&quot;width: 180px; height: 114px; float: right;&quot; /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;انتظار خامنه&amp;zwnj;ای از نسل جوان&amp;zwnj;تر نیروهایی که می&amp;zwnj;خواهند قهرمان مسابقه&amp;zwnj;ای بی رقیب باشند برآورده نشد. اکنون همکاران جوان&amp;zwnj;تر او بیش از همکاران گذشته بر وی می&amp;zwnj;شورند. او یک روز جدال آنها بر سر قدرت و ثروت بیشتر را &amp;quot;خیانت&amp;quot;، روزی دیگر بداخلاقی و در جایی دیگر خلاف شرع و اخلاق می&amp;zwnj;خواند اما در این میان، گوشی بدهکار نیست. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;اکنون همکاران جوان&amp;zwnj;تر او بیش از همکاران گذشته بر وی می&amp;zwnj;شورند. او یک روز جدال آنها بر سر قدرت و ثروت بیشتر را &amp;quot;خیانت&amp;quot;، روزی دیگر بد اخلاقی و در جایی دیگر خلاف شرع و اخلاق می&amp;zwnj;خواند اما در این میان، گوشی بدهکار نیست. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;روسای سه قوه&amp;zwnj; نظام ولایت کارهایی می&amp;zwnj;کنند که اگر مردم عادی آنها را انجام دهند محاکمه می&amp;zwnj;شوند: &amp;laquo;در این ماجرا متأسفانه رئیس یک قوه به استناد یک اتهام ثابت نشده و حتی مطرح نشده در دادگاه، دو قوه دیگر یعنی مجلس و قوه قضاییه را متهم ساخت که کاری بد، &amp;zwnj;غلط، نامناسب، خلاف شرع، خلاف قانون و خلاف اخلاق بود.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;آنها کارهایی می&amp;zwnj;کنند که به قول رهبر کشور ایجاد تنش و تشویش در جامعه می&amp;zwnj;کند و ارتکاب آنها مجازات دو تا شش سال زندان دارد: &amp;laquo;این رفتار، حقوق اساسی مردم را نیز تضییع کرد چرا که زندگی در آرامش و امنیت روانی و اخلاقی، جزو حقوق اساسی ملت است.&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقامات بالای حکومتی همچنین تعهد خود در انجام وظایف خاصی را نقض کرده&amp;zwnj;اند. &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای می&amp;zwnj;گوید&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;: &amp;laquo;اما این رفتارها، متناسب با سوگندها و تعهدات نیست.&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;با این همه او &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;چون می&amp;zwnj;داند که سخنان و توصیه&amp;zwnj;هایش خطاب به مقامات با بی&amp;zwnj;توجهی روبرو می&amp;zwnj;شود، مجبور است آنها را با خواست خدا گره بزند: &amp;laquo;ان&amp;zwnj;شاءالله این نصیحت خیرخواهانه و مشفقانه مورد توجه مسئولان بخصوص مسئولان بالا قرار گیرد و به آن پایبند باشند.&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;او البته پس از آن که سخنانش توسط روسای قوا نادیده گرفته شد، عقب نشینی می&amp;zwnj;کند: &amp;laquo;بنده فعلاً نصیحت می&amp;zwnj;کنم که این کار شایسته&amp;zwnj;ای برای نظام جمهوری اسلامی نیست.&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;او از یک سو رئیس قوه&amp;zwnj; مقننه را تقبیح می&amp;zwnj;کند: &amp;laquo;استیضاح باید فایده&amp;zwnj;ای داشته باشد اما چند ماه مانده به پایان کار دولت، &amp;zwnj;استیضاح یک وزیر آن هم به خاطر مسئله&amp;zwnj;ای که مربوط به وزیر نیست، &amp;zwnj;چه علت و فایده&amp;zwnj;ای دارد؟... در داخل مجلس هم کسانی حرف&amp;zwnj;های نامناسب بر زبان آوردند که آن هم غلط بود... دفاع رئیس محترم مجلس هم قدری زیاده روی بود و لزومی نداشت.&amp;raquo; و از طرف دیگر، کار رئیس قوه&amp;zwnj; مجریه را &amp;laquo;بد، غلط، نامناسب، خلاف شرع، خلاف قانون و خلاف اخلاق&amp;raquo; می&amp;zwnj;خواند تا در این میان بی&amp;zwnj;طرف جلوه کند.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;رهبری که به مدیریت خرد امور در &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۳&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; سال گذشته مشغول بوده، یکباره ظاهرا از کنش دست بر می&amp;zwnj;دارد چون در عین محکوم کردن رفتار سران دو قوه از برکناری آن&amp;zwnj;ها ناتوان است: &amp;laquo;نه آن متهم کردن، نه آن برخورد کردن و نه آن استیضاح، &amp;zwnj;مسائل مناسبی نبود.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/kafan.jpg&quot; style=&quot;width: 180px; height: 119px; float: right;&quot; /&gt;خامنه&amp;zwnj;ای که &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۶&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; سال دو دولت رفسنجانی و خاتمی را با به میدان آوردن کفن&amp;zwnj;پوشان و نیروهای لباس شخصی از حرکت&amp;zwnj;هایی باز می&amp;zwnj;داشت که مورد نظرش نبود، اکنون با گروه&amp;zwnj;هایی مواجه است که همین کار را با نیروهای وفادار به خودش &amp;nbsp;می&amp;zwnj;کنند و ممکن است روزی به سراغ خود او نیز بیایند.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای رفتار&amp;zwnj;های سران سه قوه را از هر نظر محکوم کرده اما از برکناری و تغییر آنها ناتوان است. او همچنین می&amp;zwnj;داند که اگر جای این سه نفر هر کس دیگری را بیاورد آنها نیز همین یا بدتر خواهند بود. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;منصوبان فاسد و نزدیکان فاسد آنها&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای می&amp;zwnj;گوید&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;:&lt;/span&gt; &lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;چند سال قبل درباره مبارزه با فساد اقتصادی، نامه&amp;zwnj;ای به رؤسای قوا نوشتم مکرر می&amp;zwnj;گویند فساد اقتصادی اما این کار به زبان گفتن تمام نمی&amp;zwnj;شود بلکه نیازمند مبارزه عملی است، در عمل چه کار شد؟ در عمل چه کار کردید؟ &amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;سوال خامنه&amp;zwnj;ای از جنس استفهام انکاری است بدین معنا که فساد در ایران تعقیب نمی&amp;zwnj;شود و ظاهرا نشدنی است. او از یک سو باید از منصوبان فاسد و نزدیکان فاسد آنها دفاع کند یا برخی از آنها را به حال خود وابگذارد، اما از سوی دیگر مجبور است خود را از فساد با سخنانی از این دست مبرا سازد.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;بی&amp;zwnj;ترمزها&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای که &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۶&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; سال دو دولت رفسنجانی و خاتمی را با به میدان آوردن کفن&amp;zwnj;پوشان و نیروهای لباس شخصی از حرکت&amp;zwnj;هایی باز می&amp;zwnj;داشت که مورد نظرش نبودند، اکنون با گروه&amp;zwnj;هایی مواجه است که همین کار را با نیروهای وفادار به خودش &amp;nbsp;می&amp;zwnj;کنند و ممکن است روزی به سراغ خود او نیز بیایند.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;او به درستی از این تحول نگران است: &amp;laquo;البته گله امروز من از برخی سران و مسئولان موجب نشود عده&amp;zwnj;ای راه بیفتند و علیه این و آن شعار دهند که با این کار هم مخالف هستیم.&amp;raquo; او هم&amp;zwnj;چنین می&amp;zwnj;داند گروه&amp;zwnj;هایی از این بسیجی&amp;zwnj;ها و لباس شخصی&amp;zwnj;ها که &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;نماینده&amp;zwnj;اش&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; در روزنامه کیهان آنها را بی&amp;zwnj;ترمز&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; می&amp;zwnj;نامد، به هشدارهای وی توجهی نخواهند کرد: &amp;laquo;کسانی که راه می&amp;zwnj;افتند و شعار می&amp;zwnj;دهند اگر واقعاً حزب&amp;zwnj;اللهی و مؤمن هستند بدانند که این کارها به ضرر کشور و خلاف شرع است و اگر هم اعتنایی به این حرفها ندارند که حسابشان جداست.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
	&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
	&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای برچسب&amp;zwnj;زنی و اتهام&amp;zwnj;زنی را تنها برای خود می&amp;zwnj;خواهد و حمله به افراد را صرفا بر اساس اشارات خود. او متوجه نیست که وقتی قطار برچسب&amp;zwnj;زنی و حمله به راه افتاد، همه سوار آن می&amp;zwnj;شوند و همه از آن متضرر خواهند شد: &amp;laquo;این&amp;zwnj;که عده&amp;zwnj;ای برخی را ضد ولایت و ضد بصیرت بنامند و شعار بدهند نظیر آنچه اخیراً در قم روی داد، اقدامی غلط است و بنده کاملاً مخالف این کارها هستم که قبلاً هم نظیر آن در مرقد مطهر حضرت امام اتفاق افتاد و به مسئولان تذکر دادم جلوی این کارها را بگیرند.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;right&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;این در حالی است که گوش احمدی&amp;zwnj;نژاد&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt; و طرفدارانش به &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;خامنه&amp;zwnj;ای &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;نبوده و نیست و آنها در هر دوره یکی از گروه&amp;zwnj;ها یا جناح&amp;zwnj;های قدرت را هدف قرار می&amp;zwnj;دهند. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
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     <comments>https://archive.radiozamaneh.com/politics/2013/02/17/24604#comments</comments>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/taxonomy/term/19366">بسیجی</category>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/taxonomy/term/2987">خاتمی</category>
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 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/definition-tags-137">رفسنجانی</category>
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 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/politics">گوی سیاست</category>
 <pubDate>Sun, 17 Feb 2013 14:16:40 +0000</pubDate>
 <dc:creator>politics</dc:creator>
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    <title>شش نکته کلیدی پیرامون فراخواندن احمدی‌نژاد به مجلس</title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/politics/2012/11/11/21582</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/politics/2012/11/11/21582&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-nevisandeh&quot;&gt;
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            &lt;div class=&quot;field-item odd&quot;&gt;
                    علی افشاری        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;علی افشاری - ماجرای سوال از رئیس جمهور در مجلس از یک طرف تبدیل به کشمکش دو جریان اصلی جبهه اصول&amp;zwnj;گرایان و از طرف دیگر موجب آشکار شدن چالش&amp;zwnj;ها و معادلات سیاسی حاکم بر پشت پرده بلوک قدرت شده است. کشمکش و رویارویی بین جبهه پایداری و اصول&amp;zwnj;گرایان سنتی و میانه&amp;zwnj;رو، شیب تندی پیدا کرده است تا جایی که روح&amp;zwnj;الله حسینیان دچار عارضه قلبی شد.&lt;/p&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;دولت احمدی&amp;zwnj;نژاد نیز در سمت&amp;zwnj;گیری مشابه با بخش افراطی و لایه نظامی و امنیتی اصول&amp;zwnj;گرایان در صحت حد نصاب نمایندگان تشکیک می&amp;zwnj;کند. هیئت رئیسه مجلس نیز مدعی است که معاون پارلمانی دولت، اسامی ۵ نفر از نمایندگانی که امضای خود را پس گرفته&amp;zwnj;اند به موقع و در مهلت مقرر قانونی ارائه نداده است و همچنین پاره&amp;zwnj;ای از نمایندگان حامی فراخواندن احمدی&amp;zwnj;نژاد به مجلس نیز به قول&amp;zwnj;&amp;zwnj;های خود به فراکسیون اصول&amp;zwnj;گرایان مجلس به رهبری غلامعلی حدادعادل عمل نکرده&amp;zwnj;اند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;اما علی&amp;zwnj;رغم اعلام وصول طرح سوال از رئیس جمهور در صحن علنی مجلس، مخالفان کماکان برای جلوگیری از این کار فعال هستند. جلسه غیر&amp;zwnj;علنی مجلس، بستر اصلی فعالیت فراکسیون اصول&amp;zwnj;گرایان برای اقناع اکثریت مجلس بود که احضار احمدی&amp;zwnj;نژاد به مصلحت کشور نبوده و همچنین پاسخ مناسبی به خواست آیت&amp;zwnj;الله خامنه&amp;zwnj;ای در خصوص پرهیز از تنش مقامات سه قوه نیست. اما جریان حامی تاکنون مقاومت کرده است. علی لاریجانی به صراحت در جلسه اعلام وصول طرح فوق اعلام کرد، رهبری نظری در خصوص منع سوال از رئیس جمهور بیان نکرده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;http://radiozamaneh.com/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/015723030_40100.jpg&quot; style=&quot;width: 180px; height: 101px;&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;رصد کردن مواضع خامنه&amp;zwnj;ای و نمایندگان و نزدیکان وی مانند سعیدی نماینده ولی فقیه در سپاه، غلامعلی حدادعادل و سید احمد خاتمی نشان می&amp;zwnj;دهد که سوال از احمدی&amp;zwnj;نژاد خوشایند خامنه&amp;zwnj;ای نیست. البته او مخالفت صریح و علنی را نیز به مصلحت نمی&amp;zwnj;داند. اساس اقدام مجلس، خارج از طرح و توصیه وی به مسئولان ارشد نظام برای مدیریت اختلافات است.&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;به عقیده وی، نظر خامنه&amp;zwnj;ای در خصوص پرهیز از کشاندن اختلافات به میان مردم بوده و ارتباطی به انجام مسئولیت قانونی نمایندگان ندارد. احمد توکلی اگر چه سوال از احمدی&amp;zwnj;نژاد را مفید نمی&amp;zwnj;داند اما توصیه خامنه&amp;zwnj;ای در خصوص پرهیز از اختلاف و تنش بین مسئولان نظام را مشمول این طرح نمی&amp;zwnj;داند. به اعتقاد توکلی، پرهیز خامنه&amp;zwnj;ای مربوط به تحریک است نه مسائل تبیینی مانند سوال از رئیس جمهور. اما روح&amp;zwnj;الله بیگی نماینده میاندوآب و تکاب با اشاره به جلسه فراکسیون اصول&amp;zwnj;گرایان &amp;quot;رهروان ولایت&amp;quot; فاش ساخت که رهبر ایران در پاسخ به لاریجانی در مورد سوال از رئیس جمهور اعلام کرده که در این زمینه نظری ندارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اما رصد کردن مواضع خامنه&amp;zwnj;ای و نمایندگان و نزدیکان وی مانند سعیدی نماینده ولی فقیه در سپاه، غلامعلی حدادعادل و سید احمد خاتمی نشان می&amp;zwnj;دهد که سوال از احمدی&amp;zwnj;نژاد خوشایند خامنه&amp;zwnj;ای نیست. البته او مخالفت صریح و علنی را نیز به مصلحت نمی&amp;zwnj;داند. اساس اقدام مجلس، خارج از طرح و توصیه وی به مسئولان ارشد نظام برای مدیریت اختلافات است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در مجموع می&amp;zwnj;توان این رویداد را حاوی نکات مهمی دانست که به شرح زیر دسته بندی می&amp;zwnj;شود:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; سوال از احمدی&amp;zwnj;نژاد دستمایه رقابت دو فراکسیون اصلی مجلس نهم شده است. در اصل این رویداد نوعی وزن&amp;zwnj;کشی سیاسی برای انتخابات ریاست جمهوری آینده است. مخالفان سوال افرادی چون حدادعادل، روح الله حسینیان، سعدالله زارعی، زاکانی وابسته به فراکسیون اصول&amp;zwnj;گرایان و حامیان ریاست حدادعادل بر مجلس هستند. آنها به عنوان بخشی از طیف نیرو&amp;zwnj;های تندرو و جدید کارگزاران سیاسی، در اندیشه تسخیر کرسی ریاست جمهوری هستند و نمی&amp;zwnj;خواهند شکستی مشابه رقابت بر سر هیات رئیسه مجلس را تجربه کنند. از این&amp;zwnj;رو فراکسیون فوق تمام قد به میدان آمده تا برای اثبات قدرت خود و همچنین تمکین مجلس به توصیه خامنه&amp;zwnj;ای، مانع دومین طرح سوال از رئیس جمهور در صحن علنی مجلس گردد. فراکسیون اصول&amp;zwnj;گرایان در خصوص مضرات این اقدام حتی بیانیه&amp;zwnj;ای نیز صادر کرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; نمایندگان منفرد نیز نقش مهمی در جلو بردن طرح سوال از رئیس جمهور داشتند. این نمایندگان که در دو فهرست انتخاباتی اصلی حکومت جای نداشتند، به طور نسبی استقلال بیشتری دارند. در اصل حضور قوی آنها در مجلس نهم باعث شده تا این مجلس از انتظارات حداکثری خامنه&amp;zwnj;ای فاصله بگیرد. این نمایندگان برای اینکه بتوانند پاسخی به موکلان خود برای پیگیری مشکلات اقتصادی بدهند و تداوم نمایندگی را در گرو حفظ مناسبات خوب با حوزه انتخابیه خویش می&amp;zwnj;دانند، سعی می&amp;zwnj;کنند با حساب&amp;zwnj;کشی، دولت را مقصر وضعیت نابسامان اقتصادی کنونی و به&amp;zwnj;ویژه آشفته بازار ارز نشان دهند. اکثر آنها نمایندگان شهرستان&amp;zwnj;ها هستند و ارتباط مستقیم با مردم منطقه دارند. در نتیجه باید نشان دهند که نسبت به حل مشکلات معیشتی مردم حساسیت دارند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;http://radiozamaneh.com/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/larijanisandahmadinejad5587669.jpg&quot; style=&quot;width: 180px; height: 142px;&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در اصل همراهی لاریجانی با توصیه خامنه&amp;zwnj;ای به پرهیز از تنش، خودداری از پاسخگوئی مستقیم به حملات احمدی&amp;zwnj;نژاد و نبردن دعوا به سطح جامعه است. اما کماکان تضعیف و بی&amp;zwnj;اعتبار سازی احمدی&amp;zwnj;نژاد و دیگر رقبایش را نیز دنبال می&amp;zwnj;کند. به عبارت دیگر توصیه خامنه&amp;zwnj;ای و برخورد دستوری وی نمی&amp;zwnj;تواند جلوی گسترش رقابت&amp;zwnj;ها وتنش&amp;zwnj;های کنونی در بلوک قدرت را بگیرد و آنها را در سطحی کنترل شده مهار کند.&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; علی لاریجانی در مصاحبه با خبرگزاری فارس آشکار ساخت که در صف&amp;zwnj;بندی&amp;zwnj;های جدید داخل اصول&amp;zwnj;گرایان، متوجه ارزش نیرو&amp;zwnj;های منفرد مجلس شده است که به نظر وی ۴۵ درصد نمایندگان مجلس را تشکیل می&amp;zwnj;دهند. اگرچه رقم ادعایی وی با واقعیت تفاوت دارد. اما نیروهای منفرد دست&amp;zwnj;کم ۳۵ درصد نمایندگان مجلس را تشکیل می&amp;zwnj;دهند. فراکسیون رهروان ولایت که به زعامت علی لاریجانی تشکیل شد، توانست اکثریت منفردها را جذب کند و به این ترتیب علی لاریجانی توانست طرح به حاشیه راندن خود در مجلس را خنثی کند. طرحی که خامنه&amp;zwnj;ای در خفا و به صورت غیر مستقیم حامی آن بود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; تقریبا ۸۰ درصد ۷۷ نماینده&amp;zwnj;ای که خواستار احضار احمدی نژاد شده&amp;zwnj;اند، متعلق به فراکسیون رهروان ولایت هستند. مابقی معدودی از چهره&amp;zwnj;های اصلاح&amp;zwnj;طلب و برخی از نمایندگان عضو فراکسیون اصول&amp;zwnj;گرایان و تک چهره&amp;zwnj;ای مانند علی مطهری هستند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;مخالفان همچنین هیات رئیسه را متهم به پذیرش شتاب&amp;zwnj;زده طرح فوق و استقبال تلویحی از آن متهم می&amp;zwnj;کنند. بررسی شواهد تایید می&amp;zwnj;کند که علی لاریجانی موافق احضار احمدی&amp;zwnj;نژاد است و از این طریق، هم می&amp;zwnj;خواهد قدرت خود را به رقبا نشان دهد و هم تصویری از خود را در افکار عمومی به نمایش بگذارد که نسبت به سرنوشت مردم حساس است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در اصل همراهی لاریجانی با توصیه خامنه&amp;zwnj;ای به پرهیز از تنش، خودداری از پاسخگوئی مستقیم به حملات احمدی&amp;zwnj;نژاد و نبردن دعوا به سطح جامعه است. اما کماکان تضعیف و بی&amp;zwnj;اعتبار سازی احمدی&amp;zwnj;نژاد و دیگر رقبایش را نیز دنبال می&amp;zwnj;کند. به عبارت دیگر توصیه خامنه&amp;zwnj;ای و برخورد دستوری وی نمی&amp;zwnj;تواند جلوی گسترش رقابت&amp;zwnj;ها و تنش&amp;zwnj;های کنونی در بلوک قدرت را بگیرد و آنها را در سطحی کنترل شده مدیریت کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; علی لاریجانی مانند عملکرد خود در مجلس هشتم، مسیری متفاوت با وضعیت موجود را دنبال می&amp;zwnj;کند. بین نظرات وی و خامنه&amp;zwnj;ای شکافی محدود وجود دارد. از این&amp;zwnj;رو وی القابی چون &amp;quot;نخبه بی&amp;zwnj;بصیرت&amp;quot; و یا &amp;quot;ساکتین فتنه&amp;quot; را دریافت کرده است. وی به همراه بخش سنتی و قدیمی اصول&amp;zwnj;گرایان در برابر طرح مطلوب رهبر ایران در سطحی محدود مقاومت کرده و این گروه توانسته&amp;zwnj; موجودیت خود را بر فضای سیاسی حاکمیت تحمیل کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;لاریجانی اگر می&amp;zwnj;خواست کاملا از خامنه&amp;zwnj;ای تبعیت کند، نباید برای انتخابات ریاست مجلس نهم نامزد می&amp;zwnj;شد. لاریجانی قدم در راهی گذاشته که پیش از آن هاشمی رفسنجانی پیموده بود. تبعیت وی از ولایت فقیه بیشتر جنبه شعاری و ظاهری دارد ولی در عمل ساز خود را می&amp;zwnj;نوازد. البته وی قائل به تقابل با خامنه&amp;zwnj;ای نیست، بلکه می&amp;zwnj;کوشد اعتماد او را بدست آورد و شایستگی خود ر ا برای تحقق انتظارات وی ثابت کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;http://radiozamaneh.com/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/payedari44987605.jpg&quot; style=&quot;width: 180px; height: 126px;&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;جبهه پایداری و فراکسیون اصول&amp;zwnj;گرایان گرچه در حال حاضر موضع مشابهی با دولت احمدی&amp;zwnj;نژاد پیدا کرده&amp;zwnj;اند و ظاهرا در مقام دفاع از وی قرار دارند؛ اما در واقع احمدی&amp;zwnj;نژاد مسئله آنها نیست. آنها بالا گرفتن تنش بین احمدی&amp;zwnj;نژاد و مجلس را به نفع بخش میانه&amp;zwnj;رو اصول&amp;zwnj;گرایان و اصول&amp;zwnj;گرایان منتقد وضع موجود می&amp;zwnj;دانند که توازن قوا را به ضرر آرایش مطلوب خامنه&amp;zwnj;ای و بخش تندروی اصول&amp;zwnj;گرایان به هم می&amp;zwnj;زند.&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;لاریجانی در عین حال ایفای نقش محدود را نمی&amp;zwnj;پذیرد. وی در این مسیر از حمایت نیرو&amp;zwnj;های سنتی و پراگماتیست اصول&amp;zwnj;گرایان و به&amp;zwnj;خصوص روحانیت هوادار نظام سیاسی نیز برخوردار است که معتقدند نظام باید بر اساس مدل حکمرانی پیش از سال ۱۳۸۴ اداره شود و زعمای جناح راست و حوزه&amp;zwnj;های علمیه در اعمال ولایت مشارکت داشته باشند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; جبهه پایداری و فراکسیون اصول&amp;zwnj;گرایان اگر چه در حال حاضر موضع مشابهی با دولت احمدی&amp;zwnj;نژاد پیدا کرده&amp;zwnj;اند و ظاهرا در مقام دفاع از وی قرار دارند؛ اما در واقع احمدی&amp;zwnj;نژاد مسئله آنها نیست. آنها بالا گرفتن تنش بین احمدی&amp;zwnj;نژاد و مجلس را به نفع بخش میانه&amp;zwnj;رو اصول&amp;zwnj;گرایان و اصول&amp;zwnj;گرایان منتقد وضع موجود می&amp;zwnj;دانند که توازن قوا را به ضرر آرایش مطلوب خامنه&amp;zwnj;ای و بخش تندروی اصول&amp;zwnj;گرایان به هم می&amp;zwnj;زند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آنها زمانی از عبور از احمدی&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;نژاد دفاع خواهند کرد که این منجر به تغییر محسوس در وضعیت سیاسی موجود نشود و موقعیت آنها در قدرت به خطر نیفتد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;از این رو آنها فعلا به صورت تاکتیکی از اقتدار احمدی&amp;zwnj;نژاد در جایگاه ریاست جمهوری دفاع می&amp;zwnj;کنند. البته وجود دشمن مشترک و تغییرات در موازنه قوا ممکن است جریان احمدی&amp;zwnj;نژاد، جبهه پایداری، جمعیت ایثارگران انقلاب اسلامی، جبهه رهپویان و قرارگاه عمار را به جایی برساند که مجبور شوند همکاری&amp;zwnj;های تاکتیکی را به سطح ائتلاف نانوشته در انتخابات ریاست جمهوری یازدهم ارتقاء دهند.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
</description>
     <comments>https://archive.radiozamaneh.com/politics/2012/11/11/21582#comments</comments>
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 <pubDate>Sun, 11 Nov 2012 18:00:23 +0000</pubDate>
 <dc:creator>arezoo</dc:creator>
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    <title>ولایت تکوینی و ولایت تشریعی</title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/10/03/19858</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/10/03/19858&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-sartitr&quot;&gt;
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                    ولایت در قرآن (۳)        &lt;/div&gt;
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                    صالح نظری        &lt;/div&gt;
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&lt;/div&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;صالح نظری &amp;minus; در قسمت اول و دوم مقاله آیات مربوط به ولایت مورد بررسی قرار گرفت، در این قسمت به موضوع &amp;quot;ولایت تکوینی و ولایت تشریعی&amp;quot; خواهیم پرداخت، برای بررسی موضوع نظرات آیت الله صافی گلپایگانی را، که در کتابی به همین نام منتشر شده است، آورده و آن را نقد خواهیم کرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;آیت الله صافی معترف است که موضوع &amp;quot;ولایت تکوینی و ولایت تشریعی&amp;quot; اصطلاح ساخته قرن اخیر است و در قرآن و سنت و روایات چنین واژه&amp;zwnj;ای به کار نرفته است. ایشان می&amp;zwnj;نویسد: &amp;laquo;بديهى است بحث ما در اين رساله، بحثى علمى، اعتقادى و دينى است و بحث لفظى نيست، و فرق نمى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;كند كه خصوص اين لفظ (ولايت تكوينى و تشريعى) در قرآن مجيد و احاديث شريفه باشد يا نباشد؛ زيرا اگر لفظ و اصطلاحى در قرآن و حديث نباشد، دليل بر آن نيست كه معنايى كه از آن اراده مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;شود و براى آن اصطلاح كرده&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;اند، به الفاظ و تعابير ديگر در قرآن و حديث بيان نشده و مورد نفى و اثبات قرار نگرفته باشد و نتوان حق يا باطل بودنِ آن معنى را از كتاب و سنت استفاده نمود. چنانكه بعضى از علماى أعلام در جواب سؤالى كه از ايشان شده، طفره رفته گفته&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;اند: &amp;quot;اين دو لفظ (ولايت تكوينى و تشريعى) در آيات و احاديث وارد نشده است و معنايشان را از كسانى بپرسيد كه آنها را اصطلاح و اختراع كرده&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;اند&amp;quot;.&amp;raquo;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;تعریف ولایت، تکوین و تشریع&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;ولایت مطابق نظر لغویون به معنای دوستی، محبت، یاری و همفکری است و تکوین به معنای آفرینش جهان و تشریع به معنای قانونگذاری است و جمع آنها یعنی ولایت تکوینی (دوستی آفرینش جهان) و نیز ولایت تشریعی (دوستی قانونگذاری) عبارت غلطی است، البته خدا آفریننده جهان است به جهت خالق و قادر بودن و دوست مخلوقات مومن خود می&amp;zwnj;باشد و همچنین است رسول او که حق قانونگذاری دارد ونیز دوست مومنین است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;قدرت تکوینی خداوند از آیه &amp;quot;اذا اراد شیئ ان یقول له کن فیکون &amp;quot; &amp;quot; وقتی به چیزی اراده کند همین که گوید باش پس می&amp;zwnj;باشد&amp;quot; گرفته شده است و به تعبیری &amp;quot;اراده تکوینی&amp;quot; خداوند گفته شده است یعنی آفرینش هر چیزی به صرف اراده خداوند صورت می&amp;zwnj;گیرد و تبدیل &amp;quot;اراده تکوینی&amp;quot; به &amp;quot;ولایت تکوینی&amp;quot; به جهت سوء استفاده بکار رفته است و اینکه خداوند در مقام تشریع (قانونگذاری) برای انسان صاحب اختیار دارای چنین حقی است حق تشریع الهی نامیده می&amp;zwnj;شود بنابراین ولایت تشریعی نیز عبارت نادرستی است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;عبارت کتاب آیت الله صافی با شماره مشخص شده ونقد آن در ذیل آن آمده است:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱ ـ پرهيز از غلوّ و شرك واجب است و ضلالتى از آن بدتر و تاريك&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;تر نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲ ـ پيغمبر و ائمّه اطهار عليهم&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;السّلام انسان&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;هاى نمونه و بشرهاى مافوقند؛ بايد فضايل و مقامات و درجات بلند آنان را تصديق كرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: اینکه از نظر ما چه کسی انسان نمونه است بسته به باورهایمان دارد و اینکه از چه جهتی به موضوع نگاه کنیم نیز انتخاب انسان نمونه متفاوت می&amp;zwnj;شود حال اگر از منظر یک مسلمان به موضوع نگاه کنیم و انسان نمونه را از منظر باورهای دینی بنگریم بدیهی است انتخاب ما بنیانگذار این دین خواهد بود مانند باورمندان به سایر ادیان که از منظر آنان بنیانگذار دینشان انسان نمونه است، اما کلمه بشر مافوق قدری احساسی است و یادآور مافوق بشر است، نکته دوم تعمیم انسان نمونه به ائمه شیعه است این مورد نیز درباره باورمندان به تشیع معنا دارد هر چند اطلاق انسان نمونه درباره امام علی و امام حسین بیشتر معنا دارد تا سایر ائمه که شیعیان عمدتأ اطلاعات چندانی درباره آنان ندارند، بنابراین تصدیق فضائل و مقامات و درجات آنان فقط می&amp;zwnj;تواند بر اساس باورمندی انجام پذیرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳ ـ قول به استقلال بندگان در افعال و كارها، شرك و تفويض، و باطل و محال است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴ ـ استقلال غير خدا در امر خلق و رزق و إماته و إحيا و تدبير امور كاينات كلاً يا بعضاً، يا به عبارت ديگر، ولايت تكوينيه مستقله مطلقه عامّه يا غير عامّه، تفويض و شرك و غلوّ و باطل و محال است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: هیچ موجودی بدون خواست خدا قادر به انجام کاری نیست. این باور همه معتقدان به خداست و آنچه انسان انجام می&amp;zwnj;دهد توانائی است که خداوند به ما داده است و بر اساس آن بشر به میزان توانائیش قادر است در طبیعت تصرف کند و هر چه علم و آگاهیش بیشتر باشد به همان میزان قادر به تصرف در طبیعت است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;نویسنده در عالم خیال سیر می&amp;zwnj;کند، علم داناترین ما انسان&amp;zwnj;ها مانند گردی است در برابر کوه، چه رسد به دایره عمل ما، اما ایشان از تدبیر امور کائنات سخن می&amp;zwnj;گوید! تنها مشکلش این است که مستقل از خدا غلو و شرک است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵ ـ قدرت و ولايت عبد به&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;طور غيرمستقيم و باذن&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;الله و بر حسب نظام متقن الهى بر اماته و احيا و شفاى بيماران، و خلق و رزق و تصرف در اكوان ـ نه به عنوان اداره امور و خلق خلايق و سازمان دادن كاينات، بلكه طبق حكم مصالح عارضى و ثانوى در داخل اين سازمان ـ شرك و غلوّ و تفويض نيست، بلكه اعطاى اين قدرت به بعضى از بندگان، طبق حكمت و مصلحت لازم است. و اطلاق برخى از أسمأَ الحسنى بر عبد، به لحاظ افعالى كه از عبد طبق اين قدرت و ولايت صادر مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;شود، با وجود قرينه حاليّه يا مقاليّه&amp;nbsp;اى كه نحوه اطلاق آن اسم را، و اينكه به ملاحظه اتّصافِ ذات به&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;طور استقلال به مبدء آن نيست، معلوم سازد، جايز است، چنانكه عهده&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;دار بودن بشر مناصبى را ـ مانند ملائكه ـ غلوّ نمى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;باشد و با بشريّت او منافى نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: ایشان قدرت تصرف در کائنات را به اذن الله مجاز می&amp;zwnj;داند و بلکه لازم و به حکمت و مصلحت می&amp;zwnj;داند اما توضیح نمی&amp;zwnj;دهد که چه حکمت و چه مصلحتی باعث این الزام است و اینکه چه نیازی به این دخالت وجود دارد، آیا به صرف اینکه منافی بشریت نیست کافی برای پذیرش این عقیده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بشر امروز نمی&amp;zwnj;تواند به اندازه یک ثانیه گردش زمین به دور خودش را تغییر دهد می&amp;zwnj;تواند تصرف در کائنات کند؟؟ چگونه قابل فهم است که خداوند به کسی بنا به حکمت و مصلحتش چنین اجازه&amp;zwnj;ای داده است؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶ ـ چنانكه تصرّف و ولايت مذكور در بند &amp;quot;۵&amp;quot; به اعطاى قدرت بر تصرّف از جانب خدا جايز است، به واسطه علوم اكتسابى و يا به تعليم خدا و علوم لدنّى به اسباب و مسبّبات نيز به&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;طور كلّى يا جزئى ممكن است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: تصرف در حد محدود &amp;ndash; چیزی در حد صفر مطلق &amp;ndash; در مقیاس کائنات توسط علوم اکتسابی صورت می&amp;zwnj;پذیرد و اما تصرف با تعلیم الهی و علم لدنی تخیلی بیش نیست، حداقل اینکه ادعای بلا دلیل است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷ ـ ولايت و قدرت تصرّف در اكوان، به اين نحو كه اشياء را خداوند متعال تكويناً فرمانبر و مطيع او قرار دهد، مانند نرم شدن آهن براى داود نبى، على نبيّنا وآله وعليه السّلام، جايز است و شرك و تفويض نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: اکوان (طبیعت) تابع هیچ کس نیست بلکه تابع خواص موجود در آنهاست، نرم شدن آهن تابع میزان حرارتی است که به آن داده می&amp;zwnj;شود، داود نبی به آن آگاهی داشت لذا موفق به نرم کردن آهن بود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۸ ـ عهده&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;دار بودنِ اداره تمام سازمان كاينات، به&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;طور غير مستقل و طبق قضا و قدر الهى و به عنوان مأموريّت از جانب خدا، و عاملِ اجراى اراده حق و وسيله و واسطه بودن ـ مانند ملائكه مقسّمات و مدبّرات ـ شرك و غلوّ و منافى با توحيد نيست، امّا چون با بسيارى از آيات قرآن و احاديث، منافات دارد، قولِ به آن در حق نبىّ و ولىّ، محتاج به دليل قاطعى است كه قرينه بر صرفِ آيات و روايات مزبور از ظواهرشان باشد. بله، به&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;طور موجبه جزئيّه اين مقام براى ملائكه و بشر ثابت است و شكّى در آن نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: خوشبختانه جناب صافی اداره کل کائنات را توسط بشر را رد می&amp;zwnj;کند (برایش دلیل قاطع ندارد)، اما در حد محدود را می&amp;zwnj;پذیرد و نام آن را ولایت تکوینی می&amp;zwnj;گذارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۹ ـ ولايت شخص بر نفس خود و آنچه مسخّر بشر است، تفويض نمى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: رفتار فیزیکی بشر دو گونه است رفتاری که خارج از اراده بشر است مانند فعالیت سلولها، کبد و کلیه... که بیش از ۹۹درصد رفتار فیزیکی بدن را تشکیل میدهد و رفتارهای ارادی انسان و این همان چیزی است که ما بر آن تسلط داریم و جناب صافی آن ولایت تکویتی می&amp;zwnj;نامد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۰ ـ بعضى خوارق و معجزاتى كه به وسيله انبيا و اوليا اظهار مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;شود، فعل خدا است و برخى معجزات، فعلِ شخص نبىّ يا ولىّ است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: هیچ معجزه&amp;zwnj;ای کار نبی نیست، قرآن معجزه را &amp;quot;آیت&amp;quot; نامیده یعنی نشانه خدا، نه نشانه رسول لذا انبیاء همزمان با سایر مردم نسبت به آنچه اتفاق می&amp;zwnj;افتاد آگاهی می&amp;zwnj;یافتند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۱ ـ ولايت تكوينيّه ـ كه تكوينيّه صفت ولايت باشد ـ به هر قسم و به هر نحو فرض وتصوّر شود، حتّى مستقلّه و ذاتيّه، حادث و غير ازلى و تكوينى خواهد بود، و از سنخ ولايت ازليّه و غير حادثه نيست. و اگر تكوينيّه صفت به حال متعلق موصوف گرفته شود، شامل ولايت ازليّه الهيّه بر امور تكوينيّه نيز مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;شود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۲ـ علت فاعلى آفرينش، اراده خداوند متعال است، و پيغمبر و ائمّه اطهار، عليهم الصّلوةُ والسَّلام، علّت غايى مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;باشند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: اشکال اول این است که پیامبر و ائمه شیعه را بهم می&amp;zwnj;چسباند تا هر آنچه به پیامبر مربوط است به ائمه شیعه هم مربوط باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;هیچ نشانه&amp;zwnj;ای در قرآن و سنت وجود ندارد که نشان دهد هدف غائی از خلقت، نبی گرامی بوده است چه رسد به ائمه شیعه اما اینکه انبیاء عظام انسانهای برگزیده بوده&amp;zwnj;اند و اسوه و الگوی سایر بشر بوده&amp;zwnj;اند قرآن به آن تاکید دارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;این نوع تفکر که علت غائی آفرینش کائنات شخص و یا اشخاص معینی بوده است همه آفرینش و از جمله سایر ابناء بشر را صرفأ وسیله و ابزار آن هدف معرفی می&amp;zwnj;کند و به تعبیری همه انسان&amp;zwnj;ها را بی ارزش و صرفأ ابزار آن اشخاص می&amp;zwnj;داند و این بر خلاف روح آیات قرآنی است، قرآن همه مخلوقاتش را در مسیر سیر الی الله می&amp;zwnj;داند و هر کس را به میزان ایمان و عمل صالحش می&amp;zwnj;سنجد و برای همه به میزان تقرب و عبودیتش ارج می&amp;zwnj;نهد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۳ـ اعتقاد به اينكه تكويناً، وجود امام و منزلت و اثر او در عالم كبير، به منزلت و اثر قلب در عالم صغير، و هسته مركزى اتم و شمس در منظومه شمسى است، و به عبارت ديگر، تكويناً وجود پيغمبر و امام، در تربيت و رسيدن فيض الهى به ساير ممكنات و بقا و فعليّت استعدادات و رشد و كمال آنها مؤثّر است، غلوّ و شرك و تفويض نيست و احاديث معتبر بر آن دلالت دارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: استفاده از تشبیهات و استدلال بر پایه آن دور از شان یک بحث علمی و عقیدتی است، اینکه در عالم وحوش قوی ضعیف را از بین می&amp;zwnj;برد مجوز پایمال کردن حقوق اقلیت بر اکثریت نمی&amp;zwnj;شود و نیز اینکه همه سیارات دور خورشید می&amp;zwnj;چرخند مجوز چرخش انسان&amp;zwnj;های ضعیف دور انسان قوی نمی&amp;zwnj;شود، استفاده از هر تشبیهی در استدلال گاهی به ضد خود بدل می&amp;zwnj;شود، در گردش اجرام همه به دور هم می&amp;zwnj;چرخند و این چرخش به دو عامل بستگی دارد، یک اینکه متناسب با جرمشان می&amp;zwnj;باشد و دوم اینکه متناسب با سرعت دورانی (نیروی جانب به مرکز) آنان است مثلأ دو هم جرم، بنا به تعادل در مجذور فاصله شان (نیروی جاذبه) و سرعت دورانی (نیروی جانب به مرکز) به دور هم و همسان می&amp;zwnj;چرخند و در اجرام نابرابر باز هر دو نسبت به هم می&amp;zwnj;چرخند اما دایره چرخش جرم کوچکتر بزرگتر است از دایره چرخش جرم بزرگتر، آیا می&amp;zwnj;توان گفت آنکه جرم بیشتر دارد فضلیت بیشتری دارد یا آنکه سرعت دورانی بیشتری دارد افضل است؟ آیا می&amp;zwnj;توان گفت قلب از کبد مهمتر است؟ هر عضوی به نوبه خود دارای اهمیت است، نبود هر عضوی خلل در عالم صغیر (جسم انسانی) است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اما اینکه تکوینأ وجود پيغمبر و امام، در بقا و فعليّت استعدادات و رشد و كمال انسانها مؤثّر است، نیز نادرست است. اولأ بقای انسان&amp;zwnj;ها به وجود شخص دیگر وابسته نیست ثانیأ هزاران راه در رشد انسان موثر است و یکی از آنها از راه تربیت انبیاست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آنچه تکوینأ خداوند در وجود انسان قرار داده، فطرت کمال جوئی است تا راه رشد را بیابد و ارسال انبیا جهت یادآوری همین فطرت است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۴ـ همانطور كه عالم صغير و غيبِ وجود بشر را، عقل او اداره مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;نمايد و بر آن حكومت دارد، همين&amp;nbsp;طور امام براى اداره امور عباد و رتق و فتق و حلّ و فصل و تنظيم شؤون آنها، حكومت و ولايت دارد، كه جامعه را به سوى فلاح و رستگارى رهبرى نمايد، هر چند اين رهبرى و ولايت، جعلى، و رهبرى عقل و فرمانبرى اعضا و جوارح از او تكوينى است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: باز استفاده از تشبیه، چون در بدن عقل سایر اعضا را اداره می&amp;zwnj;کند پس امام آنهم ائمه شیعه باید بر مردم حکومت کنند!! قبل از اسلام را بگذریم، چون در طول ۱۴۰۰ سال ائمه شیعه (به جز ۴ سال) حکومت نکردند، جامعه بشری وحشیانه و غیر عقلانی اداره شده و روی فلاح و رستگاری ندیده است!! اگر این چنین است چرا حکومت نکردند و باعث فلاکت جامعه بشری! شدند مگر عقل از اعضا بدن اجازه می&amp;zwnj;گیرد تا به آنها فرمان دهد؟ مگر اعضا مجبور به اطاعت از عقل نیستند؟ ایشان فرمان می&amp;zwnj;داد وما هم مجبور به اطاعت بودیم!! چرا چنین نشد و نخواهد شد؟ زیرا این تشبیه نادرست است، نه آنان بدون خواست مردم حکومت می&amp;zwnj;کنند (آنهم اگر بخواهند) و نه مردم مجبور به اطاعت هستند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۵ـ بر حسب ظواهر آيات و احاديث، خلق مجردات و ارواح و ماديّات و اجسام از عدم، بلاواسطه فعل خدا است و تمام اينها خلق او مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;باشند، و فاعل و علّت حقيقى فقط ذات بى&amp;nbsp;زوال او است، و اطلاق علّت، به معنى مؤثّر در وجود و خلق شىء، در حق چيزى و كسى جز او، جايز نيست، امّا خلق چيزى از مادّه ـ مثل صورت پرنده از گل، يا شير از صورت پرده ـ به اذن و طبق مصالح ثانوى و عارضى، جايز است، و واقع شده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: ایشان خلق به مفهوم از عدم به هستی شدن را مخصوص خدا می&amp;zwnj;داند اما جان بخشیدن به موجود بی جان را به اذن خدا ممکن می&amp;zwnj;داند، مثال اش جان بخشیدن به پرنده گلی توسط حضرت عیسی به اذن خداست (نقل از قرآن) و زنده کردن تصویر شیر در پرده توسط امام رضا در مجلس مامون عباسی است (نقل از روایت) که صحت روایت قابل اثبات نبوده و مورد تردید است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۶ـ پيغمبر و امام، مجارىِ فيض خدا مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;باشند، به اين معنى كه علّت غايى آفرينش هستند، و براى آنها و به طفيل وجود آنها عالم آفريده شده و فيض وجود به تمام كاينات، به طفيل و بركت وجود آنها مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;رسد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: همه مطالب گفته شده مقدمه بود تا این جمله گفته شود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;مجاری فیض خدا بیشمار است و پیامبران الهی و اولیاء خدا هم از مجاری فیض خدا هستند و باور به محدود کردن آن به عدد انگشتان دست جفا در حق سایر انبیاء و اولیاء خداوند است، غایت آفرینش نیز همه موجودات هستند نه تعدادی محدود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;تصور اینکه همه موجودات از جمله همه انسانها برای این تعداد محدود و به طفيل وجود آنها آفريده شده&amp;zwnj;اند تخیلی بیش نیست و هیچ آیه&amp;zwnj;ای از قرآن چنین چیزی را تایید نمی&amp;zwnj;کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اگر باور کنیم که فیض وجود (عامل بقای موجودات) توسط غیر خدا است عین شرک و نسبت به آن موجودات غلو است، به تعبیر دیگر باید باور کنیم اگر آنان نباشند و یا نخواهند هیچ موجودی بقا نخواهند داشت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;تفویض یعنی خداوند بعضی از اختیارات خود را به دیگری واگذار نموده وخود را بازنشسته کرده است و جمله فوق واگذار کردن بقای موجودات به دیگران و باز نشسته کردن خداست و تفئیض شرک است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اگر بپذیریم فیض وجود (عامل بقای موجودات) توسط موجودی غیر خدا صورت می&amp;zwnj;گیرد پس رزق و روزی و حیات و ممات همه موجودات دست آنان است و عملأ آنان خدایان سایر موجودات هستند و بهتر است آنان عبادت شوند و از آنان کمک و استعانت خواست و این دقیقأ بر خلاف قرآن است که از ما می&amp;zwnj;خواهد &amp;quot;فقط خدا را بپرستیم و فقط از او یاری جوئیم&amp;quot; و این جمله روزانه حداقل ده بار تکرار کنیم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;مهمتر اینکه به فرض محال خداوند کس یا کسانی را برای افاضه فیض انتخاب کرده است، جناب صافی از کجا فهمیده&amp;zwnj;اند خداوند این ۱۴ نفر مورد نظر او را برای افاضه فیض در نظر گرفته است؟ هر متولی دینی می&amp;zwnj;تواند چنین ادعایی درباره صاحب دین خود بنماید، چرا باید فقط متولیان تشیع، حق چنین ادعایی را داشته باشند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اشکال ندارد که فردی از شدت محبت به اولیاء دینش از آنان اسطوره بسازد و در حق آنان بزرگ نمایی کند اما به خدایی رساندن آنان جز گمراهی را نصیب خود نمی&amp;zwnj;کند خصوصأ که او توسط گروهی عوام عالم دین شناخته شود که باعث گمراهی دیگران نیز می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۷ـ اينكه گفته شود، پيغمبر و امام مجارى فيض هستند، به اين معنى كه مشيّت الهيّه بر اين قرار گرفته است كه فيض خود را طبق تقديرات الهيّه و واقعيّه از اين مجارى ـ كه مأمور و مكلّف و بلكه مفطور (نه به حدّ الجاء و اجبار) به فيض&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;رسانى هستند، به فيض&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;گيرندگان ـ إعطا كند، غلوّ و تفويض نيست و با مطالب حكما در صدور واحد از كثير و ربط حادث به قديم ارتباط ندارد و عباراتى مانند:&lt;strong&gt; &amp;quot;إِرادَةُ الرَّبِّ في مَقاديرِ اُمُورِه تَهْبِطُ اَلَيْكُمْ&amp;quot;&lt;/strong&gt; مويّد اين كلام است. و اگر گفته شود اين سخن هم ـ با فرض اختيار فيض&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;رسان ـ از شائبه تفويض خالى نيست گفته مى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;شود، در صورتى تفويض است كه به فرض عدم فيض&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;رسانى، مستقيماً يا از مجارى ديگر امكان افاضه فيض نباشد و اختيار آنها تمام علّت در رسيدن فيض به سايرين باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: در اینجا جناب صافی می&amp;zwnj;داند که مرتکب تفویض شده است و برای فرار از این اتهام می&amp;zwnj;گوید چون به فرض عدم فيض&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;رسانى پیامبر و امام خداوند می&amp;zwnj;تواند مستقيماً يا از مجارى ديگر افاضه فيض کند پس تفویض نیست، عجبا بر اساس باور جناب صافی پیامبر و ائمه شیعه علت غائی آفرینش&amp;zwnj;اند وخلقت همه کائنات به خاطر آنها بوده و خداوند بقای موجودات را به خواست آنان قرار داده و همه کارهای خدائیش را به آنان واگذار کرده و خود را بازنشسته کرده و جناب صافی آنقدر آنان را جسور می&amp;zwnj;داند که ممکن باشد حتی از این واگذاری سرباز زنند و به ما اطمینان می&amp;zwnj;دهد که اگر چنین شد، باز خود خدا استین بالا می&amp;zwnj;زند و بقای وجود ما را تضمین می&amp;zwnj;کند!! و چون چنین اطمینانی هست پس تفویض نیست!!&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;تا اینجا مسئله ولایت تکوینی مورد بررسی قرار گرفت حال باید دید نظر ایشان درباره ولایت تشریعی چیست؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۸ـ ولايت حقيقى بر تشريع احكام و جعل قوانين وكليّه نظامات و در تمام شؤون، مختصّ به ذات احديّت است، و قبول نظام&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;هاى غير شرعى، و آنچه منبعِ آن احكام و قواعد شرع و اوامر و نواهى و مقرّرات دينى نباشد، جايز نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: چنین نیست که همه قوانین و نظامات در تمام شئون توسط خداوند به پیامبران وحی شود، قوانین بر حسب نیاز&amp;zwnj;های زمانه و در حد محدود توسط انبیاء بیان شده و عمومأ شامل کلیات است و گاهی وارد جزئیات شده است، در مورد اسلام پیامبر گرامی در حد نیاز زمانه خود که محصور در جزیره العرب بوده احکامی را از طرف خذاونذ تشریع نموده است به عنوان مثال حدود ۵۰ آیه از آیات قرآن بیان احکام است که آیات الاحکام معروف است و مقداری از احکام هم به عنوان سنت نبوی وجود دارد که نیاز قوانین زمانه خود را می&amp;zwnj;داد اعم از احکام عبادی یا احکام حکومتی، البته بعضی احکام خکومتی الان نیز کارساز است و دسته از آن هم اکنون کارائی خود را از دست داده است مانند احکام برده داری، جزیه و...&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بسیاری از قوانین مورد نیاز جامعه هست که اصلأ در کتاب و سنت وجود ندارد، اگر بنا بود تمام قوانین مورد نیاز جامعه تا آخرالزمان توسط نبی اکرم بیان شود نیاز به یک کتاب خانه بود که بتوان آن کتب قوانین را در آن جا داد، ایشان به عنوان عضو شورای نگهبان بسیاری از قوانین را به جهت خلاف شرع رد می&amp;zwnj;کرد و بعد به عنوان عضوی از مجمع تشخیص مصلحت نظام آن قانون را تصویب می&amp;zwnj;نمود به تعبیری قوانین غیر جایز را جایز می&amp;zwnj;نمود بنابراین ادعای فوق بی اعتبار است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۹ـ تفويض مطلق امر دين به پيغمبر و امام، كه به&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;طور كلّى و بدون وحى و الهام، هر چه را بخواهند حلال، و هر چه را بخواهند حرام نمايند، باطل است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: ظاهرأ از نظر جناب صافی آن احکامی که در قرآن است وحی است و آن احکامی که در سنت نبوی است الهام به رسول است و نیز آن احکامی که ائمه شیعه بیان کرده&amp;zwnj;اند الهام است، البته دلیل قانع کننده&amp;zwnj;ای برای الهام به ائمه وجود ندارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۰ـ تفويض بيان حكم به امام، كه هر وقت مصلحت بداند &amp;quot;ما أوْحَى اللهِ بِهِ اِلَى النَّبي&amp;quot; را بيان كند، جايز است و اشكالى ندارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: این توجیهی برای الهی نشان دادن احکام صادره از ائمه شیعه است که نشان دهد آنان از آنچه به رسول نازل شده اطلاع دارند ولی چون پیامبر مصلحت نمی&amp;zwnj;دانست آن را بیان کند بیان آن احکام را به ائمه واگذار نموده است تا آنان در وقت مقتضی آن احکام را بیان نمایند، این توجیه برای آن است که شبهه جعل احکام به ائمه وارد نشود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۱ـ تفويض تشريع، فى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;الجمله و در موارد معدوده و مقتضيه ـ مثل تعيين بعضى امور كه بر حسب روايات مصلحتِ آزمايش و تربيت عباد يا مصلحت ديگر نُبَوات اقتضا نمايد ـ به شخص پيغمبر جايز است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: یعنی پیامبر می&amp;zwnj;تواند بدون الهام از خدا جعل احکام کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۲ـ نظام امامت و حكومت شرعى و اسلامى، از عصر پيغمبر صلى&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;الله عليه و آله تا حال باقى و مستمر و برقرار است، و در هيچ عصر و زمان، و در هيچ نقطه و مكان منقطع نشده و نخواهد شد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: ظاهرأ جناب صافی چشم به واقعیت بسته است و خیال می&amp;zwnj;کند که حکومت شرعی و اسلامی پیامبر گرامی هنوز هم ادامه دارد و حتی این حکومت عالمگیر هم هست! واقعأ جای تعجب است که یک عالم دینی مدعی مرجعیت تا این حد برای استحمار شیعیان متوسل به هر رطب و یابسی برای به کرسی نشاندن عقاید خود بشود!&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۳ـ بر هر مسلمان واجب است كه از اين نظام پيروى نموده و آن را حاكم بداند و فقط اطاعت از اين نظام نمايد و هر كس از اطاعت اين نظام بيرون باشد، از ولايت و اطاعتِ خدا خارج است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد: جناب صافی از کدام نظام باید پیروی کنیم؟ از ۱۴۰۰ سال فقط ۱۰ سال عصر رسول گرامی و ۵ سال عصر امام علی حکومت اسلامی بوده که گذشته است و اکنون نیز ۳۳ سال حکومت سلطنتی مطلقه استبدادی اسلامی را شاهد هستیم، فقط از کدام نظام اطاعت کنیم که اگر اطاعت نکنیم از ولایت!! و اطاعت خدا!! خارج شده ایم؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;نتیجه ولایت تکوینی و ولایت تشریعی که اینهمه اصرار بر آن می&amp;zwnj;شود مشخص شد: &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;minus; ائمه شیعه را خداگونه ببین و بدان &amp;quot;پيغمبر و امام، مجارىِ فيض خدا مى&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;باشند، به اين معنى كه علّت غايى آفرينش هستند، و براى آنها و به طفيل وجود آنها عالم آفريده شده و فيض وجود به تمام كاينات، به طفيل و بركت وجود آنها مى&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;رسد&amp;quot;.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;minus; &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;بر هر مسلمان واجب است كه از اين نظام (حکومت ائمه و فقهای شیعه) پيروى نموده و آن را حاكم بداند و فقط اطاعت از اين نظام نمايد و هر كس از اطاعت اين نظام بيرون باشد، از ولايت و اطاعتِ خدا خارج است.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;***&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;● ضمیمه:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;ولایت &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;در نهج البلاغه&lt;/strong&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;http://radiozamaneh.com/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/nahjolbelaghah.png&quot; style=&quot;width: 119px; height: 164px; float: left;&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;بحث &amp;quot;ولایت در قرآن&amp;quot; موضوع بخش&amp;zwnj;های یک تا سه این نوشته بود. در قسمت اول و دوم مقاله آیات مربوط به ولایت مورد بررسی قرار گرفت، در قسمت سوم موضوع &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&amp;quot;ولایت تکوینی و ولایت تشریعی&amp;quot; نقد شد. اینک در این ضمیمه، به موضوع ولایت در نهج البلاغه می&amp;zwnj;پردازیم و دیدگاه امام علی را در این باره جویا می&amp;zwnj;شویم.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;از مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; در نهچ البلاغه&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; معانی مختلفی به دست می&amp;zwnj;آید که ذیلأ به آن می&amp;zwnj;پردازیم.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;I&lt;/span&gt;. &lt;strong&gt;عباراتی که &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; استفاده شده و مراد آن رویگردانی و بازگشتن است.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱) عِبَادَ اللَّهِ إِنَّ الدَّهْرَ يَجْرِي بِالْبَاقِينَ كَجَرْيِهِ بِالْمَاضِينَ لَا يَعُودُ مَا قَدْ وَلَّى مِنْهُ وَ لَا يَبْقَى سَرْمَداً مَا فِيهِ فِعَالِهِ كَأَوَّلِهِ (خطبه ۱۵۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى بندگان خدا، زمانه براى آيندگان آن طور مى&amp;rlm;گذرد كه براى گذشتگان گذشت و چرخ زمان به عقب بر نمى&amp;rlm;گردد و چيزى سرمدى و جاودانه نمى&amp;rlm;ماند پايان كار روزگار هماند كارهاى نخستين آن است&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲) وَ أَنَا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ كَالصِّنْوِ مِنَ الصِّنْوِ وَ الذِّرَاعِ مِنَ الْعَضُدِ وَ اللَّهِ لَوْ تَظَاهَرَتِ الْعَرَبُ عَلَى قِتَالِي لَمَا وَلَّيْتُ عَنْهَا وَ لَوْ أَمْكَنَتِ الْفُرَصُ مِنْ رِقَابِهَا لَسَارَعْتُ إِلَيْهَا (نامه ۴۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;من و رسول خدا (صلّى اللَّه عليه و آله) چون دو شاخه هستم از يك درخت و مثل پيوستگى آرنج به بازو. قسم به پروردگار اگر عرب در جنگ با من متحد شود روى از آنان بر نمى&amp;rlm;گردانم و اگر مهلت دهد به جنگ به همه آنها خواهم شتافت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;I&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;I&lt;/span&gt;. &lt;strong&gt;عباراتی که &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; استفاده شده &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;مراد از آن&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;دوستی است&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱) ثُمَّ تَقُولَ عِبَادَ اللَّهِ أَرْسَلَنِي إِلَيْكُمْ وَلِيُّ اللَّهِ وَ خَلِيفَتُهُ لِآخُذَ مِنْكُمْ حَقَّ اللَّهِ فِي أَمْوَالِكُمْ فَهَلْ لِلَّهِ فِي أَمْوَالِكُمْ مِنْ حَقٍّ فَتُؤَدُّوهُ إِلَى وَلِيِّهِ&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;فَإِنْ قَالَ قَائِلٌ لَا فَلَا تُرَاجِعْهُ وَ إِنْ أَنْعَمَ لَكَ مُنْعِمٌ فَانْطَلِقْ مَعَهُ مِنْ غَيْرِ أَنْ تُخِيفَهُ أَوْ تُوعِدَهُ أَوْ تَعْسِفَهُ أَوْ تُرْهِقَهُ فَخُذْ مَا أَعْطَاكَ مِنْ ذَهَبٍ أَوْ فِضَّةٍ (نامه ۲۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و بعد بگو: اى بندگان خدا مرا ولىّ خدا و خليفة اللَّه براى گرفتن حق اللَّه به سوى شما فرستاده آيا در ميان اموال شما حق اللَّه وجود دارد كه بگيرم و به دست ولى اللَّه بدهم؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اگر كسى گفت: نه، با او كارى نداشته باش و اگر كسى گفت: آرى نزد من هست بدون آنكه او را بترسانى و يا بر او سختگيرى كنى همراهش برو و از طلا و نقره هر چه مى&amp;rlm;دهد بگير&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳) وَ مِنْ هَذَا الْعَهْدِفَإِنَّهُ لَا سَوَاءٌ إِمَامُ الْهُدَى وَ إِمَامُ الرَّدَى وَ وَلِيُّ النَّبِيِّ وَ عَدُوُّ النَّبِيِّ (نامه ۲۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آن امام كه به نيكبختى دعوت مى&amp;rlm;كند آن امامى نيست كه به گمراهى دعوت مى&amp;rlm;نمايد و آنكه دوست رسول اللَّه (صلّى اللَّه عليه و آله) است آن نيست كه دشمن پيامبر است&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴) انَّ وَلِيَّ مُحَمَّدٍ مَنْ أَطَاعَ اللَّهَ وَ إِنْ بَعُدَتْ لُحْمَتُهُ وَ إِنَّ عَدُوَّ مُحَمَّدٍ مَنْ عَصَى اللَّهَ وَ إِنْ قَرُبَتْ قَرَابَتُهُ (کلمات قصار ۹۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;دوست پيامبر حضرت محمّد (ص) كسى است كه اطاعت پروردگار كند، هر چند كه با پيامبر نسبت فاميلى نداشته باشد و دشمن حضرت محمّد (ص) كسى است كه معصيت پروردگار كند، اگر چه از اقوام نزديك آن گرامى باشد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;I&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;II&lt;/span&gt;. &lt;strong&gt;عباراتی که &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; استفاده شده &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;مراد از آن خونخواهی است&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱) أَنَا بِالْأَمْسِ صَاحِبُكُمْ وَ الْيَوْمَ عِبْرَةٌ لَكُمْ وَ غَداً مُفَارِقُكُمْ إِنْ أَبْقَ فَأَنَا وَلِيُّ دَمِي وَ إِنْ أَفْنَ فَالْفَنَاءُ مِيعَادِي وَ إِنْ أَعْفُ فَالْعَفْوُ لِي قُرْبَةٌ وَ هُوَ لَكُمْ حَسَنَةٌ فَاعْفُوا (أَ لا تُحِبُّونَ أَنْ يَغْفِرَاللَّهُ لَكُمْ) (نامه ۲۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;من ديروز يار و همنشين شما بودم و امروز براى شما درس عبرتم و فردا از بين شما مى&amp;rlm;روم اگر زنده ماندم كه خودم اختيار خونم را دارم و اگر شهيد شدم مرگ وعده&amp;rlm;گاه من است و اگر ببخشم، بخشش برايم وسيله قرب به پروردگار است و براى شما كار پسنديده&amp;rlm;اى است. بنا بر اين ببخشيد (آيا دوست نداريد كه خداوند شما را بيامرزد)&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;IV&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;. &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;عباراتی که &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; استفاده شده &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;مراد از آن شایستگی و سزاواری است&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱) أَمَا وَ الَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ ليَظْهَرَنَّ هَؤُلَاءِ الْقَوْمُ عَلَيْكُمْ لَيْسَ لِأَنَّهُمْ أَوْلَى بِالْحَقِّ مِنْكُمْ وَ لَكِنْ لِإِسْرَاعِهِمْ إِلَى بَاطِلِ صَاحِبِهِمْ (خطبه ۹۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بدانيد به آن خدايى كه جانم در دست اوست، اين مردم (ياران معاويه) بر شما پيروز خواهند شد و اين پيروزى بدان خاطر نيست كه آنها از حق پيروى كردنشان بهتر از شماست، بلكه بدين جهت است كه آنها در پيروى از باطل و دستورهاى فرمانروايشان سرعت مى&amp;rlm;بخشند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲) قَدْ تُكُفِّلَ لَكُمْ بِالرِّزْقِ وَ أُمِرْتُمْ بِالْعَمَلِ فَلَا يَكُونَنَّ الْمَضْمُونُ لَكُمْ طَلَبُهُ أَوْلَى بِكُمْ مِنَ الْمَفْرُوضِ عَلَيْكُمْ عَمَلُهُ (خطبه ۱۱۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;به تحقيق خداوند تبارك و تعالى روزى رساندن به شما را به عهده گرفته و هر انسان از جانب او به عبادت و عمل امر شده است&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt; بنا بر اين به طور قطع و يقين نبايد بدست آوردن چيزى كه خداوند ضامن رساندن آن شده از چيزى كه او انجام آن را واجب كرده در نظرتان بهتر باشد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳) فَإِسْلَامُنَا قَدْ مَا سُمِعَ وَ جَاهِلِيَّتُنَا لَا تُدْفَعُ وَ كِتَابُ اللَّهِ يَجْمَعُ لَنَا مَا شَذَّ عَنَّا وَ هُوَ قَوْلُهُ سُبْحَانَهُ (وَ أُولُوا الْأَرْحامِ بَعْضُهُمْ أَوْلى&amp;rlm; بِبَعْضٍ فِي كِتابِ اللَّهِ)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;وَ قَوْلُهُ تَعَالَى (إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْراهِيمَ لَلَّذِينَ اتَّبَعُوهُ وَ هذَا النَّبِيُّ وَ الَّذِينَ آمَنُوا وَ اللَّهُ وَلِيُّ الْمُؤْمِنِينَ) فَنَحْنُ مَرَّةً أَوْلَى بِالْقَرَابَةِ وَ تَارَةً أَوْلَى بِالطَّاعَةِ (نامه ۲۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بنابراين اسلام ما به گوش همه رسيده و شرف ما در جاهليت جاى انكار ندارد و كتاب خدا براى ما جمع نموده&amp;rlm; آنچه را به ما نرسيده و لذا فرموده خداى سبحان است كه &amp;laquo;در كتاب خدا بعضى از خويشاوندان بر بعضى ديگر اولى و برترند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و نيز فرموده كه &amp;laquo;سزاوارترين مردم به ابراهيم آنانند كه پيرو او شدند و اين پيامبر (صلّى اللَّه عليه و آله) و آنهايى كه ايمان آوردند و خداوند يار مؤمنين و گروندگان است&amp;raquo; پس يك بار به خاطر خويشاوندى با رسول اللَّه (صلّى اللَّه عليه و آله) سزاوارتريم و يك بار هم به خاطر طاعت و بندگى پروردگار&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴) اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْتَعْدِيكَ عَلَى قُرَيْشٍ وَ مَنْ أَعَانَهُمْ فَإِنَّهُمْ قَدْ قَطَعُوا رَحِمِي وَ أَكْفَئُوا إِنَائِي وَ أَجْمَعُوا عَلَى مُنَازَعَتِي حَقّاً كُنْتُ أَوْلَى بِهِ مِنْ غَيْرِي (خطبه ۲۰۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خداوندا از تو جهت انتقام از قريش و آنهايى كه ياريشان كردند، يارى مى&amp;rlm;طلبم چرا كه آنها پيوند خويشاونديم را قطع كردند و كار را بر من واژگون نمودند و در غصب و ضايع كردن حقى كه من از ديگران بدان سزاوارتر بودم با هم متحد شدند&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵) إِذَا بَلَغَ النِّسَاءُ نَصَّ الْحَقَائِقِ فَالْعَصَبَةُ أَوْلَى (غرائب ۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;چون زنان به بلوغ رسيدند خويشاوندان پدرى به آنان اولى&amp;rlm;ترند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶) أَوْلَى النَّاسِ بِالْعَفْوِ أَقْدَرُهُمْ عَلَى الْعُقُوبَةِ (کلمات قصار ۴۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;سزاوارترين مردم براى بخشش افراد خطاكار هستند كه از قدرت بيشترى در كيفر دادن برخوردار هستند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷) فإن كنت بالشورى ملكت أمورهم فكيف بهذا و المشيرون غيب و إن كنت بالقربى حججت خصيمهم فغيرك أولى بالنبي و أقرب (کلمات قصار ۱۸۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;laquo;اگر با شورا كار آنان را به دست گرفتى چه شورايى بود كه رأى دهندگان در آنجا نبودند&amp;raquo;. &amp;laquo;و اگر از راه خويشاوندى بر مدّعيان دليل آوردى، ديگران از تو به پيامبر نزديكتر و سزاوارتر بودند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۸) افْعَلُوا الْخَيْرَ وَ لَا تَحْقِرُوا مِنْهُ شَيْئاً فَإِنَّ صَغِيرَهُ كَبِيرٌ وَ قَلِيلَهُ كَثِيرٌ وَ لَا يَقُولَنَّ أَحَدُكُمْ إِنَّ أَحَداً أَوْلَى بِفِعْلِ الْخَيْرِ مِنِّي فَيَكُونَ وَ اللَّهِ كَذَلِكَ إِنَّ لِلْخَيْرِ وَ الشَّرِّ أَهْلًا فَمَهْمَا تَرَكْتُمُوهُ مِنْهُمَا كَفَاكُمُوهُ أَهْلُهُ (کلمات قصار ۴۱۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;كار خير انجام دهيد و چيزى از آن را كوچك نشماريد كه كوچك آن بزرگ و كم آن فراوان است و نگوييد ديگران از بجا آوردن كار خير از من سزاوارترند كه به خدا قسم چنين خواهد شد. همانا خوبى و بدى را مردمانى هست هرگاه يكى از آن دو را رها كنيد اهلش آن را به جاى شما انجام خواهند داد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۹) أَوْلَى النَّاسِ بِالْكَرَمِ مَنْ عَرَّقَتْ فِيهِ الْكِرَامُ (کلمات قصار ۴۲۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;سزاوارترين مردم به كرم كسى است كه اهل كرم به او شناخته شوند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;V&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; عباراتی که &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; استفاده شده &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;مراد از آن به عهده گرفتن کاری است&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱) وَ إِنْ تَرَكْتُمُونِي فَأَنَا كَأَحَدِكُمْ وَ لَعَلِّي أَسْمَعُكُمْ وَ أَطْوَعُكُمْ لِمَنْ وَلَّيْتُمُوهُ أَمْرَكُمْ وَ أَنَا لَكُمْ وَزِيراً خَيْرٌ لَكُمْ مِنِّي أَمِيراً (خطبه ۹۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و اگر دست از من برداريد من همانند يكى از شما خواهم بود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt; و در ميان كسانى كه ولايت و اداره امور را بدو مى&amp;rlm;سپاريد من شنواتر و فرمانبردارتر مى&amp;rlm;باشم&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt; من اگر وزير شما باشم بهتر است از آنكه امير شما باشم&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲) لما عوتب على تصييره الناس إسوة في العطاء من غير تفضيل أولى السابقات و الشرف&amp;rlm; أَ تَأْمُرُونِّي أَنْ أَطْلُبَ النَّصْرَ بِالْجَوْرِ فِيمَنْ وُلِّيتُ عَلَيْهِ وَ اللَّهِ لَا أَطُورُ بِهِ مَا سَمَرَ سَمِيرٌ وَ مَا أَمَّ نَجْمٌ فِي السَّمَاءِ نَجْماً وَ لَوْ كَانَ الْمَالُ لِي لَسَوَّيْتُ بَيْنَهُمْ فَكَيْفَ وَ إِنَّمَا الْمَالُ مَالُ اللَّهِ (خطبه ۱۲۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آن گاه كه با تندى به آن حضرت گفتند، چرا بيت المال را بر مبنای اولویت در سابقه و شرافت تقسيم نكردى فرمود: آيا به من دستور مى&amp;rlm;دهيد كه با ظلم به آنهايى كه كارهايشان را به عهده گرفته&amp;rlm;ام نصرت و پيروزى را طلب كنم به خدا قسم تا جهان برپاست و تا ستاره&amp;rlm;اى در آسمان در پى ستاره&amp;rlm;اى ديگر است اين كار را نخواهم كرد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt; اگر مال متعلّق به من بود بين مردم به طور مساوى تقسيم مى&amp;rlm;كردم حالا كه مال، مال اللَّه است&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;(&lt;/span&gt; أَمَّا بَعْدُ فَإِنَّ تَضْيِيعَ الْمَرْءِ مَا وُلِّيَ وَ تَكَلُّفَهُ مَا كُفِيَ لَعَجْزٌ حَاضِرٌ وَ رَأْيٌ مُتَبَّرٌ (نامه ۶۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اما بعد از حمد و ثناى الهى و درود بر حضرت محمّد (صلّى اللَّه عليه و آله)، واگذاشتن كارى كه بر عهده انسان گذاشته شده و پرداختن به كارى كه مربوط به ديگران است، ناتوانى آشكار و فكرى غلط و هلاك&amp;rlm;كننده مى&amp;rlm;باشد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;(&lt;/span&gt; وَ وَلِيَهُمْ وَالٍ فَأَقَامَ وَ اسْتَقَامَ حَتَّى ضَرَبَ الدِّينُ بِجِرَانِهِ (کلمات قصار ۴۵۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بر مردم فرمانروايشان فرمان راند، پس دين را به پا داشت و پايدارى كرد تا اين كه دين برقرار گرديد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;اگر به چهار عبارت فوق توجه کنیم در معنی &amp;quot;ولایت&amp;quot; که مراد به عهده گرفتن کاری است، حکومت به مفهوم دینی آن بدست نمی&amp;zwnj;آید و نهایتأ می&amp;zwnj;توان تکلف امور حکومت بدون قید ویژگی خاص الهی را بدست آورد.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;نتیجه اینکه :&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;چنانچه از جملات نهج البلاغه پیداست هیچ تعریفی از نهج البلاغه نمی&amp;zwnj;توان پیدا کرد که مفهوم &amp;quot;ولایت&amp;quot; منطبق با تعریفی باشد که متولیان مذهب تشیع از آن مراد دارند، خصوصأ نمی&amp;zwnj;توان از آن اولی بالتصرف (تسلط بر مال و جان مومنین) را برای ائمه شیعه بدست آورد، بنابراین وقتی نمی&amp;zwnj;توان ادعای تشیع درباره حکومت ائمه شیعه با آن ویژگی خاص را که امثال علامه طباطبائی بدست داده است باور کرد، به طریق اولی نمی&amp;zwnj;توان ارزش خاصی برای حکومت فقیه (ولایت فقیه) قائل شد.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;جائی که عقاب پر بریزد&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;از پشه لاغری چه خیزد&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;تمام هیاهوی باورمندان به &amp;quot;ولایت فقیه&amp;quot; را می&amp;zwnj;توان فقط شیادی در برداشت از باورهای شیعی که خود آن دارای اعوجاج است، تلقی کرد.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;پایان&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;بخش&amp;zwnj;های پیشین:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://radiozamaneh.com/reflections/2012/09/17/19646&quot;&gt;ولایت در قرآن (۱): آیات &amp;quot;ولایت&amp;quot;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://radiozamaneh.com/node/19857&quot;&gt;ولایت در قرآن (۲): نقد برداشت علامه طباطبایی از &amp;quot;ولایت&amp;quot;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
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     <comments>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/10/03/19858#comments</comments>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/reflections">انديشه زمانه</category>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/taxonomy/term/5194">صالح نظری</category>
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 <pubDate>Wed, 03 Oct 2012 08:39:46 +0000</pubDate>
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    <title>نقد برداشت علامه طباطبایی از &quot;ولایت&quot;</title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/09/24/19857</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/09/24/19857&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-sartitr&quot;&gt;
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                    ولایت در قرآن (۲)        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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                    صالح نظری        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
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        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;صالح نظری &amp;minus; در قسمت اول مقاله گفته شد، نظر به اینکه حکومت جمهوری اسلامی مدعی است یک حکومت دینی مبتنی بر ولایت است و این ولایت الله از ناحیه خدا به رسول گرامی انتقال یافته و ولایت رسول اکرم به ائمه شیعه رسیده و در زمان غیبت امام غایب این ولایت به فقیه می&amp;zwnj;رسد ونام آن را ولایت فقیه به نیابت از امام غایب می&amp;zwnj;نامد و بر اساس این نظریه، باورمندان به تشیع را به اطاعت محض از آن ولی فقیه فرا می&amp;zwnj;خواند و منکران این ولایت را منکر ائمه و رسول و در نهایت خدا می&amp;zwnj;داند، لذا لازم است پیشینه این باور را در قرآن کریم جستجو کرده تا صحت مورد ادعا مورد کنکاش قرار گرفته و انطباق یا عدم انطباق این ادعا مورد سنجش قرار گیرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;با بررسی آیات ولایت نتیجه گرفته شد که آیات فوق می&amp;zwnj;خواهد یک رابطه وابستگی حقیقی میان مومنینن با خداوند ایجاد کند که جز به او به کسی تکیه نکنند و از طرف دیگر پیوندی عمیق میان مومنین ایجاد نماید تا در سایه آن هم مومنین در امنیت روانی باشند و هم از امنیت اجتماعی برخوردار باشند، این آیات نمی&amp;zwnj;خواهد هیچ کس بر مومنین تسلط یابد حتی رسول گرامی چه برسد به طاغوت و ستمگر به تعبیر دیگر مراد از آیات ولایت ایجاد پیونداجتماعی میان مومنین است در مقابل هر گونه سلطه نه اینکه بند بندگی را از گروهی به گروه دیگر تبدیل کند و این است راز رسالت انبیا.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و در ادامه آیاتی از قرآن کریم که مورد سوء استفاده متولیان دین و خصوصأ طراحان تئوری &amp;quot;ولایت فقیه&amp;quot; از بعض آیات ولایت می&amp;zwnj;شود، آورده شده و مورد نقادی قرار می&amp;zwnj;گیرد، تا نشان داده شود این متولیان دین چگونه می&amp;zwnj;خواهد یوغ بندگی را که نبی گرامی از گرده مردم باز نمودند حالا بنام دین بر گرده مومنین نهند و بر اسب مراد خویش سوار شوند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آیه اول و دوم:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;إِنَّماوَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَ رَسُولُهُ وَ الَّذينَ آمَنُوا الَّذينَ يُقيمُونَ الصَّلاةَ وَ يُؤْتُونَ الزَّكاةَ وَ هُمْ راكِعُونَ (مائده ۵۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;جز اين نيست كه ولىّ شما خداست و رسول او و مؤمنانى كه نماز مى&amp;rlm;خوانند و انفاق مى&amp;rlm;كنند و ایشان در ركوعند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;وَ مَن يَتَوَلَّ اللَّهَ وَ رَسُولَهُ وَ الَّذينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغالِبُونَ (مائده ۵۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و هر كه خدا و پيامبر او و مؤمنان را ولىّ خود گزيند، بداند كه پيروزمندان گروه خداوندند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;معنای لغوی &amp;quot;ولایت&amp;quot;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;راغب در كتاب &amp;quot;مفردات&amp;quot; گفته است:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;ولاء&amp;quot; (به صداى بالاى واو) و همچنين&amp;quot; توالى&amp;quot; به اين معنا است كه حاصل شود دو چيز يا بيشتر، از يك جنس و بدون اينكه چيزى از غير آن جنس حايل شود. اين معناى لغوى ولاء و توالى است، و گاهى اين لفظ به طور استعاره و مجاز در قربى استعمال مى&amp;rlm;شود كه آن قرب از جهات زير حاصل مى&amp;rlm;گردد:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱- قربى كه از جهت مكان حاصل ميشود و گفته ميشود:&amp;quot; جلست مما يليه- نشستيم نزديكش&amp;quot;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲- قرب از جهت نسبت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳- قرب از جهت دوستى و گفته مى&amp;rlm;شود:&amp;quot; ولى فلان- دوست فلانى&amp;quot;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴- قرب حاصل از نصرت و گفته مى&amp;rlm;شود:&amp;quot; ولى فلانا- يارى كرد فلان را&amp;quot;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵- از جهت اعتقاد. گفته مى&amp;rlm;شود:&amp;quot; فلان ولى فلان- هم عقيده و هم سوگند اوست&amp;quot;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و در معناى نصرت بطور حقيقت اطلاق مى&amp;rlm;شود و همچنين در معناى مباشرت در كار و اختيار دارى در آن، و گفته مى&amp;rlm;شود:&amp;quot; فلان ولى لامر كذا- فلانى اختيار دار فلان كار است&amp;quot; و بعضى از اهل لغت گفته&amp;rlm;اند: ولايت (به صداى پائين واو) و ولايت (به صداى بالاى آن) به يك معنا است، مانند دلالت و دلالت كه هر دو به يك معنا است، و حقيقت ولايت عبارتست از بعهده گرفتن كار، و منصوب شدن بر آن و&amp;quot; ولى&amp;quot; و&amp;quot; مولى&amp;quot; هر دو استعمال مى&amp;rlm;شوند در اين معنا، البته هم در معناى اسم فاعل آن، يعنى موالى (به كسر لام) و هم در معناى اسم مفعول آن يعنى موالى (به فتح لام) و به مؤمن گفته مى&amp;rlm;شود ولى اللَّه و ليكن ديده نشده كه بگويند مؤمن مولاى خداست، ليكن هم گفته مى&amp;rlm;شود&amp;quot; اللَّه ولى المؤمنين&amp;quot; و هم&amp;quot; اللَّه مولا المؤمنين&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و نيز راغب مى&amp;rlm;گويد: اگر عرب گفت:&amp;quot; ولى&amp;quot; اگر ديدى كه خود بخود و بدون لفظ&amp;quot; عن&amp;quot; متعدى شد، بدانكه اقتضاى معناى ولايت را دارد و مقتضى است كه آن معنا در نزديك&amp;rlm;ترين مواضعش حاصل شود، مثلا اگر ديديد كسى گفت:&amp;quot; وليت سمعى كذا&amp;quot; يا گفت&amp;quot; وليت عينى كذا&amp;quot; يا گفت&amp;quot; وليت وجهى كذا&amp;quot; بدانكه مراد اينست كه گوش خود يا چشم خود يا روى خود را نزديك فلانى بردم، كما اينكه در قرآن هم بدون لفظ&amp;quot; عن&amp;quot; استعمال شده، مى&amp;rlm;فرمايد:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot; فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضاها&amp;quot; &amp;laquo; پس بزودى تو را بسوى قبله&amp;rlm;اى كه خوش آيندت باشد بر خواهيم گرداند.&amp;raquo; و نيز مى&amp;rlm;فرمايد:&amp;quot; فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرامِ وَ حَيْثُ ما كُنْتُمْ فَوَلُّوا وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُ&amp;quot; &amp;laquo;پس بگردان روى خود را بسوى بخشى از مسجد الحرام، و هر جا كه بوديد بايد روى خود به! جانب آن بگردانيد &amp;raquo; و اگر ديدى كه با&amp;quot; عن&amp;quot; چه در ظاهر و چه در تقدير متعدى شدبدانكه اقتضاى معناى اعراض و ترك نزديكى را دارد. &amp;laquo;مفردات راغب ص ۵۳۴- ۵۳۳.&amp;raquo;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بنابراین ولایت نزدیکی دو فرد است از جهتی (مکانی، نسبی، دوستی، یاری و یا عقیده) و نیز بعضی اهل لغت گفته&amp;zwnj;اند ولايت عبارت است از به عهده گرفتن كار، و منصوب شدن بر آن.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;شأن نزول آیه &amp;laquo;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; إِنَّما وَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَ رَسُولُهُ وَ الَّذينَ آمَنُوا الَّذينَ يُقيمُونَ الصَّلاةَ وَ يُؤْتُونَ الزَّكاةَ وَ هُمْ راكِعُونَ&amp;raquo;&lt;/strong&gt; (مائده ۵۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; در &amp;quot;اسباب النزول&amp;quot;واحدی نیشابوری ذیل آیه آمده است:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;جابر بن عبد اللّه گويد: عبد اللّه بن سلام (يهودى مسلمان شده) نزد پيغمبر (ص) آمد و گفت: يا رسول اللّه (ص) جمعى از بنى قريظه و بنى نضير از ما جدا شده و از نزد ما رفته&amp;rlm;اند و سوگند خورده&amp;rlm;اند كه با ما ننشينند، و مارا به سبب دورى راه، معاشرت اصحاب تو ممكن نيست. آيه بالا در پاسخ نازل شد و پيغمبر (ص) برايشان قرائت فرمود. خشنود شدند و گفتند ما را دوستى خدا و رسولش و مؤمنين بس است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;كلبى نظير اين روايت را مى&amp;rlm;آورد و مى&amp;rlm;افزايد: آيه درباره على (ع) نازل گرديده كه در حال ركوع نماز انگشتريش را به سائل بخشيد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;ابو بكر تميمى با اسناد از ابن عباس روايت مى&amp;rlm;كند كه عبد اللّه بن سلام با ياران مسلمان شده&amp;rlm;اش نزد پيغمبر (ص) آمده گفتند يا رسول اللّه (ص) راه ما دور است و مجلس و سخنگويى نداريم، و قوم ما، ما را به سبب مسلمان شدن از خود رانده و قسم خورده&amp;rlm;اند كه با ما ننشينند و سخن نگويند و از ما زن نگيرند و ندهند و اين بر ما سخت است&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;پيغمبر (ص) فرمود: &amp;laquo;إِنَّما وَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَ رَسُولُهُ وَ الَّذِينَ آمَنُوا&amp;raquo;، سپس پيغمبر (ص) به سوى مسجد رفت و مردم در حال نماز بودند، برخى در قيام و برخى در ركوع. حضرت سائلى را ديد از وى پرسيد آيا كسى به تو چيزى داد؟ گفت: بلى اين انگشترى طلا را به من دادند. سؤال فرمود: چه كسى داد؟ سائل گفت: آن كه ايستاده است و با دست به على بن ابى طالب (ع) اشاره كرد. پيغمبر (ص) پرسيد در چه حالتى بود؟ سائل گفت: در حال ركوع. پيغمبر (ص) تكبير بر كشيد و آيه بعد را هم قرائت فرمود: وَ مَنْ يَتَوَلَّ اللَّهَ وَ رَسُولَهُ وَ الَّذِينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغالِبُونَ&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بنا براین نزول آیه درباره رفتار پسندیده امام علی نازل شده است و او را دوست و یاور مومنین قلمداد کرده است، اما از این نکته نباید غافل شد که اگر آیه&amp;zwnj;ای درباره رفتار فردی نازل شده باشد اختصاص به او ندارد و آن فرد فقط یکی از مصادیق آیه می&amp;zwnj;باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;● نظر علامه طباطبائی در تفسیر المیزان:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;علامه ظاهرأ نظر راغب را نمی&amp;zwnj;پذیرد و علاقه مند است از لغت &amp;quot;ولایت&amp;quot; تصرف &amp;quot;ولی&amp;quot; به &amp;quot;مولی علیه&amp;quot; را نتیجه بگیرد:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;گفتار راغب در كتاب مفردات عكس حقيقت و غير صحيح بنظر مى&amp;rlm;رسد، زيرا بحث در احوالات انسانهاى اولى اين را بدست مى&amp;rlm;دهد كه نظر بشر نخست به منظور محسوسات بوده و اشتغال به امر محسوسات در زندگى بشر مقدم بر تفكر در متصورات و معانى و انحاى اعتبارات و تصرف در آنها بوده است، بنا بر اين اگر ولايت را كه قرب مخصوصى است در امور معنوى فرض كنيم لازمه&amp;rlm;اش اينست كه براى ولى قربى باشد كه براى غير او نيست مگر بواسطه او، پس هر چه از شؤون زندگى مولى عليه كه قابل اين هست كه بديگرى واگذار شود تنها ولى مى&amp;rlm;تواند آن را عهده&amp;rlm;دار شده و جاى او را بگيرد. مانند ولى ميت كه او نيز همين طور است، يعنى همانطورى كه ميت قبل از مرگش مى&amp;rlm;توانست به ملاك مالكيت انواع تصرفات را در اموال خود بكند ولى او در حال مرگ او مى&amp;rlm;تواند به ملاك وراثت آن تصرفات را بكند، و همچنين ولى صغير با ولايتى كه دارد مى&amp;rlm;تواند در شؤون مالى صغير اعمال تدبير بكند و همچنين ولى نصرت كه مى&amp;rlm;تواند در امور منصور از جهت تقويتش در دفاع تصرف كند و همچنين خداى تعالى كه ولى بندگانش است و امور دنيا و آخرت آنها را تدبير مى&amp;rlm;نمايد، و در اين كار جز او كسى ولايت ندارد، تنها اوست ولى مؤمنين در تدبير امر دينشان به اينكه وسائل هدايتشان را فراهم آورد و داعيان دينى بسوى آنان بفرستد و توفيق و يارى خود را شامل حالشان بكند، و پيغمبران هم ولى مؤمنينند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;مثلا رسول اللَّه (ص) ولى مؤمنين است، چون داراى منصبى است از طرف پروردگار، و آن اينست كه در بين مؤمنين حكومت و له و عليه آنها قضاوت مى&amp;rlm;نمايد، و همچنين است حكامى كه آن جناب و يا جانشين او براى شهرها معلوم مى&amp;rlm;كنند زيرا آنها نيز داراى اين ولايت هستند كه در بين مردم تا حدود اختياراتشان حكومت كنند، و خواننده خود قياس كند بر آنچه گفته شد موارد ديگر ولايت را، يعنى ولاى عتق و جوار و حلف و طلاق وپسر عم و محبت و ولايت عهدى و همچنين بقيه معانى آن را، و اما ولايتى كه در آيه:&amp;quot; يُوَلُّونَ الْأَدْبارَ&amp;quot; است به معناى پشت كردن يعنى بجاى اينكه روى خود جانب دشمن كنند و سنگر و جبهه جنگ را اداره و تدبير نمايند، پشت خود بدان كرده پا به فرار مى&amp;rlm;گذارند و همچنين است&amp;quot; توليتم&amp;quot; يعنى اعراض كرديد و خود را به جهتى كه مخالف جهت آنست قرار داديد يا روى خود را جهت مخالف آن برگردانيديد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;پس آنچه از معانى ولايت در موارد استعمالش به دست مى&amp;rlm;آيد اينست كه ولايت عبارتست از يك نحوه قربى كه باعث و مجوز نوع خاصى از تصرف و مالكيت تدبير مى&amp;rlm;شود، و آيه شريفه مورد بحث، سياقى دارد كه از آن استفاده مى&amp;rlm;شود ولايت نسبت به خدا و رسول و مؤمنين به يك معنا است، چه به يك نسبت ولايت را به همه نسبت داده است و مؤيد اين مطلب اين جمله از آيه بعدى است:&amp;quot; فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغالِبُونَ&amp;quot; براى اينكه اين جمله دلالت و يا دست كم اشعار دارد بر اينكه مؤمنين و رسول خدا (ص) از جهت اينكه در تحت ولايت خدايند، حزب خدايند و چون چنين است پس سنخ ولايت هر دو يكى و از سنخ ولايت خود پروردگار است و خداوند متعال براى خود دو سنخ ولايت نشان داده، يكى ولايت تكوينى كه آيات راجع به آن را ذيلا درج مى&amp;rlm;كنيم. دوم ولايت تشريعى كه به آيات آن نيز اشاره مى&amp;rlm;نماييم، آن گاه در آيات ديگرى اين ولايت تشريعى را به رسول خود استناد مى&amp;rlm;دهد و در آيه مورد بحث همان را براى امير المؤمنين (ع) ثابت مى&amp;rlm;كند.&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ برداشت علامه طباطبایی به دلایل ذیل نادرست است:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱&amp;minus; &amp;nbsp;نظر او بر خلاف نظر اهل لغت است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&amp;minus; ولایت ولی میت بر اموال او و یا ولایت بر صغیر و دیوانه امری بدیهی بر تصرف اموال آنان است زیرا آنان قادر به تصرف مال خود نیستند، اما در مورد انسان&amp;zwnj;های زنده و بالغ وعاقل، نسبت دادن ولایت به مفهوم تصرف در اموالشان غیر عقلانی است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&amp;minus; آیات بیشماری که مومنین را ولی هم می&amp;zwnj;داند، چه ارتباطی به تصرف آنان بر اموال هم دارد و یا در دسته دیگری از آیات که از ولایت شیطان و کافر و... منع می&amp;zwnj;کند چه ارتباطی به تصرف بر اموال آنان دارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴&amp;minus; در تمامی آیات ولایت سیاق کلی مبنی بر دوستی و یاری خداوند بر مومنین و دوستی و یاری میان مومنین و و نفی دوستی و یاری غیر مومنین است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵&amp;minus; اینکه خداوند مالک الملک است و همه چیز از اوست و ضمنآ دوست مومنین نیز هست، چه دلیل دارد که پیامبر نیز که دوست مومنین است مالک الملک مومنین نیز باشد مگر خدا و پیامبر هم سنخ هستند که تمام خصوصیات خدا در او هم باشد&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶&amp;minus; خداوند هم خالق است هم حاکم است و نیز &amp;quot;ولی&amp;quot; مومنین است و حق تصرف خدا بر جان و مال مومنین نه به جهت &amp;quot;ولایت&amp;quot; اوست بلکه به جهت خالق بودن و حاکم بودن اوست اما پیامبر نه خالق است نه حاکم اما &amp;quot;ولی&amp;quot; مومنین است و همچنین است &amp;quot;ولایت&amp;quot; مومنین بر هم، و این نیست مگر اینکه &amp;quot;ولایت&amp;quot; به همان مفهوم دوستی باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷&amp;minus; اینکه گروه خدا (پیروان خدا) پیروزند، چه مویدی بر نظریه تصرف علامه دارد؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۸&amp;minus; چون اساس استدلال علامه که &amp;quot;ولایت&amp;quot; را به &amp;quot;اولی به التصرف&amp;quot; (حق تصرف داشتن) تفسیر می&amp;zwnj;نماید نتایج کاملأ متفاوتی (۱۸۰درجه ای) از واقعیت آیات به دست می&amp;zwnj;دهد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۹&amp;minus; جالب است که علامه این حق تصرف را برای همه مومنین قائل نیست و بعد از نبی اکرم، آن انحصارأ درباره امام علی و به تبع آن یازده امام شیعه می&amp;zwnj;داند و اینهمه آیات را که &amp;quot;ولایت&amp;quot; مومنان بر هم را ذکر می&amp;zwnj;کند به همان دوستی ختم می&amp;zwnj;کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۰&amp;minus; اینکه شان نزول این آیه رفتار امام علی بوده دلیل انحصار نیست مثلأ شان نزول آیه حرمت خمر رفتار فرد یا افراد معینی از مومنین بوده است، آیا می&amp;zwnj;توان گفت خماری برای آنان حرام است و برای بقیه بلامانع است؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;● علامه ابتدا نظر مفسرین اهل سنت را نقل و باور آنان را رد می&amp;zwnj;کند:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;تفسير المنار ج ۶ ص ۴۴۱- ۴۴۲ و تفسير فخر رازى ج ۱۲ ص ۲۵&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اوليا و ياوران شما يهود و نصارا و منافقين نيستند، بلكه اوليا و ياوران شما خدا و رسول اويند و آن مؤمنين كه نماز بپا مى&amp;rlm;دارند و زكات مى&amp;rlm;دهند و در همه اين احوال خاضعند، يا آنهايى كه زكات مى&amp;rlm;دهند در حالى كه خود فقير و تنگدستند&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;تفسير فخر رازى ج ۱۲ ص ۳۱- ۲۵&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اول- ولايت در آيات مورد بحث و قبل و بعدش ظهور در معناى نصرت دارد و اين روايات از نظر مخالفتش با اين ظهور مخدوش است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;دوم- اينكه لازمه اين روايات كه مى&amp;rlm;گويند ولايت به معناى تصرف است، اينست كه آيه با اينكه دارد:&amp;quot; الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلاةَ- آنان كه نماز را به پاى مى&amp;rlm;دارند&amp;quot; مع ذلك بگوييم آيه در شان على است و بس و حال آنكه آن جناب يك نفر است و به يك نفر گفته نمى&amp;rlm;شود:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آنان كه.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;سوم- اينكه لازمه اين روايات اينست كه مقصود از زكاتى كه در آيه است صدقه باشد و حال آنكه ديده نشده صدقه را زكات گفته باشند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;مفسرين نامبرده بعد از اين سه اشكال گفته&amp;rlm;اند پس متعين اينست كه بگوييم اين دو آيه مربوط به شخص معينى نيستند بلكه عام و شامل همه مؤمنين و كانه در اين مقامند كه نكته&amp;rlm;اى نظير قصر قلب يا قصر افراد افاده كنند چه منافقين بسيار علاقمند به ولايت كفار و دوستى با آنان بودند و به همه مسلمين اصرار داشتند كه آنان را دوست بدارند. خداى تعالى مؤمنين را از دوستى با كفار نهى نمود، و فرمود: اولياى شما كفار و منافقين نيستند، بلكه خدا و رسول و مؤمنين حقيقى&amp;rlm;اند. باقى مى&amp;rlm;ماند جمله حاليه&amp;quot; وَ هُمْ راكِعُونَ&amp;quot;، راجع به آنهم مى&amp;rlm;توانيم بگوييم مراد از ركوع در خصوص اين آيه به معناى مجازى آن يعنى خضوع و فقر و افتاده حالى است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;۱. &lt;/strong&gt;فساد ادعايشان بر اينكه ولايت به معناى نصرت است همانا استدلال خود آنان است به وحدت سياق و به اينكه همه اين آيات كه يكى پس از ديگرى قرار گرفته&amp;rlm;اند در مقام بيان اين جهتند كه چه كسانى را بايد يارى كرد و چه كسانى را نبايد، زيرا درست است كه اين سوره در اواخر عمر رسول خدا (ص) در حجة الوداع نازل شده و ليكن نه تمامى آن، بلكه بطور مسلم پاره&amp;rlm;اى از آيات آن به شهادت مضامين آنها، و رواياتى كه در شان نزولشان وارد شده است قبل از حجة الوداع نازل شده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. تفاوت آيات قبل و بعد اين آيه است از جهت مضمون، زيرا در آيه&amp;quot; يا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَ النَّصارى&amp;rlm; أَوْلِياءَ بَعْضُهُمْ أَوْلِياءُ بَعْضٍ...&amp;quot; &amp;laquo;۱&amp;raquo; تنها مؤمنين را از ولايت كفار نهى مى&amp;rlm;كند و منافقين را كه در دل كافرند به اين رذيله كه در كمك كفار و جانبدارى آنان سبقت مى&amp;rlm;جويند سرزنش مى&amp;rlm;نمايد، بدون اينكه كلام مرتبط الخطاب به كفار شود و روى سخن متوجه كفار گردد، بخلاف آيات بعد كه پس از نهى مسلمين از ولايت كفار دستور مى&amp;rlm;دهد كه رسول خدا (ص) مطلب را به گوش كفار برساند و اعمال زشت آنان را كه همان سخريه و استهزاست، و معايب درونيشان را كه همان نفاق است گوشزد شان سازد، پس آيات قبل، غرضى را بيان مى&amp;rlm;كنند و آيات بعد، غرض ديگرى را ايفا مى&amp;rlm;نمايند با اين حال چگونه بين اين دو دسته آيات وحدت سياق هست؟!.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. كلمه ولايت در اين آيات نمى&amp;rlm;شود به معناى نصرت باشد. زيرا با سياق آنها و خصوصياتى كه در آن آيات است مخصوصا جمله&amp;quot; بَعْضُهُمْ أَوْلِياءُ بَعْضٍ- آنها خود اولياى يكديگرند&amp;quot; و جمله&amp;quot; وَ مَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ- و هر كه از شما ولايت آنها را داشته باشد از آنها خواهد بود&amp;quot; سازگار و مناسب نيست، چون كه ولايت به معناى نصرت عقد و قراردادى بوده كه بين دو قبيله با شرايط خاصى منعقد مى&amp;rlm;شده، و اين عقد باعث نمى&amp;rlm;شده كه اين دو قبيله يكى شوند، و از عادات و رسوم و عقايد مخصوص به خود چشم بپوشند و تابع ديگرى گردند، و حال آنكه در اين آيه ولايت، امرى است كه عقد آن باعث پيوستن يكى به ديگرى است، چون مى&amp;rlm;فرمايد: و هر كه از شما ولايت آنان را دارا باشد از ايشان خواهد بود، و نيز اگر ولايت در اينجا به معناى نصرت بود معنا نداشت علت نهى از نصرت كفار را چنين معنا كند كه چون قوم فلانى (كفار) يار و مددكار يكديگرند، بخلاف اينكه اگر ولايت به معناى محبت باشد كه در آن صورت اين تعليل بسيار بجا و موجه خواهد بود، زيرا مودت مربوط به جان و دل آدمى است و باعث امتزاج و اختلاط روحى بين دو طايفه مى&amp;rlm;شود&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد نظر علامه طباطبایی&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱&amp;minus; در بسیاری از آیات دوستی و نصرت به عنوان کلمات مترادف ذکر شده و به صورت طبیعی دوستان یاوران هم نیز می&amp;zwnj;باشند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&amp;minus; ولو کل سوره مائده در یک زمان نازل نشده اما می&amp;zwnj;توان گفت که در مطالب هم مضمون احتمالأ در یک زمان نازل شده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&amp;minus; مخاطب آیات مربوط به یهود و نصاری که اگر تمسخر دین شما را می&amp;zwnj;کنند به دوستی نگیرید مومنین هستند نه اهل کتاب، در حالیکه علامه برای اثبات اینکه این آیات از نظر مضمون با آیات دیگر فرق دارد مخاطبش را اهل کتاب معرفی می&amp;zwnj;کند و این خلاف متن آیه می&amp;zwnj;باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴&amp;minus; نصرت به مفهوم یاری کردن است، خواه این یاری میان دو نفر از هم باشد و یا یاری میان دو قبیله از هم و اصولأ مقدمه یاری کردن دوست بودن است و یاری کردن ضرورتأ تابع کردن یکی بر دیگری نیست و بدیهی افراد هم فکر و هم کیش همدیگر را در مقابل غیر هم فکر و هم کیش شان یاری می&amp;zwnj;نمایند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵&amp;minus; باید گفت، بار کردن تصرف بر مال و جان بر کلمه &amp;quot;ولی&amp;quot; بر مبنای مقاصد دیگر صورت می&amp;zwnj;گیرد که ما را از حقیقت آیات دور می&amp;zwnj;سازد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;● علامه طباطبائی با پیش فرض تصرف ولی ولایت رسول را این گونه توجیه می&amp;zwnj;کند:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;دو سنخ ولايت براى خداى متعال هست يكى ولايت تكوينى و يكى تشريعى و به عبارت ديگر يكى ولايت حقيقى و يكى ولايت اعتبارى.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;يعنى آياتى كه ولايت تشريعى را كه در آيات قبل براى خداوند ثابت مى&amp;rlm;كرد در آنها همان را براى رسول خدا ثابت مى&amp;rlm;كند و قيام به تشريع و دعوت به دين و تربيت امت و حكومت بين آنان و قضاوت در آنان را از شؤون و مناصب رسالت وى مى&amp;rlm;داند. بارى جامع و فشرده اين آيات اينست كه رسول خدا (ص) نيز داراى چنين ولايتى هست كه امت را بسوى خداى تعالى سوق دهد و در بين آنها حكومت و فصل خصومت كند و در تمامى شؤون آنها دخالت نمايد و همين طور كه بر مردم اطاعت&amp;rlm;خداى تعالى واجب كرده است اطاعت او نيز بدون قيد و شرط واجب است. پس برگشت ولايت آن حضرت بسوى ولايت تشريعى خداوند عالم است، به اين معنا كه چون اطاعت خداوند در امور تشريعى واجب است و اطاعت رسول خدا (ص) هم اطاعت خداست پس رسول خدا مقدم و پيشواى آنان و در نتيجه ولايت او هم همان ولايت خداوند خواهد بود. كما اينكه بعضى از آيات گذشته مانند آيه&amp;quot; أَطِيعُوا اللَّهَ وَ أَطِيعُوا الرَّسُولَ&amp;quot; و آيه&amp;quot; وَ ما كانَ لِمُؤْمِنٍ وَ لا مُؤْمِنَةٍ إِذا قَضَى اللَّهُ وَ رَسُولُهُ...&amp;quot; و آياتى ديگر به اين معنا تصريح مى&amp;rlm;كردند.&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد نظر علامه طباطبایی&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱&amp;minus; اینکه خداوند جهان را آفریده و به هر شکلی بخواهد حق تصرف در آن را دارد اصطلاحأ &amp;quot;تکوین&amp;quot; نا میده می&amp;zwnj;شود و قوانینی که خداوند به پیامبرش از طریق وحی بیان می&amp;zwnj;کند &amp;quot;تشریع&amp;quot; گفته می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&amp;minus; قدرت تکوینی خداوند از آیه &amp;quot;اذا اراد شیئ ان یقول له کن فیکون &amp;quot; &amp;quot; وقتی به چیزی اراده کند همینکه گوید باش پس می&amp;zwnj;باشد&amp;quot; گرفته شده است و به تعبیری &amp;quot;اراده تکوینی&amp;quot; خداوند گفته شده است یعنی آفرینش هر چیزی به صرف اراده خداوند صورت می&amp;zwnj;گیرد و تبدیل &amp;quot;اراده تکوینی&amp;quot; به &amp;quot;ولایت تکوینی&amp;quot; به جهت سوء استفاده بکار رفته است و اینکه خداوند در مقام تشریع (قانونگذاری&amp;minus; برای انسان صاحب اختیار دارای چنین حقی است حق تشریع الهی نامیده می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&amp;minus; پیامبر نیز از جانب خود قوانینی را به مومنین بیان می&amp;zwnj;کند و این حق تشریع پیامبر نامیده می&amp;zwnj;شود و این بخش از قوانین به عنوان سنت نبی در میان مومنین شناخته شده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴&amp;minus; چسباندن &amp;quot;ولایت&amp;quot; به تکوین (آفرینش&amp;minus; و تشریع (قانونگذاری&amp;minus; از جانب علامه، برای این صورت گرفته که کلمه ولایت از حالت دوستی و محبت و یاری به تصرف تعبیر شود و کاتالیزور آن را آیات اطاعت (اطاعت از خدا و رسول&amp;minus; قرار داده است تا با ترکیب حق تشریع نبی و اطاعت از نبی، &amp;quot;ولایت&amp;quot; (به معنی حق تصرف&amp;minus; دلخواه خود را نتیجه بگیرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵&amp;minus; اصولأ تشکیل حکومت جزء وظایف انبیاء نیست، وظیفه آنها ابلاغ است (و ما الرسول الا البلاغ&amp;minus; که نیاز به تصرف داشته باشد. (در این ززمینه به کتاب تشیع و حکومت مراجعه نمائید&amp;minus;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶&amp;minus; قرآن به صراحت می&amp;zwnj;فرماید &amp;quot;انما انت مذکر لست علیهم بمصیطر&amp;quot; &amp;quot;تو تذکر دهنده&amp;zwnj;ای و بر آنان سیطره نداری , حال چگونه می&amp;zwnj;توان باور کرد که خداوند پیامبر را حق تصزف بز جان و مالشان قرار دهد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;● علامه طباطبایی در ادامه می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;آياتى كه همين ولايتى را كه براى رسول خدا ثابت مى&amp;rlm;نمود براى امير المؤمنين، على بن ابى طالب (ع) ثابت مى&amp;rlm;كند و آنان آيات يكى همين آيه مورد بحث ما است كه بعد از اثبات ولايت تشريع براى خدا و رسول با واو عاطفه عنوان&amp;quot; الذين آمنوا&amp;quot; را كه جز بر امير المؤمنين منطبق نيست به آن دو عطف نموده و به يك سياق اين سخن ولايت را كه گفتيم در هر سه مورد ولايت واحده&amp;rlm;اى است براى پروردگار متعال، البته بطور اصالت و براى رسول خدا و امير المؤمنين (ع) بطور تبعيت و به اذن خدا ثابت مى&amp;rlm;كند.&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد نظر علامه طباطبایی&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷&amp;minus; ولایت در تشریع مانند ولایت در تکوین غلط است، نه در تکوین ولایت است و نه در تشریع، ولایت مطابق نظر لغویون به معنای دوستی، محبت، یاری و همفکری است و تکوین به معنای آفرینش جهان و تشریع به معنای قانونگذاری است و جمع آنها یعنی ولایت تکوینی (دوستی آفرینش جهان&amp;minus; و نیز ولایت تشریعی (دوستی قانونگذاری&amp;minus; عبارت غلطی است، البته خدا آفریننده جهان است به جهت خالق و قادر بودن و دوست مخلوقات مومن خود می&amp;zwnj;باشد و همچنین است رسول او که حق قانونگذاری دارد ونیز دوست مومنین است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۸&amp;minus; درست است که آیه در شان امام علی نازل شده ولی اختصاص به او ندارد او مانند مومنین مشمول آیه هست و البته این افتخاری بزای اوست که آیه&amp;zwnj;ای در بیان رفتار انسانی او نازل شده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۹&amp;minus; آیات بسیاری به خاطر افراد مختلف نازل شده و بزای آنها افتخاری است که نصیبشان شده است اما هیچگاه اختصاص به آنان ندارد به طوری که دیگران از آن فضیلت محروم باشند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۰&amp;minus; بله هر سه مورد ولایت خدا و رسول و مومنین ولایت واحدی است اما به معنای محبت و دوستی و نه به معنای داشتن حق تصرف در مال و جان مردم مومن.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۱&amp;minus; این سوال باید از علامه پرسیده شود ولایتی که شما تعریف می&amp;zwnj;کند وباید در همه جا به همین معنا بکار رود، درباره ولایت مومنین بر هم نیز صادق است یا نه، اگر مومنین بر هم ولایت دارند که دارند و ولایت به معنی داشتن حق تصرف در مال و جان مومنین است، چگونه مومنین، حق تصرف بر جان ومال هم داشته باشند؟ اصولأ چنین چیزی ممکن است؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۲&amp;minus; اگر به فرض محال این حق درباره امام علی صادق باشد، شما بر اساس کدام آیه آن را تعمیم به همه امامان شیعه می&amp;zwnj;دهید؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;● علامه در ادامه می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;وَ مَنْ يَتَوَلَّ اللَّهَ وَ رَسُولَهُ وَ الَّذِينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغالِبُونَ&amp;quot; تولى به معناى گرفتن ولى است و&amp;quot; الَّذِينَ آمَنُوا&amp;quot; افاده عهد مى&amp;rlm;كند و در آن اشاره است به مؤمنين معهود، يعنى همان مؤمنين كه در&amp;quot; إِنَّما وَلِيُّكُمُ&amp;quot; ذكر شد و جمله&amp;quot; فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغالِبُونَ&amp;quot; در جاى جزاى شرط قرار گرفته و ليكن در حقيقت جزا، نيست و جزا در تقدير است و اين جمله از باب بكار بردن كبراى قياس در جاى نتيجه در اينجا ذكر شده است تا علت حكم را برساند، و تقدير آيه چنين بوده:&amp;quot; و من يتول فهو الغالب لانه من حزب اللَّه و حزب اللَّه هم الغالبون- هر كه خدا و رسول را ولى خود بگيرد غالب و پيروز است چون كه از حزب خداست و حزب خداوند هميشه غالب است&amp;quot;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و اين سنخ تعبير كنايه از اين است كه اينها حزب خدايند، و بنا بر آنچه راغب گفته حزب به معنى جماعتى است كه در آن يك نحوه تشكيل و فشردگى باشد.&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد نظر علامه طباطبایی&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;۱&lt;/strong&gt;&amp;minus; اگر مراد آیه قبل ولایت انحصاری امام علی بوده است چرا این انحصار در اینجا ذکر نشده و همه مومنین را در درون خود جای داده است؟ و می&amp;zwnj;فرماید &amp;quot;و هر كه خدا و پيامبر او و مؤمنان را ولىّ خود گزيند، بداند كه پيروزمندان گروه خداوندند&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&amp;minus; بنابراین هیچ انحصاری نیست و معنای &amp;quot;ولی&amp;quot; هم همان دوستی و محبت و همفکری و یاری کردن است و این معنا کاملأ با آیه سازگار است و معنای آیه می&amp;zwnj;شود &amp;quot;هر که خدا و رسول و مومنین را دوست و همفکر و یاور خود برگزیند بداند كه پيروزمندان گروه خداوندند&amp;quot;. اما بر اساس تفسیر علامه معنای آیه می&amp;zwnj;شود &amp;quot;هر که خدا و رسول و مومنین را بر خود حق تصرف در مال و جانش دهد، بداند كه پيروزمندان گروه خداوندند&amp;quot;. انصافأ کدام معنای آیه می&amp;zwnj;تواند مورد پذیرش انسانهای اندیشمند قرار گیرد؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;آیه سوم&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;النَّبِيُّ أَوْلى&amp;rlm; بِالْمُؤْمِنينَ مِنْ أَنْفُسِهِمْ وَ أَزْواجُهُ أُمَّهاتُهُمْ وَ أُولُوا الْأَرْحامِ بَعْضُهُمْ أَوْلى&amp;rlm; بِبَعْضٍ في&amp;rlm; كِتابِ اللَّهِ مِنَ الْمُؤْمِنينَ وَ الْمُهاجِرينَ إِلاَّ أَنْ تَفْعَلُوا إِلى&amp;rlm; أَوْلِيائِكُمْ مَعْرُوفاً كانَ ذلِكَ فِي الْكِتابِ مَسْطُوراً (احزاب۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;پيامبر به مؤمنان از خودشان سزاتر است و زنانش مادران مؤمنان هستند و در كتاب خدا خويشاوندان نسبى از مؤمنان و مهاجران به يكديگر سزاوارترند، مگر آنكه بخواهيد به يكى از دوستان خود نيكى كنيد. و اين حكم در كتاب خدا مكتوب است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;شان نزول آیه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در تفسير مجمع البيان آمده است:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;پيامبر اكرم صلى اللَّه عليه و آله ميان مسلمانان (انصار و مهاجرين) عقد اخوّت برقرار كرده بود، به گونه&amp;rlm;اى كه مثل برادر حقيقى از يكديگر ارث مى&amp;rlm;بردند، زيرا مهاجران در آغاز، از وطن و اموال و بستگان خود دور شده بودند و عقد اخوّت، اين موارد را جبران مى&amp;rlm;كرد تا آنكه آيه نازل شد و چنين ارثى را لغو كرد و فرمود: ملاك ارث بردن، خويشاوندى است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;هنگامى كه فرمان پيامبر صلى اللَّه عليه و آله در مورد حركت براى جنگ تبوك صادر شد، بعضى گفتند:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;ما بايد از والدين خود اجازه بگيريم. اين جمله نازل شد كه &amp;laquo;النَّبِيُّ أَوْلى&amp;rlm; بِالْمُؤْمِنِينَ&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;با توجه به شان نزول آیه، اولویت پیامبر به مومنین در حد برتری خواست او از مومنین نسبت به خواست پدر و مادر آنان نسبت به حضور در جنگ است و اینهم به دلیل حق حاکمیت اوست (که آنهم بنا به خواست مومنین صاحب چنین حقی شده است) البته این حق برای هر حاکمی محفوظ است که در شرایط خاص بدون رضایت پدر و مادر جوانان آنان را به صحنه نبرد ببرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;● علامه طباطبائی در المیزان در معنای &amp;quot;اولی&amp;quot; می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;أولى بودن رسول خدا (ص) به مؤمنين از خود مؤمنين&amp;quot; اين است كه آن جناب اختياردارتر نسبت به مؤمنين است از خود مؤمنين، و معناى اولويت اين است كه فرد مسلمان هر جا امر را دائر ديد بين حفظ منافع رسول خدا (ص) و حفظ منافع خودش، بايد منافع رسول خدا (ص) را مقدم بدارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و بنا بر اين معناى آيه اين مى&amp;rlm;شود كه مؤمن هر حق و منافعى كه براى خودش قائل است، اگر حفظ جان خويش است و اگر دوست داشتن خودش است، و اگر براى خود حرمتى قائل است، و اگر استجابت دعوت است، و اگر به كار بردن اراده خويش است، هر چه باشد، رسول خدا (ص) مقدم بر او است، يعنى هر جا كه امر دائر شد بين حفظ جان رسول خدا (ص)، يا جان خودش، يا بين دوست داشتن رسول خدا (ص)، يا دوست داشتن خودش، و همچنين ساير موارد ديگر، جانب رسول خدا (ص) را بر جانب خود ترجيح دهد. در نتيجه، اگر در هنگام خطر، جان رسول خدا (ص) در مخاطره قرار گيرد، يك فرد مسلمان موظف است كه با جان خود سپر بلاى آن جناب شود و خود را فدايش كند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و همچنين در تمامى امور دنيا و دين، رسول خدا (ص) أولى و اختياردارتر است، و اينكه گفتيم در تمامى امور دنيا و دين، به خاطر اطلاقى است كه در جمله&amp;quot; النَّبِيُّ أَوْلى&amp;rlm; بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنْفُسِهِمْ&amp;quot; هست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد نظر علامه طباطبایی&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;۱&lt;/strong&gt;&amp;minus; علیرغم اینکه در این آیه دو بار از لفظ &amp;quot;اولی&amp;quot; استفاده شده و علامه نمی&amp;zwnj;تواند بگوید این دو با هم فرق دارد، همان معنا را که در &amp;quot;اولی&amp;quot; اول در نظر می&amp;zwnj;گیرد هرگز در دومی بکار نمی&amp;zwnj;بندد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&amp;minus; آیه در &amp;quot;اولی&amp;quot; دوم می&amp;zwnj;گوید :&amp;quot;خويشاوندان نسبى از مؤمنان و مهاجران به يكديگر سزاوارترند&amp;quot; می&amp;zwnj;دانید که پیامبر در بدو ورود به یثرب (مدینه&amp;minus; مهاجرین و انصار را دو به دو برادر اعلام کرد و همین موضوع سبب شد که بعدها مسله میراث بری از هم مطرح شود و در اینجا آیه می&amp;zwnj;گوید :&amp;quot;خويشاوندان نسبى از مؤمنان و مهاجران به يكديگر سزاوارترند&amp;quot; یعنی مشمول میراث نمی&amp;zwnj;شوند، اینکه به خویشان خود نسبت به سایر مومنین &amp;quot;اولی&amp;quot; هستند، آیا با مفهومی که جناب علامه قصد القاء آن را دارند سازگار است؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&amp;minus; این برداشت علامه با آیات دیگر نظیر آیه &amp;quot;وما الرسول الا البلاغ&amp;quot; &amp;quot;پیامبر جز ابلاغ وظیفه&amp;zwnj;ای ندارد&amp;quot; نیز ناسازگار است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴&amp;minus; مگر پیامبر چه منافعی دارد که مومنین باید از منافع خود در برابر منافع رسول چشم بپوشند؟ اگر مومنین جان خود را به خطر می&amp;zwnj;اندازند تا رسول گرامی آسیب نبیند، نتیجه محبت و علاقه&amp;zwnj;ای است که مومنین به رسول خدا دارند نه اینکه مکلف هستند هر چند علاقه نداشته باشند که جان خود را به خطر اندازند، تبدیل رابطه محبت و دوستی و علاقه به نبی اکرم به وظیفه و تکلیف، تبدیل کردن دین رحمانی به دین استبدادی است و نیز تبدیل اطاعت از روی میل قلبی به اطاعت از روی اجبار و این خلاف بعثت انبیاست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;● علامه طباطبائی در المیزان در ادامه می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;از اينجا روشن مى&amp;rlm;شود اينكه بعضى &amp;laquo;تفسير كشاف، ج ۳، ص ۵۲۳&amp;raquo; گفته&amp;rlm;اند: مراد اولويت آن جناب در دعوت است، يعنى وقتى آن جناب مؤمنين را به چيزى دعوت كرد، و نفس مؤمنين ايشان را به چيز ديگر، واجب است دعوت او را اطاعت كنند و دعوت نفس خود را عصيان كنند، در نتيجه آيه مورد بحث همان را مى&amp;rlm;گويد كه آيه&amp;quot; وَ أَطِيعُوا الرَّسُولَ&amp;quot; &amp;laquo;سوره نساء، آيه ۵۹. &amp;raquo; و آيه&amp;rlm;&amp;quot; وَ ما أَرْسَلْنا مِنْ رَسُولٍ إِلَّا لِيُطاعَ بِإِذْنِ اللَّهِ&amp;quot; &amp;laquo;هيچ رسولى نفرستاديم مگر براى آنكه به اذن خدا اطاعت شود. سوره نساء، آيه ۶۴.&amp;raquo; و آياتى ديگر نظير آن، در مقام بيان آن است، تفسير ضعيفى است براى اينكه گفتيم آيه مطلق است، و همه شؤون دنيايى و دينى را شامل مى&amp;rlm;شود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و همچنين آن تفسير ديگر كه گفته&amp;rlm;اند &amp;laquo;روح البيان، ج ۷، ص ۱۳۸&amp;raquo;: مراد نافذتر بودن حكم آن جناب نسبت به حكمى كه مؤمنين عليه يكديگر مى&amp;rlm;كنند، مى&amp;rlm;باشد هم چنان كه در آيه&amp;quot; فَسَلِّمُوا عَلى&amp;rlm; أَنْفُسِكُمْ&amp;quot; &amp;laquo;روح البيان، ج ۷، ص ۱۳۸&amp;raquo; منظور سلام كردن به يكديگر است، پس به گفته اين مفسرين برگشت معناى آيه مورد بحث به اين است كه رسول خدا (ص) بر مؤمنين ولايت دارد، ولايتى كه فوق ولايت آنان نسبت به يكديگر است، كه آيه&amp;quot; وَ الْمُؤْمِنُونَ وَ الْمُؤْمِناتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِياءُ بَعْضٍ&amp;quot; &amp;laquo;مردان و زنان مؤمن بعضى بر بعض ديگر ولايت دارند. سوره برائت، آيه ۷۱&amp;raquo; بر آن دلالت دارد اين قول نيز ضعيف است براى اينكه سياق با آن مساعد نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد نظر علامه طباطبایی&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱&amp;minus; اتفاقأ نظر مفسرین &amp;quot;کشاف&amp;quot; و &amp;quot;روح المعانی&amp;quot; به حقیقت امر نزدیک تر است و علامه با بکار بردن عبارات &amp;quot;تفسیر ضعیفی است&amp;quot; ویا &amp;quot; سیاق با آن مساعد نیست&amp;quot; عملأ نظر آنان را نقد نکرده و فقط رد کرده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&amp;minus; بنابراین &amp;quot;اولی النبی&amp;quot; سزاواری او نسبت به مومنین در دعوت، اطاعت و احکام صادره از ناحیه پیامبر است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;● علامه طباطبائی در المیزان در ادامه می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و مراد از اولويت در اين جمله كه فرمود: صاحبان رحم بعضى اولى بر بعض ديگرند، اولويت در توارث (از يكديگر ارث بردن) است، و منظور از كتاب خدا، يا لوح محفوظ است، و يا قرآن، و يا سوره قرآن، و جمله&amp;quot; مِنَ الْمُؤْمِنِينَ وَ الْمُهاجِرِينَ&amp;quot;، بيان مى&amp;rlm;كند آن كسانى را كه صاحبان رحم از آنان اولى به ارثند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و مراد از مؤمنين، مؤمنين غير مهاجر است، و معناى آيه اين است كه صاحبان رحم بعضيشان اولى به بعض ديگر از مهاجرين، و سائر مؤمنين هستند كه به ملاك برادرى دينى از يكديگر ارث مى&amp;rlm;بردند، و اين اولويت در كتاب خدا است، و چه بسا احتمال داده شود كه جمله&amp;quot; مِنَ الْمُؤْمِنِينَ وَ الْمُهاجِرِينَ&amp;quot;، بيان صاحبان رحم باشد، كه در اين صورت معنا چنين مى&amp;rlm;شود: صاحبان رحم از مهاجرين و غير مهاجرين بعضى اولى از بعضى ديگرند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اين آيه ناسخ حكمى است كه در صدر اسلام اجراء مى&amp;rlm;شد و آن اين بود كه كسانى كه به خاطر حفظ دينشان از وطن و آنچه در وطن داشتند چشم مى&amp;rlm;پوشيدند، و يا صرفا به خاطر دين با يكديگر دوستى مى&amp;rlm;كردند، در بين خود از يكديگر ارث مى&amp;rlm;بردند، آيه مورد بحث اين حكم را نسخ كرد، و فرمود: از اين به بعد تنها خويشاوندان از يكديگر ارث مى&amp;rlm;برند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;○ نقد نظر علامه طباطبایی&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱&amp;minus; علامه که اولی النبی را اولی بالتصرف معنا می&amp;zwnj;کرد، در اینجا اولی الارحام را به معنای خاص ارث بردن معنا می&amp;zwnj;کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲&amp;minus; و اولیائکم آخر آیه را دوستی معنا می&amp;zwnj;کند اما درباره پیامبر می&amp;zwnj;نویسد &amp;quot;رسول اللَّه (ص&amp;minus; ولى مؤمنين است، چون داراى منصبى است از طرف پروردگار، و آن اينست كه در بين مؤمنين حكومت و له و عليه آنها قضاوت مى&amp;rlm;نمايد&amp;quot; و البته این نوع اولویت را برای ائمه شیعه نیز قائل است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳&amp;minus; علامه حق حکومت پیامبر و ائمه را ناشی از بیعت مومنین نمی&amp;zwnj;داند بلکه آن را یک وظیفه الهی می&amp;zwnj;فهمد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴&amp;minus; این یک بام و دو هوا بودن در تفسیر علامه نتیجه تعصب اوست&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;نتیجه اینکه:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;۱. &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;ولایت نزدیکی دو فرد است از جهتی (مکانی، نسبی، دوستی، یاری و یا عقیده) &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;۲. &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;تبدیل و تغییر تعریف &amp;quot;ولایت&amp;quot; به &amp;quot;اولی بالتصرف&amp;quot; (حق تصرف در مال و جان مومنین) انحراف از معناست و با کلیه آیاتی که مربوط به &amp;quot;ولی&amp;quot; است ناسازگار است.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;۳. &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;عبارات &amp;quot;ولایت تکوینی و ولایت تشریعی&amp;quot; ساخته قرن اخیر است و در قرآن و سنت و روایات چنین واژه&amp;zwnj;ای بکار نرفته است &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;(شاید این عبارت اولین بار توسط خود علامه طباطبائی ابداع شده باشد که در ادامه مقاله به آن خواهیم پرداخت).&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;۴. &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&amp;quot;اولی النبی&amp;quot; سزاواری پیامبر گرامی نسبت به مومنین در دعوت، اطاعت و احکام صادره از ناحیه اوست.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;۵. &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;این آیات نمی&amp;zwnj;تواند مستمسکی برای چیرگی و تسلط سلطان مآبانه ائمه شیعه باشد و خود آنان نیز چنین ادعائی نداشته&amp;zwnj;اند اما متولیان شیعه بسیار علاقمندند این قدرت را به آنان بدهند که اگر سوء نیت نداشته باشند، شاید بتوان گفت از شدت محبتشان می&amp;zwnj;باشد که به غلو افتاده&amp;zwnj;اند.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;۶. &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;اما ماجرای طرفداران نظریه &amp;quot;ولایت فقیه&amp;quot; ماجرای غریبی است اگر فقهای شیعه برای بزرگ نمائی ائمه چنین تفسیر ناصوابی از ولایت ارائه داده&amp;zwnj;اند اینان برای برپائی حکومت شان به شدت نیازمند چنین تفسیری از &amp;quot;ولایت&amp;quot; هستند تا پایه&amp;zwnj;های حکومت شان را الهی جلوه دهند و از ایمان مومنین برای تحکیم قدرتشان بهره گیرند و هر مخالفی را که کوچکترین انتقاد را علنی کند به جرم مخالفت با &amp;quot;ولایت&amp;quot; خدا و رسول قربانی مطامع شان کنند.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;ادامه دارد&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بخش پیشین:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://radiozamaneh.com/reflections/2012/09/17/19646&quot;&gt;ولایت در قرآن (۱): آیات &amp;quot;ولایت&amp;quot;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
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     <comments>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/09/24/19857#comments</comments>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/reflections">انديشه زمانه</category>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/taxonomy/term/5194">صالح نظری</category>
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 <pubDate>Mon, 24 Sep 2012 09:33:52 +0000</pubDate>
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    <title>آیات &quot;ولایت&quot;</title>
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                    ولایت در قرآن (۱)        &lt;/div&gt;
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                    صالح نظری        &lt;/div&gt;
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&lt;/div&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;صالح نظری &amp;minus; نظر به اینکه حکومت جمهوری اسلامی مدعی است یک حکومت دینی مبتنی بر ولایت است و این ولایت الله از ناحیه خدا به رسول گرامی انتقال یافته و ولایت رسول اکرم به ائمه شیعه رسیده و در زمان غیبت امام غایب این ولایت به فقیه می&amp;zwnj;رسد ونام آن را ولایت فقیه به نیابت از امام غایب می&amp;zwnj;نامد و بر اساس این نظریه، باورمندان به تشیع را به اطاعت محض از آن ولی فقیه فرا می&amp;zwnj;خواند و منکران این ولایت را منکر ائمه و رسول و در نهایت خدا می&amp;zwnj;داند، لذا لازم است پیشینه این باور را در قرآن کریم جستجو کرد ه تا صحت مورد ادعا مورد کنکاش قرار گرفته و انطباق یا عدم انطباق این ادعا مورد سنجش قرار گیرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;یکی از دوستان روزی از من پرسید: این ولایت که آقایان می&amp;zwnj;گویند چیست؟ این مقاله در پاسخ به آن دوست نگاشته شده، امید است پاسخی شایسته برای او و سایر علاقه&amp;zwnj;مندان به موضوع باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;این مقاله دارای سه بخش است. بخش سوم مکملی دارد در مورد بحث ولایت در نهج البلاغه.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;دسته&amp;zwnj;بندی آیات&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;ریشه &amp;quot;ولی&amp;quot; و مشتقات آن در قرآن ۲۳۱ بار تکرار شده و در ۲۰۱ آیه از ولی و مشتقات آن استفاده شده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در حالت کلی با دو دسته از آیات روبرو هستیم:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;● الف: آیاتی که از مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; استفاده شده و مراد آن رویگردانی، سرپیچی کردن، اعراض کردن، گریختن، بازگشتن، سرباز زدن و نیز روی کردن است. این دسته آیات تقریبأ نیمی از آیات کلی &amp;quot;ولی&amp;quot; و مشتقات آن را در بر می&amp;zwnj;گیرد.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;با توجه به اینکه مراد مقاله این دسته آیات نیست، فقط در حد مثال، برای هر یک از این معانی شاهدی از آیات آورده می&amp;zwnj;شود:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. وَ إِذا تُتْلى&amp;rlm; عَلَيْهِ آياتُنا وَلَّى مُسْتَكْبِراً كَأَنْ لَمْ يَسْمَعْها كَأَنَّ في&amp;rlm; أُذُنَيْهِ وَقْراً فَبَشِّرْهُ بِعَذابٍ أَليمٍ (لقمان ۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و چون آيات ما بر آنها خوانده شود، با خودپسندى روى برگردانند، چنان كه گويى نشنيده&amp;rlm;اند. يا همانند كسى كه گوشهايش سنگين شده باشد. او را به عذابى دردآور بشارت ده.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;http://radiozamaneh.com/sites/default/files/%25b%25f/userfiles/%25u/velayat1.jpg&quot; style=&quot;width: 350px; height: 242px; float: left; margin: 10px;&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. تَدْعُوا مَنْ أَدْبَرَ وَ تَوَلَّى (معارج ۱۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;هر كه را كه به حق پشت كرد و از فرمان سرپيچيد به خود مى&amp;rlm;خواند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. وَ أَطيعُوا اللَّهَ وَ أَطيعُوا الرَّسُولَ فَإِنْ تَوَلَّيْتُمْ فَإِنَّما عَلى&amp;rlm; رَسُولِنَا الْبَلاغُ الْمُبينُ (تغابن ۱۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خدا را اطاعت كنيد، و پيامبر را اطاعت كنيد. پس اگر شما اعراض كنيد، بر فرستاده ما وظيفه&amp;rlm;اى جز رسانيدن پيام آشكار نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. وَ لَوْ قاتَلَكُمُ الَّذينَ كَفَرُوا لَوَلَّوُا الْأَدْبارَ ثُمَّ لا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَ لا نَصيراً (فتح ۲۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و اگر كافران با شما به جنگ برخيزند، پشت كرده بگريزند و ديگر هيچ دوست و ياريگرى نمى&amp;rlm;يابند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵. وَ يَقُولُونَ آمَنَّا بِاللَّهِ وَ بِالرَّسُولِ وَ أَطَعْنا ثُمَّ يَتَوَلَّى فَريقٌ مِنْهُمْ مِنْ بَعْدِ ذلِكَ وَ ما أُولئِكَ بِالْمُؤْمِنينَ (نور ۴۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و مى&amp;rlm;گويند: به خدا و پيامبرش ايمان آورده&amp;rlm;ايم و اطاعت مى&amp;rlm;كنيم. پس از آن گروهى از آنان باز مى&amp;rlm;گردند. و اينان ايمان نياورده&amp;rlm;اند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶. ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ مِنْ بَعْدِ ذلِكَ فَلَوْ لا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَ رَحْمَتُهُ لَكُنْتُمْ مِنَ الْخاسِرينَ (بقره ۶۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;ولى زان پس از فرمانسرباز زديد و اگر فضل و رحمت خدا نبود از زيانكاران مى&amp;rlm;بوديد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷. ...فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرامِ وَ حَيْثُ ما كُنْتُمْ فَوَلُّوا وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُ... (بقره ۱۴۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;... پس روى به جانب مسجد الحرام كن. و هر جا كه باشيد روى بدان جانب كنيد....&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;● ب: آیاتی که از بعض دیگر مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; استفاده شده و مراد آن، دوستی ورزیدن، کمک و یاری کردن، حمایت کردن است.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;این دسته از آیات که مقصود مقاله است نیاز به گروه بندی دارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;I&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;. &lt;/strong&gt;آیاتی که فقط خدا را ولی معرفی می&amp;zwnj;کند و ولایت غیر او را نفی می&amp;zwnj;کند:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. أَ لَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ لَهُ مُلْكُ السَّماواتِ وَ الْأَرْضِ وَ ما لَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ وَلِيٍّ وَ لا نَصيرٍ (بقره ۱۰۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آيا نمى&amp;rlm;دانى كه خدا فرمانرواى آسمانها و زمين است و شما را جز او يارى و ياورى نيست؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. وَ لَنْ تَرْضى&amp;rlm; عَنْكَ الْيَهُودُ وَ لاَ النَّصارى&amp;rlm; حَتَّى تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْ قُلْ إِنَّ هُدَى اللَّهِ هُوَ الْهُدى&amp;rlm; وَ لَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْواءَهُمْ بَعْدَ الَّذي جاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ ما لَكَ مِنَ اللَّهِ مِنْ وَلِيٍّ وَ لا نَصيرٍ (بقره۱۲۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;يهودان و ترسايان از تو خشنود نمى&amp;rlm;شوند، تا به آيينشان گردن نهى. بگو: هدايت، هدايتى است كه از جانب خدا باشد. اگراز آن پس كه خدا تو را آگاه كرده است از خواسته آنها پيروى كنى، هيچ ياور و مددكارى از جانب او نخواهى داشت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْراهيمَ لَلَّذينَ اتَّبَعُوهُ وَ هذَا النَّبِيُّ وَ الَّذينَ آمَنُوا وَ اللَّهُ وَلِيُّ الْمُؤْمِنينَ (آل عمران ۶۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;نزديك&amp;rlm;ترين كسان به ابراهيم همانا پيروان او و اين پيامبر و مؤمنان هستند. و خدا ياور مؤمنان است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. إِذْ هَمَّتْ طائِفَتانِ مِنْكُمْ أَنْ تَفْشَلا وَ اللَّهُ وَلِيُّهُما وَ عَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ (آل عمران۱۲۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;دو گروه از شما آهنگ آن كردند كه در جنگ سستى ورزند و خدا ياورشان بود، پس مؤمنان بايد كه بر خداى توكل كنند. (۱۲۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵. بَلِ اللَّهُ مَوْلاكُمْ وَ هُوَ خَيْرُ النَّاصِرينَ (آل عمران ۱۵۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;نه، يارى&amp;rlm;كننده شما خداوند است كه بهترين يارى&amp;rlm;كنندگان است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶. لا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْساً إِلاَّ وُسْعَها لَها ما كَسَبَتْ وَ عَلَيْها مَا اكْتَسَبَتْ رَبَّنا لا تُؤاخِذْنا إِنْ نَسينا أَوْ أَخْطَأْنا رَبَّنا وَ لا تَحْمِلْ عَلَيْنا إِصْراً كَما حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذينَ مِنْ قَبْلِنا رَبَّنا وَ لا تُحَمِّلْنا ما لا طاقَةَ لَنا بِهِ وَ اعْفُ عَنَّا وَ اغْفِرْ لَنا وَ ارْحَمْنا أَنْتَ مَوْلانا فَانْصُرْنا عَلَى الْقَوْمِ الْكافِرينَ (بقره ۲۸۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خدا هيچ كس را جز به اندازه طاقتش مكلّف نمى&amp;rlm;كند. نيكيهاى هر كس از آن خود اوست و بديهايش از آن خود اوست. اى پروردگار ما، اگر فراموش كرده&amp;rlm;ايم يا خطايى كرده&amp;rlm;ايم، ما را بازخواست مكن. اى پروردگار ما، آن گونه كه بر امّتهاى پيش از ما تكليف گران نهادى، تكليف گران بر ما منه و آنچه را كه طاقت آن نداريم، بر ما تكليف مكن. گناه ما ببخش و ما را بيامرز و بر ما رحمت آور. تو مولاى ما هستى. پس ما را بر گروه كافران پيروز گردان.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷. وَ اللَّهُ أَعْلَمُ بِأَعْدائِكُمْ وَ كَفى&amp;rlm; بِاللَّهِ وَلِيًّا وَ كَفى&amp;rlm; بِاللَّهِ نَصيراً (نساء ۴۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خدا دشمنان شما را بهتر مى&amp;rlm;شناسد و دوستى او شما را كفايت خواهد كرد و يارى او شما را بسنده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۸. لَيْسَ بِأَمانِيِّكُمْ وَ لا أَمانِيِّ أَهْلِ الْكِتابِ مَنْ يَعْمَلْ سُوءاً يُجْزَ بِهِ وَ لا يَجِدْ لَهُ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَ لا نَصيراً (نساء ۱۲۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;نه بر وفق مراد شماست و نه بر وفق مراد اهل كتاب، كه هر كس كه مرتكب كار بدى شود جزايش را ببيند، و جز خدا براى خويش دوست و ياورى نيابد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۹. فَأَمَّا الَّذينَ آمَنُوا وَ عَمِلُوا الصَّالِحاتِ فَيُوَفِّيهِمْ أُجُورَهُمْ وَ يَزيدُهُمْ مِنْ فَضْلِهِ وَ أَمَّا الَّذينَ اسْتَنْكَفُوا وَ اسْتَكْبَرُوا فَيُعَذِّبُهُمْ عَذاباً أَليماً وَ لا يَجِدُونَ لَهُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَ لا نَصيراً (نساء ۱۷۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اما آنان كه ايمان آورده&amp;rlm;اند و كارهاى نيك كرده&amp;rlm;اند اجرشان را به تمامى خواهد داد، و از فضل خويش بر آن خواهد افزود. اما كسانى را كه ابا و سركشى كرده&amp;rlm;اند به عذابى دردآور معذب خواهد داشت و براى خود جز خدا هيچ دوست و ياورى نخواهند يافت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۰. قُلْ أَ غَيْرَ اللَّهِ أَتَّخِذُ وَلِيًّافاطِرِ السَّماواتِ وَ الْأَرْضِ وَ هُوَ يُطْعِمُ وَ لا يُطْعَمُ قُلْ إِنِّي أُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ أَوَّلَ مَنْ أَسْلَمَ وَ لا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِكينَ (انعام۱۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بگو: آيا ديگرى جز خدا را به دوستى گيرم كه آفريننده آسمانها و زمين است و مى&amp;rlm;خوراند و به طعامش نياز نيست؟ بگو: هر آينه من مأمور شده&amp;rlm;ام كه نخستين كسى باشم كه تسليم امر خدا شده باشد. پس، از مشركان مباش.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۱. وَ أَنْذِرْ بِهِ الَّذينَ يَخافُونَ أَنْ يُحْشَرُوا إِلى&amp;rlm; رَبِّهِمْ لَيْسَ لَهُمْ مِنْ دُونِهِ وَلِيٌّ وَ لا شَفيعٌ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ (انعام۵۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آگاه ساز به اين كتاب، كسانى را كه از گردآمدن بر آستان پروردگارشان هراسناكند، كه ايشان را جز او هيچ ياورى و شفيعى نيست. باشد كه پرهيزگارى پيشه كنند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۲. ثُمَّ رُدُّوا إِلَى اللَّهِ مَوْلاهُمُ الْحَقِّ أَلا لَهُ الْحُكْمُ وَ هُوَ أَسْرَعُ الْحاسِبينَ (انعام۶۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;سپس به نزد خدا، مولاى حقيقى خويش بازگردانيده شوند. بدان كه حكم حكم اوست و او سريع&amp;rlm;ترين حسابگران است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۳. وَ ذَرِ الَّذينَ اتَّخَذُوا دينَهُمْ لَعِباً وَ لَهْواً وَ غَرَّتْهُمُ الْحَياةُ الدُّنْيا وَ ذَكِّرْ بِهِ أَنْ تُبْسَلَ نَفْسٌ بِما كَسَبَتْ لَيْسَ لَها مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلِيٌّ وَ لا شَفيعٌ وَ إِنْ تَعْدِلْ كُلَّ عَدْلٍ لا يُؤْخَذْ مِنْها أُولئِكَ الَّذينَ أُبْسِلُوا بِما كَسَبُوا لَهُمْ شَرابٌ مِنْ حَميمٍ وَ عَذابٌ أَليمٌ بِما كانُوا يَكْفُرُونَ (انعام۷۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و واگذار آن كسانى را كه دين خويش بازيچه و لهو گرفته&amp;rlm;اند و زندگانى دنيا فريبشان داد. و به قرآن پندشان ده مبادا بر كيفر اعمال خويش گرفتار آيند. جز خدا دادرس و شفيعى ندارند. و اگر براى رهايى خويش هر گونه فديه دهند پذيرفته نخواهد شد. اينان به عقوبت اعمال خود مأخوذند و به كيفر آنكه كافر شده&amp;rlm;اند برايشان شرابى از آب جوشان و عذابى دردآور مهيا شده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۴. لَهُمْ دارُ السَّلامِ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَ هُوَ وَلِيُّهُمْ بِما كانُوا يَعْمَلُونَ (انعام۱۲۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;براى آنها در نزد پروردگارشان، خانه آرامش است. و به پاداش كارهايى كه مى&amp;rlm;كنند، خدا دوستدار آنهاست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۵. وَ اخْتارَ مُوسى&amp;rlm; قَوْمَهُ سَبْعينَ رَجُلاً لِميقاتِنا فَلَمَّا أَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ قالَ رَبِّ لَوْ شِئْتَ أَهْلَكْتَهُمْ مِنْ قَبْلُ وَ إِيَّايَ أَ تُهْلِكُنا بِما فَعَلَ السُّفَهاءُ مِنَّا إِنْ هِيَ إِلاَّ فِتْنَتُكَ تُضِلُّ بِها مَنْ تَشاءُ وَ تَهْدي مَنْ تَشاءُ أَنْتَ وَلِيُّنا فَاغْفِرْ لَنا وَ ارْحَمْنا وَ أَنْتَ خَيْرُ الْغافِرينَ (اعراف۱۵۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;موسى براى وعده گاه ما از ميان قومش هفتاد مرد را برگزيد. چون زلزله آنها را فرو گرفت، گفت: اى پروردگار من، اگر مى&amp;rlm;خواستى ايشان را و مرا پيش از اين هلاك مى&amp;rlm;كردى. آيا به خاطر اعمالى كه بيخردان ما انجام داده&amp;rlm;اند ما را به هلاكت مى&amp;rlm;رسانى؟ و اين جز امتحان تو نيست. هر كس را بخواهى بدان گمراه مى&amp;rlm;كنى و هر كس را بخواهى هدايت. تو ياور ما هستى، ما را بيامرز و بر ما ببخشاى كه تو بهترين آمرزندگانى.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۶. إِنَّ وَلِيِّيَ اللَّهُ الَّذي نَزَّلَ الْكِتابَ وَ هُوَ يَتَوَلَّى الصَّالِحينَ (اعراف۱۹۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;ياور من اللَّه است كه اين كتاب را نازل كرده و او دوست شايستگان است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۷. يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ ما قالُوا وَ لَقَدْ قالُوا كَلِمَةَ الْكُفْرِ وَ كَفَرُوا بَعْدَ إِسْلامِهِمْ وَ هَمُّوا بِما لَمْ يَنالُوا وَ ما نَقَمُوا إِلاَّ أَنْ أَغْناهُمُ اللَّهُ وَ رَسُولُهُ مِنْ فَضْلِهِ فَإِنْ يَتُوبُوا يَكُ خَيْراً لَهُمْ وَ إِنْ يَتَوَلَّوْا يُعَذِّبْهُمُ اللَّهُ عَذاباً أَليماً فِي الدُّنْيا وَ الْآخِرَةِ وَ ما لَهُمْ فِي الْأَرْضِ مِنْوَلِيٍّ وَ لا نَصيرٍ (توبه۷۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;به خدا سوگند مى&amp;rlm;خورند كه نگفته&amp;rlm;اند، ولى كلمه كفر را بر زبان رانده&amp;rlm;اند. و پس از آنكه اسلام آورده بودند كافر شده&amp;rlm;اند. و قصد كارى كردند، اما بدان نايل نشدند. عيبجوييشان از آن روست كه خدا و پيامبرش از غنايم بى&amp;rlm;نيازشان كردند. پس اگر توبه كنند خيرشان در آن است، و اگر رويگردان شوند خدا به عذاب دردناكى در دنيا و آخرت معذبشان خواهد كرد و آنها را در روى زمين نه دوستدارى خواهد بود و نه مددكارى.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۸. إِنَّ اللَّهَ لَهُ مُلْكُ السَّماواتِ وَ الْأَرْضِ يُحْيي&amp;rlm; وَ يُميتُ وَ ما لَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْوَلِيٍّ وَ لا نَصيرٍ (توبه۱۱۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;فرمانروايى آسمانها و زمين از آن خداست. زنده مى&amp;rlm;كند و مى&amp;rlm;ميراند و شما را جز خدا دوستدار و ياورى نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۹. قُلْ لَنْ يُصيبَنا إِلاَّ ما كَتَبَ اللَّهُ لَنا هُوَ مَوْلانا وَ عَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ (توبه۵۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بگو: مصيبتى جز آنچه خدا براى ما مقرر كرده است به ما نخواهد رسيد. او مولاى ماست و مؤمنان بر خدا توكل كنند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۰. هُنالِكَ تَبْلُوا كُلُّ نَفْسٍ ما أَسْلَفَتْ وَ رُدُّوا إِلَى اللَّهِ مَوْلاهُمُ الْحَقِّ وَ ضَلَّ عَنْهُمْ ما كانُوا يَفْتَرُونَ (یونس۳۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در آنجا هر كس هر چه كرده است پاداشش را خواهد ديد و همه را به سوى خدا مولاى حقيقيشان بازمى&amp;rlm;گردانند و همه آن بتان كه به باطل مى&amp;rlm;پرستيدند نابود مى&amp;rlm;شوند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۱. أَلا إِنَّ أَوْلِياءَ اللَّهِ لا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَ لا هُمْ يَحْزَنُونَ (یونس۶۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آگاه باشيد كه بر دوستان خدا بيمى نيست و غمگين نمى&amp;rlm;شوند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۲. أُولئِكَ لَمْ يَكُونُوا مُعْجِزينَ فِي الْأَرْضِ وَ ما كانَ لَهُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ أَوْلِياءَ يُضاعَفُ لَهُمُ الْعَذابُ ما كانُوا يَسْتَطيعُونَ السَّمْعَ وَ ما كانُوا يُبْصِرُونَ (هود۲۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اينان نمى&amp;rlm;توانند در روى زمين از خداى بگريزند و جز او هيچ ياورى ندارند، عذابشان مضاعف مى&amp;rlm;شود. نه توان شنيدن داشته&amp;rlm;اند و نه توان ديدن.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۳. وَ لا تَرْكَنُوا إِلَى الَّذينَ ظَلَمُوا فَتَمَسَّكُمُ النَّارُ وَ ما لَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ أَوْلِياءَ ثُمَّ لا تُنْصَرُونَ (هود۱۱۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;به ستمكاران ميل مكنيد، كه آتش بسوزاندتان. شما را جز خدا هيچ دوستى نيست و كس ياريتان نكند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۴. رَبِّ قَدْ آتَيْتَني&amp;rlm; مِنَ الْمُلْكِ وَ عَلَّمْتَني&amp;rlm; مِنْ تَأْويلِ الْأَحاديثِ فاطِرَ السَّماواتِ وَ الْأَرْضِ أَنْتَ وَلِيِّي فِي الدُّنْيا وَ الْآخِرَةِ تَوَفَّني&amp;rlm; مُسْلِماً وَ أَلْحِقْني&amp;rlm; بِالصَّالِحينَ (یوسف۱۰۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى پروردگار من، مرا فرمانروايى دادى و مرا علم تعبير خواب آموختى. اى آفريننده آسمانها و زمين، تو در دنيا و آخرت كارساز منى. مرا مسلمان بميران و قرين شايستگان ساز.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۵. لَهُ مُعَقِّباتٌ مِنْ بَيْنِ يَدَيْهِ وَ مِنْ خَلْفِهِ يَحْفَظُونَهُ مِنْ أَمْرِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ لا يُغَيِّرُ ما بِقَوْمٍ حَتَّى يُغَيِّرُوا ما بِأَنْفُسِهِمْ وَ إِذا أَرادَ اللَّهُ بِقَوْمٍ سُوْءاً فَلا مَرَدَّ لَهُ وَ ما لَهُمْ مِنْ دُونِهِ مِنْ والٍ (رعد ۱۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آدمى را فرشتگانى است كه پياپى به امر خدا از رو به رو و پشت سرش مى&amp;rlm;آيند و نگهبانيش مى&amp;rlm;كنند. خدا چيزى را كه از آن مردمى است دگرگون نكند تا آن مردم خود دگرگون شوند. چون خدا براى مردمى بدى خواهد، هيچ چيز مانع او نتواند شد و ايشان را جز خدا هيچ كارسازى نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۶. قُلْ مَنْ رَبُّ السَّماواتِ وَ الْأَرْضِ قُلِ اللَّهُ قُلْ أَ فَاتَّخَذْتُمْ مِنْ دُونِهِ أَوْلِياءَ لا يَمْلِكُونَ لِأَنْفُسِهِمْ نَفْعاً وَ لا ضَرًّا قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الْأَعْمى&amp;rlm; وَ الْبَصيرُ أَمْ هَلْ تَسْتَوِي الظُّلُماتُ وَ النُّورُ أَمْ جَعَلُوا لِلَّهِ شُرَكاءَ خَلَقُوا كَخَلْقِهِ فَتَشابَهَ الْخَلْقُ عَلَيْهِمْ قُلِ اللَّهُ خالِقُ كُلِّ شَيْ&amp;rlm;ءٍ وَ هُوَ الْواحِدُ الْقَهَّارُ (رعد ۱۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بگو: كيست پروردگار آسمانها و زمين؟ بگو: اللَّه. بگو: آيا سواى او خدايانى برگزيده&amp;rlm;ايد كه قادر به سود و زيان خويش نيستند؟ بگو: آيا نابينا و بينا برابرند؟ يا تاريكى و روشنى يكسانند؟ يا شريكانى كه براى خدا قائل شده&amp;rlm;اند چيزهايى آفريده&amp;rlm;اند، همانند آنچه خدا آفريده است و آنان درباره آفرينش به اشتباه افتاده&amp;rlm;اند؟ بگو: اللَّه آفريننده هر چيزى است و او يگانه و قهار است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۷. وَ كَذلِكَ أَنْزَلْناهُ حُكْماً عَرَبِيًّا وَ لَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْواءَهُمْ بَعْدَ ما جاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ ما لَكَ مِنَ اللَّهِ مِنْ وَلِيٍّ وَ لا واقٍ (رعد ۳۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;همچنين قرآن را به زبان عربى نازل كرديم. اگر پس از دانشى كه به تو رسيده، از پى خواهشهاى آنان بروى، در برابر خدا كارساز و نگهدارنده&amp;rlm;اى نخواهى داشت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۸. وَ مَنْ يَهْدِ اللَّهُ فَهُوَ الْمُهْتَدِ وَ مَنْ يُضْلِلْ فَلَنْ تَجِدَ لَهُمْ أَوْلِياءَ مِنْ دُونِهِ وَ نَحْشُرُهُمْ يَوْمَ الْقِيامَةِ عَلى&amp;rlm; وُجُوهِهِمْ عُمْياً وَ بُكْماً وَ صُمًّا مَأْواهُمْ جَهَنَّمُ كُلَّما خَبَتْ زِدْناهُمْ سَعيراً (اسراء۹۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و هر كه را خدا هدايت كند، هدايت شده است. و هر كه را گمراه سازد جز خداى براى او سرپرستى نيابى و در روز قيامت در حالى كه چهره&amp;rlm;هايشان رو به زمين است، كور و لال و كر محشورشان مى&amp;rlm;كنيم و جهنم جايگاه آنهاست كه هر چه شعله آن فرو نشيند بيشترش مى&amp;rlm;افروزيم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۹. وَ قُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَداً وَ لَمْ يَكُنْ لَهُ شَريكٌ فِي الْمُلْكِ وَ لَمْ يَكُنْ لَهُ وَلِيٌّ مِنَ الذُّلِّ وَ كَبِّرْهُ تَكْبيراً (اسراء۱۱۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بگو: سپاس خدايى را كه فرزندى ندارد و او را شريكى در مُلك نيست و به مذلت نيفتد كه به يارى محتاج شود. پس او را تكبير گوى، تكبيرى شايسته.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۰. وَ تَرَى الشَّمْسَ إِذا طَلَعَتْ تَتَزاوَرُ عَنْ كَهْفِهِمْ ذاتَ الْيَمينِ وَ إِذا غَرَبَتْ تَقْرِضُهُمْ ذاتَ الشِّمالِ وَ هُمْ في&amp;rlm; فَجْوَةٍ مِنْهُ ذلِكَ مِنْ آياتِ اللَّهِ مَنْ يَهْدِ اللَّهُ فَهُوَ الْمُهْتَدِ وَ مَنْ يُضْلِلْ فَلَنْ تَجِدَ لَهُ وَلِيًّا مُرْشِداً (کهف۱۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و خورشيد را مى&amp;rlm;بينى كه چون برمى&amp;rlm;آيد، از غارشان به جانب راست ميل مى&amp;rlm;كند و چون غروب كند ايشان را واگذارد و به چپ گردد. و آنان در صحنه غارند. و اين از آيات خداست. هر كه را خدا هدايت كند هدايت يافته است و هر كه را گمراه سازد هرگز كارسازى راهنما براى او نخواهى يافت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۱. قُلِ اللَّهُ أَعْلَمُ بِما لَبِثُوا لَهُ غَيْبُ السَّماواتِ وَ الْأَرْضِ أَبْصِرْ بِهِ وَ أَسْمِعْ ما لَهُمْ مِنْ دُونِهِ مِنْ وَلِيٍّ وَ لا يُشْرِكُ في&amp;rlm; حُكْمِهِ أَحَداً (۲۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بگو: خداوند داناتر است كه چند سال آرميدند. غيب آسمانها و زمين از آنِ اوست. چه بيناست و چه شنواست. جز او دوستى ندارند و كس را در فرمان خود شريك نسازد. (کهف۲۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۲. هُنالِكَ الْوَلايَةُ لِلَّهِ الْحَقِّ هُوَ خَيْرٌ ثَواباً وَ خَيْرٌ عُقْباً (کهف۴۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آنجا يارى كردن خداى حق را سزد. پاداش او بهتر و سرانجامش نيكوتر است. (۴۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۳. وَ جاهِدُوا فِي اللَّهِ حَقَّ جِهادِهِ هُوَ اجْتَباكُمْ وَ ما جَعَلَ عَلَيْكُمْ فِي الدِّينِ مِنْ حَرَجٍ مِلَّةَ أَبيكُمْ إِبْراهيمَ هُوَ سَمَّاكُمُ الْمُسْلِمينَ مِنْ قَبْلُ وَ في&amp;rlm; هذا لِيَكُونَ الرَّسُولُ شَهيداً عَلَيْكُمْ وَ تَكُونُوا شُهَداءَ عَلَى النَّاسِ فَأَقيمُوا الصَّلاةَ وَ آتُوا الزَّكاةَ وَ اعْتَصِمُوا بِاللَّهِ هُوَ مَوْلاكُمْ فَنِعْمَ الْمَوْلى&amp;rlm; وَ نِعْمَ النَّصيرُ (حج۷۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در راه خداوند چنان كه بايد جهاد كنيد. او شما را برگزيد. و برايتان در دين هيچ تنگنايى پديد نياورد. كيش پدرتان ابراهيم است. او پيش از اين و در اين شما را مسلمان ناميد. تا پيامبر بر شما گواه باشد و شما بر ديگر مردم گواه باشيد. پس نماز بگزاريد و زكات بدهيد و به خدا توسل جوييد. اوست مولاى شما. چه مولايى نيكو و چه ياورى نيكو.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۴. قالُوا سُبْحانَكَ ما كانَ يَنْبَغي&amp;rlm; لَنا أَنْ نَتَّخِذَ مِنْ دُونِكَ مِنْ أَوْلِياءَ وَ لكِنْ مَتَّعْتَهُمْ وَ آباءَهُمْ حَتَّى نَسُوا الذِّكْرَ وَ كانُوا قَوْماً بُوراً (فرقان۱۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;گويند: منزهى تو. ما را سزاوار نبوده است كه جز تو كسى را به يارى گيريم. تو خود آنها و پدرانشان را برخوردار ساختى، چنان كه ياد تو را فراموش كردند و مردمى شدند به هلاكت افتاده.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۵. وَ ما أَنْتُمْ بِمُعْجِزينَ فِي الْأَرْضِ وَ لا فِي السَّماءِ وَ ما لَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ وَلِيٍّ وَ لا نَصيرٍ (عنکبوت۲۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;شما نمى&amp;rlm;توانيد از خدا بگريزيد، نه در زمين و نه در آسمان و شما را جز او هيچ كارساز و ياورى نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۶. مَثَلُ الَّذينَ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِ اللَّهِ أَوْلِياءَ كَمَثَلِ الْعَنْكَبُوتِ اتَّخَذَتْ بَيْتاً وَ إِنَّ أَوْهَنَ الْبُيُوتِ لَبَيْتُ الْعَنْكَبُوتِ لَوْ كانُوا يَعْلَمُونَ (عنکبوت۴۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;مثَل آنان كه سواى خدا را اوليا گرفتند، مثَل عنكبوت است كه خانه&amp;rlm;اى بساخت. و كاش مى&amp;rlm;دانستند، هر آينه سست&amp;rlm;ترين خانه&amp;rlm;ها خانه عنكبوت است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۷. قُلْ مَنْ ذَا الَّذي يَعْصِمُكُمْ مِنَ اللَّهِ إِنْ أَرادَ بِكُمْ سُوءاً أَوْ أَرادَ بِكُمْ رَحْمَةً وَ لا يَجِدُونَ لَهُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَ لا نَصيراً (احزاب۱۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بگو: اگر خدا برايتان قصد بدى داشته باشد يا بخواهد به شما رحمتى ارزانى دارد، كيست كه شما را از اراده او نگه دارد. ايشان جز خدا براى خود دوست و مددكارى نخواهند يافت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۸. خالِدينَ فيها أَبَداً لا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَ لا نَصيراً (احزاب۶۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;كه در آن جاودانه&amp;rlm;اند و هيچ دوست و ياورى نخواهند يافت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۹. اللَّهُ الَّذي خَلَقَ السَّماواتِ وَ الْأَرْضَ وَ ما بَيْنَهُما في&amp;rlm; سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوى&amp;rlm; عَلَى الْعَرْشِ ما لَكُمْ مِنْ دُونِهِ مِنْ وَلِيٍّ وَ لا شَفيعٍ أَ فَلا تَتَذَكَّرُونَ (سجده۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خداست كه آسمانها و زمين را و آنچه ميان آنهاست در شش روز بيافريد و آن گاه به عرش پرداخت. شما را جز او كارساز و شفيعى نيست. آيا پند نمى&amp;rlm;گيريد؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۰. قالُوا سُبْحانَكَ أَنْتَ وَلِيُّنا مِنْ دُونِهِمْ بَلْ كانُوا يَعْبُدُونَ الْجِنَّ أَكْثَرُهُمْ بِهِمْ مُؤْمِنُونَ (سبا۴۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;مى&amp;rlm;گويند: تو منزهى. تويى ولىّ ما، نه آنها. اينان جنها را مى&amp;rlm;پرستيدند و بيشترين به آنها ايمان داشتند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۱. وَ الَّذينَ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِهِ أَوْلِياءَ اللَّهُ حَفيظٌ عَلَيْهِمْ وَ ما أَنْتَ عَلَيْهِمْ بِوَكيلٍ (شورا ۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خدا مراقب اعمال كسانى است كه جز او را به دوستى گرفتند، و تو وكيل آنها نيستى.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۲. وَ لَوْ شاءَ اللَّهُ لَجَعَلَهُمْ أُمَّةً واحِدَةً وَ لكِنْ يُدْخِلُ مَنْ يَشاءُ في&amp;rlm; رَحْمَتِهِ وَ الظَّالِمُونَ ما لَهُمْ مِنْ وَلِيٍّ وَ لا نَصيرٍ (شورا ۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اگر خدا مى&amp;rlm;خواست همه را يك امت كرده بود. ولى او هر كه را كه بخواهد به رحمت خويش درآورد، و ستمكاران را هيچ دوست و ياورى نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۳. أَمِ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِهِ أَوْلِياءَ فَاللَّهُ هُوَ الْوَلِيُّ وَ هُوَ يُحْيِ الْمَوْتى&amp;rlm; وَ هُوَ عَلى&amp;rlm; كُلِّ شَيْ&amp;rlm;ءٍ قَديرٌ (شورا ۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آيا جز خدا را به دوستى گرفتند؟ دوست حقيقى خداست. و اوست كه مردگان را زنده مى&amp;rlm;كند، و اوست كه بر هر كارى تواناست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۴. وَ هُوَ الَّذي يُنَزِّلُ الْغَيْثَ مِنْ بَعْدِ ما قَنَطُوا وَ يَنْشُرُ رَحْمَتَهُ وَ هُوَ الْوَلِيُّ الْحَميدُ (شورا ۲۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و اوست آن خدايى كه بعد از نوميديشان باران مى&amp;rlm;فرستد و رحمت خود را به همه جا منتشر مى&amp;rlm;كند و اوست كارساز و ستودنى.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۵. وَ ما أَنْتُمْ بِمُعْجِزينَ فِي الْأَرْضِ وَ ما لَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ وَلِيٍّ وَ لا نَصيرٍ (شورا ۳۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;شما نتوانيد در روى زمين از او بگريزيد و شما را جز او كارساز و ياورى نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۶. وَ مَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ فَما لَهُ مِنْ وَلِيٍّ مِنْ بَعْدِهِ وَ تَرَى الظَّالِمينَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذابَ يَقُولُونَ هَلْ إِلى&amp;rlm; مَرَدٍّ مِنْ سَبيلٍ (شورا ۴۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;هر كس را كه خدا گمراه كند از آن پس هيچ دوستى نخواهد داشت. و ظالمان را مى&amp;rlm;بينى كه چون عذاب را بنگرند، مى&amp;rlm;گويند: آيا ما را راه بازگشتى هست؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۷. وَ ما كانَ لَهُمْ مِنْ أَوْلِياءَ يَنْصُرُونَهُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَ مَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ فَما لَهُ مِنْ سَبيلٍ (شورا ۴۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;جز خدا يار و مددكارى ندارند و هر كس را كه خدا گمراه كند هيچ راهى برايش نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۸. وَ مَنْ لا يُجِبْ داعِيَ اللَّهِ فَلَيْسَ بِمُعْجِزٍ فِي الْأَرْضِ وَ لَيْسَ لَهُ مِنْ دُونِهِ أَوْلِياءُ أُولئِكَ في&amp;rlm; ضَلالٍ مُبينٍ (احقاف۳۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و هر كس كه به اين دعوت&amp;rlm;كننده جواب نگويد نمى&amp;rlm;تواند در روى زمين از خداى بگريزد و او را جز خدا هيچ ياورى نيست و در گمراهى آشكارى است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۹. ذلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ مَوْلَى الَّذينَ آمَنُوا وَ أَنَّ الْكافِرينَ لا مَوْلى&amp;rlm; لَهُمْ (محمد۱۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اين بدان سبب است كه خدا ياور كسانى است كه ايمان آورده&amp;rlm;اند. و كافران را هيچ ياورى نيست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۰. قَدْ فَرَضَ اللَّهُ لَكُمْ تَحِلَّةَ أَيْمانِكُمْ وَ اللَّهُ مَوْلاكُمْ وَ هُوَ الْعَليمُ الْحَكيمُ (تحریم۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خدا براى شما گشودن سوگندهايتان را مقرر داشته است. خداست ياور شما، و اوست دانا و حكيم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۱. إِنْ تَتُوبا إِلَى اللَّهِ فَقَدْ صَغَتْ قُلُوبُكُما وَ إِنْ تَظاهَرا عَلَيْهِ فَإِنَّ اللَّهَ هُوَ مَوْلاهُ وَ جِبْريلُ وَ صالِحُ الْمُؤْمِنينَ وَ الْمَلائِكَةُ بَعْدَ ذلِكَ ظَهيرٌ (تحریم۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اگر شما دو زن توبه كنيد بهتر است، زيرا دلهايتان از حق باز گشته است. و اگر براى آزارش همدست شويد، خدا ياور اوست و نيز جبرئيل و مؤمنان شايسته و فرشتگان از آن پس ياور او خواهند بود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;چنانچه ملاحظه می&amp;zwnj;شود در این گروه از آیات، تنها خداوند &amp;quot;ولی&amp;quot; معرفی شده و ولایت غیر خدا نفی شده است. ولایت خداوند هم چیزی جز دوستی به معنای تحت حمایت خداوند بودن نیست، برای همین این دوستی مترادف با یاری و یاوری است و اهمیت موضوع آنچنان است که ۵۱ آیه به آن اختصاص می&amp;zwnj;یابد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در ادامه با آیاتی روبرو می&amp;zwnj;شویم که اشاره به &amp;quot;ولی&amp;quot; بودن رسول دارد، در کل قرآن فقط با دو آیه برخود می&amp;zwnj;کنیم که به ولایت رسول اکرم اشاره دارد و جالب است هیچ یک از آیات مربوط به ولایت نبی گرامی، مستقلأ و جدا از &amp;quot;ولی&amp;quot;بودن و ولایت سایر مومنین نیست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;II&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;. &lt;/strong&gt;آیاتی که رسول را ولی خطاب می&amp;zwnj;کند:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. إِنَّماوَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَ رَسُولُهُ وَ الَّذينَ آمَنُوا الَّذينَ يُقيمُونَ الصَّلاةَ وَ يُؤْتُونَ الزَّكاةَ وَ هُمْ راكِعُونَ (مائده ۵۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;جز اين نيست كه ولىّ شما خداست و رسول او و مؤمنانى كه نماز مى&amp;rlm;خوانند و هم چنان كه در ركوعند انفاق مى&amp;rlm;كنند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. وَ مَنْ يَتَوَلَّ اللَّهَ وَ رَسُولَهُ وَ الَّذينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغالِبُونَ (مائده ۵۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و هر كه خدا و پيامبر او و مؤمنان را ولىّ خود گزيند، بداند كه پيروزمندان گروه خداوندند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بنابراین همسنگی ولایت رسول با سایر مومنین خود گواه است که ویژگی ممتازی میان ولایت رسول با ولایت سایر مومنین نیست، هر چند رهبری مومنین با اوست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;این دو آیه و خصوصأ آیه اول یکی از دستاویزهای مهم اثبات ولایت ویژه برای ائمه شیعه می&amp;zwnj;باشد و بالطبع مستند باورمندان به ولایت فقیه نیز هست و از این آیه برای دوران غیبت امام غائب، ولایت فقیه را نتیجه می&amp;zwnj;گیرند و به جهت اهمیت آن در ادامه مقاله مفصلأ به آن خواهیم پرداخت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;گروه سوم آیاتی است که ولایت مومنین را برهم و در کنار ولایت خدا معرفی می&amp;zwnj;کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.III&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; آیاتی که مومنین را ولی همدیگر معرفی می&amp;zwnj;کند&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. لا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكافِرينَ أَوْلِياءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنينَ وَ مَنْ يَفْعَلْ ذلِكَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ في&amp;rlm; شَيْ&amp;rlm;ءٍ إِلاَّ أَنْ تَتَّقُوا مِنْهُمْ تُقاةً وَ يُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ وَ إِلَى اللَّهِ الْمَصيرُ (آل عمران ۲۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;نبايد مؤمنان، كافران را به جاى مؤمنان به دوستى برگزينند. پس هر كه چنين كند او را با خدا رابطه&amp;rlm;اى نيست. مگر اينكه از آنها بيمناك باشيد. و خدا شما را از خودش مى&amp;rlm;ترساند كه بازگشت به سوى اوست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. وَ ما لَكُمْ لا تُقاتِلُونَ في&amp;rlm; سَبيلِ اللَّهِ وَ الْمُسْتَضْعَفينَ مِنَ الرِّجالِ وَ النِّساءِ وَ الْوِلْدانِ الَّذينَ يَقُولُونَ رَبَّنا أَخْرِجْنا مِنْ هذِهِ الْقَرْيَةِ الظَّالِمِ أَهْلُها وَ اجْعَلْ لَنا مِنْ لَدُنْكَ وَلِيًّا وَ اجْعَلْ لَنا مِنْ لَدُنْكَ نَصيراً (نساء ۷۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;چرا در راه خدا و به خاطر مردان و زنان و كودكان ناتوانى كه مى&amp;rlm;گويند: اى پروردگار ما، ما را از اين قريه ستمكاران بيرون آر و از جانب خود ياوری قرار ده، و از جانب خودما را یاری کن، نمى&amp;rlm;جنگيد؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. الَّذينَ يَتَّخِذُونَ الْكافِرينَ أَوْلِياءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنينَ أَ يَبْتَغُونَ عِنْدَهُمُ الْعِزَّةَ فَإِنَّ الْعِزَّةَ لِلَّهِ جَميعاً (نساء ۱۳۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;كسانى كه به جاى مؤمنان كافران را به دوستى برمى&amp;rlm;گزينند، آيا عزت و توانايى را نزد آنان مى&amp;rlm;جويند، در حالى كه عزت به تمامى از آن خداست؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا الْكافِرينَ أَوْلِياءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنينَ أَ تُريدُونَ أَنْ تَجْعَلُوا لِلَّهِ عَلَيْكُمْ سُلْطاناً مُبيناً (نساء ۱۴۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;ايد، به جاى مؤمنان كافران را به دوستى مگيريد. آيا كارى مى&amp;rlm;كنيد كه براى خدا به زيان خود حجتى آشكار پديد آريد؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵. إِنَّماوَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَ رَسُولُهُ وَ الَّذينَ آمَنُوا الَّذينَ يُقيمُونَ الصَّلاةَ وَ يُؤْتُونَ الزَّكاةَ وَ هُمْ راكِعُونَ (مائده ۵۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;جز اين نيست كه ولىّ شما خداست و رسول او و مؤمنانى كه نماز مى&amp;rlm;خوانند و هم چنان كه در ركوعند انفاق مى&amp;rlm;كنند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶. وَ مَنْ يَتَوَلَّ اللَّهَ وَ رَسُولَهُ وَ الَّذينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغالِبُونَ (مائده ۵۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و هر كه خدا و پيامبر او و مؤمنان را ولىّ خود گزيند، بداند كه پيروزمندان گروه خداوندند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷. وَ مَنْ يُوَلِّهِمْ يَوْمَئِذٍ دُبُرَهُ إِلاَّ مُتَحَرِّفاً لِقِتالٍ أَوْ مُتَحَيِّزاً إِلى&amp;rlm; فِئَةٍ فَقَدْ باءَ بِغَضَبٍ مِنَ اللَّهِ وَ مَأْواهُ جَهَنَّمُ وَ بِئْسَ الْمَصيرُ (انفال۱۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;جز آنها كه براى ساز و برگ نبرد باز مى&amp;rlm;گردند يا آنها كه به يارى گروهى ديگر مى&amp;rlm;روند، هر كس كه پشت به دشمن كند مورد خشم خدا قرار مى&amp;rlm;گيرد و جايگاه او جهنم است، و جهنم بد جايگاهى است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۸. وَ الْمُؤْمِنُونَ وَ الْمُؤْمِناتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِياءُ بَعْضٍ يَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَ يَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَ يُقيمُونَ الصَّلاةَ وَ يُؤْتُونَ الزَّكاةَ وَ يُطيعُونَ اللَّهَ وَ رَسُولَهُ أُولئِكَ سَيَرْحَمُهُمُ اللَّهُ إِنَّ اللَّهَ عَزيزٌ حَكيمٌ (توبه۷۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;مردان مؤمن و زنان مؤمن دوستان يكديگرند. به نيكى فرمان مى&amp;rlm;دهند و از ناشايست باز مى&amp;rlm;دارند، و نماز مى&amp;rlm;گزارند و زكات مى&amp;rlm;دهند و از خدا و پيامبرش فرمانبردارى مى&amp;rlm;كنند. خدا اينان را رحمت خواهد كرد، خدا پيروزمند و حكيم است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۹. وَ لا تَسْتَوِي الْحَسَنَةُ وَ لاَ السَّيِّئَةُ ادْفَعْ بِالَّتي&amp;rlm; هِيَ أَحْسَنُ فَإِذَا الَّذي بَيْنَكَ وَ بَيْنَهُ عَداوَةٌ كَأَنَّهُ وَلِيٌّ حَميمٌ (فصلت۳۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خوبى و بدى برابر نيستند. همواره به نيكوترين وجهى پاسخ ده، تا كسى كه ميان تو و او دشمنى است چون دوست مهربان تو گردد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۰. نَحْنُ أَوْلِياؤُكُمْ فِي الْحَياةِ الدُّنْيا وَ فِي الْآخِرَةِ وَ لَكُمْ فيها ما تَشْتَهي&amp;rlm; أَنْفُسُكُمْ وَ لَكُمْ فيها ما تَدَّعُونَ (فصلت۳۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;ما در دنيا دوستدار شما بوديم و نيز در آخرت دوستدار شماييم. در بهشت هر چه دلتان بخواهد و هر چه طلب كنيد برايتان فراهم است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آیات فوق در جهت ایجاد دوستی و مودت و یاری میان مومنین است و نشان می&amp;zwnj;دهد قرآن می&amp;zwnj;خواهد میان مومنین اتحاد عاطفی به وجود بیاورد که محور اتحاد خداوند باشد و نبی اکرم در راس آن قرار گیرد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;IV&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;. &lt;/strong&gt;آیاتی که ولایت غیر (طاغوت، شیطان، کافران، یهود و نصارا، بت، ظالمین، مغضوبین و...) را بر مومنین نفی می&amp;zwnj;کند&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. اللَّهُ وَلِيُّ الَّذينَ آمَنُوا يُخْرِجُهُمْ مِنَ الظُّلُماتِ إِلَى النُّورِ وَ الَّذينَ كَفَرُوا أَوْلِياؤُهُمُ الطَّاغُوتُ يُخْرِجُونَهُمْ مِنَ النُّورِ إِلَى الظُّلُماتِ أُولئِكَ أَصْحابُ النَّارِ هُمْ فيها خالِدُونَ (بقره ۲۵۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;خدا ياور مؤمنان است. ايشان را از تاريكيها به روشنى مى&amp;rlm;برد. ولى آنان كه كافر شده&amp;rlm;اند طاغوت ياور آنهاست، كه آنها را از روشنى به تاريكيها مى&amp;rlm;كشد. اينان جهنميانند و همواره در آن خواهند بود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. إِنَّما ذلِكُمُ الشَّيْطانُ يُخَوِّفُ أَوْلِياءَهُ فَلا تَخافُوهُمْ وَ خافُونِ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنينَ (آل عمران ۱۷۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آن شيطان است كه در دل دوستان خود بيم مى&amp;rlm;افكند. اگر ايمان آورده&amp;rlm;ايد از آنها مترسيد، از من بترسيد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. الَّذينَ آمَنُوا يُقاتِلُونَ في&amp;rlm; سَبيلِ اللَّهِ وَ الَّذينَ كَفَرُوا يُقاتِلُونَ في&amp;rlm; سَبيلِ الطَّاغُوتِ فَقاتِلُوا أَوْلِياءَ الشَّيْطانِ إِنَّ كَيْدَ الشَّيْطانِ كانَ ضَعيفاً (نساء۷۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آنان كه ايمان آورده&amp;rlm;اند، در راه خدا مى&amp;rlm;جنگند، و آنان كه كافر شده&amp;rlm;اند در راه شيطان. پس با هواداران شيطان قتال كنيد كه مكر شيطان ناچيز است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. وَدُّوا لَوْ تَكْفُرُونَ كَما كَفَرُوا فَتَكُونُونَ سَواءً فَلا تَتَّخِذُوا مِنْهُمْ أَوْلِياءَ حَتَّى يُهاجِرُوا في&amp;rlm; سَبيلِ اللَّهِ فَإِنْتَوَلَّوْا فَخُذُوهُمْ وَ اقْتُلُوهُمْ حَيْثُ وَجَدْتُمُوهُمْ وَ لا تَتَّخِذُوا مِنْهُمْ وَلِيًّا وَ لا نَصيراً (نساء ۸۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;دوست دارند هم چنان كه خود به راه كفر مى&amp;rlm;روند شما نيز كافر شويد تا برابر گرديد. پس با هيچ يك از آنان دوستى مكنيد تا آن گاه كه در راه خدا مهاجرت كنند. و اگر سرباز زدند در هر جا كه آنها را بيابيد بگيريد و بكشيد و هيچ يك از آنها را به دوستى و يارى برمگزينيد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵. وَ لَأُضِلَّنَّهُمْ وَ لَأُمَنِّيَنَّهُمْ وَ لَآمُرَنَّهُمْ فَلَيُبَتِّكُنَّ آذانَ الْأَنْعامِ وَ لَآمُرَنَّهُمْ فَلَيُغَيِّرُنَّ خَلْقَ اللَّهِ وَ مَنْ يَتَّخِذِ الشَّيْطانَ وَلِيًّا مِنْ دُونِ اللَّهِ فَقَدْ خَسِرَ خُسْراناً مُبيناً (نساء ۱۱۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و البته گمراهشان مى&amp;rlm;كنم و آرزوهاى باطل در دلشان مى&amp;rlm;افكنم و به آنان فرمان مى&amp;rlm;دهم تا گوشهاى چارپايان را بشكافند. و به آنان فرمان مى&amp;rlm;دهم تا خلقت خدا را دگرگون سازند. و هر كس كه به جاى خدا شيطان را به دوستى برگزيند زيانى آشكار كرده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶. الَّذينَ يَتَّخِذُونَ الْكافِرينَ أَوْلِياءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنينَ أَ يَبْتَغُونَ عِنْدَهُمُ الْعِزَّةَ فَإِنَّ الْعِزَّةَ لِلَّهِ جَميعاً (نساء ۱۳۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;كسانى كه به جاى مؤمنان كافران را به دوستى برمى&amp;rlm;گزينند، آيا عزت و توانايى را نزد آنان مى&amp;rlm;جويند، در حالى كه عزت به تمامى از آن خداست؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا الْكافِرينَ أَوْلِياءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنينَ أَ تُريدُونَ أَنْ تَجْعَلُوا لِلَّهِ عَلَيْكُمْ سُلْطاناً مُبيناً (نساء ۱۴۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;ايد، به جاى مؤمنان كافران را به دوستى مگيريد. آيا كارى مى&amp;rlm;كنيد كه براى خدا به زيان خود حجتى آشكار پديد آريد؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷. يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَ النَّصارى&amp;rlm; أَوْلِياءَ بَعْضُهُمْأَوْلِياءُ بَعْضٍ وَ مَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ إِنَّ اللَّهَ لا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمينَ (مائده ۵۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;ايد، يهود و نصارا را بهدوستى برمگزينيد. آنان خود دوستان يكديگرند. هر كس از شما كه ايشان را به دوستى گزيند در زمره آنهاست. و خدا ستمكاران را هدايت نمى كند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۸. يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا الَّذينَ اتَّخَذُوا دينَكُمْ هُزُواً وَ لَعِباً مِنَ الَّذينَ أُوتُوا الْكِتابَ مِنْ قَبْلِكُمْ وَ الْكُفَّارَ أَوْلِياءَوَ اتَّقُوا اللَّهَ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنينَ (مائده ۵۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;ايد، اهل كتاب را كه دين شما را به مسخره و بازى مى&amp;rlm;گيرند، و نيز كافران را به دوستى برمگزينيد. و اگر ايمان آورده&amp;rlm;ايد از خدا بترسيد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۹. تَرى&amp;rlm; كَثيراً مِنْهُمْيَتَوَلَّوْنَ الَّذينَ كَفَرُوا لَبِئْسَ ما قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنْفُسُهُمْ أَنْ سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَ فِي الْعَذابِ هُمْ خالِدُونَ (مائده ۸۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بسيارى از ايشان را مى&amp;rlm;بينى كه با كافراندوستى مى&amp;rlm;ورزند. بد است آنچه پيشاپيش براى خود فرستادند. خشم خدا بر آنهاست و در عذاب جاودانه&amp;rlm;اند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۰. وَ لَوْ كانُوا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَ النَّبِيِّ وَ ما أُنْزِلَ إِلَيْهِ مَا اتَّخَذُوهُمْ أَوْلِياءَوَ لكِنَّ كَثيراً مِنْهُمْ فاسِقُونَ (مائده ۸۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اگر به خدا و پيامبر و آنچه بر او نازل شده ايمان آورده بودند كافران را به دوستى نمى&amp;rlm;گرفتند، ولى بيشترشان فاسقانند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۱. وَ لا تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ وَ إِنَّهُ لَفِسْقٌ وَ إِنَّ الشَّياطينَ لَيُوحُونَ إِلى&amp;rlm; أَوْلِيائِهِمْ لِيُجادِلُوكُمْ وَ إِنْ أَطَعْتُمُوهُمْ إِنَّكُمْ لَمُشْرِكُونَ (انعام۱۲۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;از ذبحى كه نام خدا بر آن ياد نشده است مخوريد كه خود نافرمانى است. و شياطين به دوستان خود القا مى&amp;rlm;كنند كه با شما مجادله كنند اگر از ايشان پيروى كنيد از مشركانيد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۲. وَ يَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَميعاً يا مَعْشَرَ الْجِنِّ قَدِ اسْتَكْثَرْتُمْ مِنَ الْإِنْسِ وَ قالَ أَوْلِياؤُهُمْ مِنَ الْإِنْسِ رَبَّنَا اسْتَمْتَعَ بَعْضُنا بِبَعْضٍ وَ بَلَغْنا أَجَلَنَا الَّذي أَجَّلْتَ لَنا قالَ النَّارُ مَثْواكُمْ خالِدينَ فيها إِلاَّ ما شاءَ اللَّهُ إِنَّ رَبَّكَ حَكيمٌ عَليمٌ (انعام۱۲۸)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و روزى كه همگان را گرد آورد و گويد: اى گروه جنيان، شما بسيارى از آدميان را پيرو خويش ساختيد. يارانشان از ميان آدميان گويند: اى پروردگار ما، ما از يكديگر بهره&amp;rlm;مند مى&amp;rlm;شديم و به پايان زمانى كه براى زيستن ما قرار داده بودى رسيديم. گويد: جايگاه شما آتش است، جاودانه در آنجا خواهيد بود، مگر آنچه خدا بخواهد. هرآينه پروردگار تو حكيم و داناست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۳. اتَّبِعُوا ما أُنْزِلَ إِلَيْكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ وَ لا تَتَّبِعُوا مِنْ دُونِهِ أَوْلِياءَ قَليلاً ما تَذَكَّرُونَ (اعراف۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;از آنچه از جانب پروردگارتان برايتان نازل شده است پيروى كنيد و سواى او، از خدايان ديگر متابعت مكنيد. شما چه اندك پند مى&amp;rlm;پذيريد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۴. يا بَني&amp;rlm; آدَمَ لا يَفْتِنَنَّكُمُ الشَّيْطانُ كَما أَخْرَجَ أَبَوَيْكُمْ مِنَ الْجَنَّةِ يَنْزِعُ عَنْهُما لِباسَهُما لِيُرِيَهُما سَوْآتِهِما إِنَّهُ يَراكُمْ هُوَ وَ قَبيلُهُ مِنْ حَيْثُ لا تَرَوْنَهُمْ إِنَّا جَعَلْنَا الشَّياطينَ أَوْلِياءَ لِلَّذينَ لا يُؤْمِنُونَ (اعراف۲۷)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى فرزندان آدم، شيطان شما را نفريبد، هم چنان كه پدر و مادرتان را از بهشت بيرون راند، لباس از تنشان كند تا شرمگاهشان را به ايشان بنماياند. او و قبيله&amp;rlm;اش از جايى كه آنها را نمى&amp;rlm;بينيد شما را مى&amp;rlm;بينند. ما شيطانها را دوستان كسانى قرار داديم كه ايمان نمى&amp;rlm;آورند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۵. فَريقاً هَدى&amp;rlm; وَ فَريقاً حَقَّ عَلَيْهِمُ الضَّلالَةُ إِنَّهُمُ اتَّخَذُوا الشَّياطينَ أَوْلِياءَ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَ يَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ مُهْتَدُونَ (اعراف۳۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;فرقه&amp;rlm;اى را هدايت كرده و فرقه&amp;rlm;اى گمراهى را در خورند. اينان شيطانها را به جاى خدا به دوستى گرفتند و مى&amp;rlm;پندارند كه هدايت&amp;rlm;يافته&amp;rlm;اند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۶. وَ الَّذينَ كَفَرُوا بَعْضُهُمْ أَوْلِياءُ بَعْضٍ إِلاَّ تَفْعَلُوهُ تَكُنْ فِتْنَةٌ فِي الْأَرْضِ وَ فَسادٌ كَبيرٌ (انفال۷۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;كافران نيز خويشاوندان يكديگرند. اگر مراعات آن نكنيد فتنه و فسادى بزرگ در اين سرزمين پديد خواهد آمد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۷. يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا آباءَكُمْ وَ إِخْوانَكُمْ أَوْلِياءَ إِنِ اسْتَحَبُّوا الْكُفْرَ عَلَى الْإيمانِ وَ مَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَأُولئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ (توبه۲۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;ايد، اگر پدران و برادرانتان دوست دارند كه كفر را به جاى ايمان برگزينند، آنها را به دوستى مگيريد و هر كس از شما دوستشان بدارد از ستمكاران خواهد بود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۸. تَاللَّهِ لَقَدْ أَرْسَلْنا إِلى&amp;rlm; أُمَمٍ مِنْ قَبْلِكَ فَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطانُ أَعْمالَهُمْ فَهُوَ وَلِيُّهُمُ الْيَوْمَ وَ لَهُمْ عَذابٌ أَليمٌ (نمل۶۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;به خدا سوگند كه براى مردمى هم كه پيش از تو بوده&amp;rlm;اند پيامبرانى فرستاده&amp;rlm;ايم. ولى شيطان اعمالشان را در چشمشان بياراست. و در آن روز شيطان دوستشان خواهد بود و آنها راست عذابى دردآور.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۹. إِنَّما سُلْطانُهُ عَلَى الَّذينَ يَتَوَلَّوْنَهُ وَ الَّذينَ هُمْ بِهِ مُشْرِكُونَ (نمل۱۰۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;تسلط او تنها بر كسانى است كه دوستش مى&amp;rlm;دارند و به خدا شرك مى&amp;rlm;آورند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۰. وَ إِذْ قُلْنا لِلْمَلائِكَةِ اسْجُدُوا لِآدَمَ فَسَجَدُوا إِلاَّ إِبْليسَ كانَ مِنَ الْجِنِّ فَفَسَقَ عَنْ أَمْرِ رَبِّهِ أَ فَتَتَّخِذُونَهُ وَ ذُرِّيَّتَهُ أَوْلِياءَ مِنْ دُوني&amp;rlm; وَ هُمْ لَكُمْ عَدُوٌّ بِئْسَ لِلظَّالِمينَ بَدَلاً (کهف۵۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و آن گاه كه به فرشتگان گفتيم كه آدم را سجده كنيد، همه جز ابليس كه از جن بود و از فرمان پروردگارش سر بتافت سجده كردند. آيا شيطان و فرزندانش را به جاى من به دوستى مى&amp;rlm;گيريد، حال آنكه دشمن شمايند؟ ظالمان بد چيزى را به جاى خدا برگزيدند. (۵۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۱. أَ فَحَسِبَ الَّذينَ كَفَرُوا أَنْ يَتَّخِذُوا عِبادي مِنْ دُوني&amp;rlm; أَوْلِياءَ إِنَّا أَعْتَدْنا جَهَنَّمَ لِلْكافِرينَ نُزُلاً (کهف۱۰۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آيا كافران پندارند كه به جاى من، بندگان مرا به خدايى گيرند؟ ما جهنم را آماده ساخته&amp;rlm;ايم تا منزلگاه كافران باشد. (۱۰۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۲. يا أَبَتِ إِنِّي أَخافُ أَنْ يَمَسَّكَ عَذابٌ مِنَ الرَّحْمنِ فَتَكُونَ لِلشَّيْطانِ وَلِيًّا (مریم۴۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى پدر، مى&amp;rlm;ترسم عذابى از جانب خداى رحمان به تو رسد و تو دوستدار شيطان باشى.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۳. كُتِبَ عَلَيْهِ أَنَّهُ مَنْ تَوَلاَّهُ فَأَنَّهُ يُضِلُّهُ وَ يَهْديهِ إِلى&amp;rlm; عَذابِ السَّعيرِ (حج۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بر شيطان چنين مقرر شده كه هر كس را كه دوستش بدارد گمراه كند و به عذاب آتش سوزانش كشاند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۴. يَدْعُوا لَمَنْ ضَرُّهُ أَقْرَبُ مِنْ نَفْعِهِ لَبِئْسَ الْمَوْلى&amp;rlm; وَ لَبِئْسَ الْعَشيرُ (حج۱۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;كسى را مى&amp;rlm;خواند كه زيانش نزديك&amp;rlm;تر از سود اوست. چه بد دوستدارى است و چه بد مصاحبى است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۵. أَلا لِلَّهِ الدِّينُ الْخالِصُ وَ الَّذينَ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِهِ أَوْلِياءَ ما نَعْبُدُهُمْ إِلاَّ لِيُقَرِّبُونا إِلَى اللَّهِ زُلْفى&amp;rlm; إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ في&amp;rlm; ما هُمْ فيهِ يَخْتَلِفُونَ إِنَّ اللَّهَ لا يَهْدي مَنْ هُوَ كاذِبٌ كَفَّارٌ (زمر۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آگاه باش كه دين خالص از آن خداست و آنان كه سواى او ديگرى را به خدايى گرفتند، گفتند: اينان را از آن رو مى&amp;rlm;پرستيم تا وسيله نزديكى ما به خداى يكتا شوند. و خدا در آنچه اختلاف مى&amp;rlm;كنند ميانشان حكم خواهد كرد. خدا آن را كه دروغگو و ناسپاس باشد هدايت نمى&amp;rlm;كند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۶. يَوْمَ لا يُغْني&amp;rlm; مَوْلًى عَنْ مَوْلًى شَيْئاً وَ لا هُمْ يُنْصَرُونَ (دخان۴۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;روزى كه هيچ دوستى براى دوست خود سودمند نباشد و از سوى كسى يارى نشوند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۷. مِنْ وَرائِهِمْ جَهَنَّمُ وَ لا يُغْني&amp;rlm; عَنْهُمْ ما كَسَبُوا شَيْئاً وَ لا مَا اتَّخَذُوا مِنْ دُونِ اللَّهِ أَوْلِياءَ وَ لَهُمْ عَذابٌ عَظيمٌ (جاثیه۱۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;پيش رويشان جهنم است. و مالى كه به دست آورده&amp;rlm;اند و كسانى كه سواى خداى يكتا به خدايى گرفته&amp;rlm;اند به حالشان سود نكند. ايشان راست عذابى بزرگ. (۱۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۸. إِنَّهُمْ لَنْ يُغْنُوا عَنْكَ مِنَ اللَّهِ شَيْئاً وَ إِنَّ الظَّالِمينَ بَعْضُهُمْ أَوْلِياءُ بَعْضٍ وَ اللَّهُ وَلِيُّ الْمُتَّقينَ (جاثیه۱۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اينان تو را هيچ از خدا بى&amp;rlm;نياز نمى&amp;rlm;كنند و ظالمان دوستداران يكديگرند، و خدا دوستدار پرهيزگاران است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۹. أَ لَمْ تَرَ إِلَى الَّذينَ تَوَلَّوْاقَوْماً غَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ ما هُمْ مِنْكُمْ وَ لا مِنْهُمْ وَ يَحْلِفُونَ عَلَى الْكَذِبِ وَ هُمْ يَعْلَمُونَ (مجادله۱۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آيا نديده&amp;rlm;اى آن كسان را كه با مردمى كه خدا بر آنها خشم گرفته بود، دوستى ورزيدند؟ اينان نه از شمايند و نه از ايشان. و خود مى&amp;rlm;دانند كه بر دروغ سوگند مى&amp;rlm;خوردند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۰. يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا عَدُوِّي وَ عَدُوَّكُمْ أَوْلِياءَ تُلْقُونَ إِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَ قَدْ كَفَرُوا بِما جاءَكُمْ مِنَ الْحَقِّ يُخْرِجُونَ الرَّسُولَ وَ إِيَّاكُمْ أَنْ تُؤْمِنُوا بِاللَّهِ رَبِّكُمْ إِنْ كُنْتُمْ خَرَجْتُمْ جِهاداً في&amp;rlm; سَبيلي&amp;rlm; وَ ابْتِغاءَ مَرْضاتي&amp;rlm; تُسِرُّونَ إِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَ أَنَا أَعْلَمُ بِما أَخْفَيْتُمْ وَ ما أَعْلَنْتُمْ وَ مَنْ يَفْعَلْهُ مِنْكُمْ فَقَدْ ضَلَّ سَواءَ السَّبيلِ (ممتحنه۱)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;ايد، دشمن من و دشمن خود را به دوستى اختيار مكنيد. شما با آنان طرح دوستى مى&amp;rlm;افكنيد و حال آنكه ايشان به سخن حقى كه بر شما آمده است ايمان ندارند. و بدان سبب كه به خدا، پروردگار خويش ايمان آورده بوديد، پيامبر و شما را بيرون راندند. اگر براى جهاد در راه من و طلب رضاى من بيرون آمده&amp;rlm;ايد، در نهان با آنها دوستى مكنيد و من به هر چه پنهان مى&amp;rlm;داريد يا آشكار مى&amp;rlm;سازيد آگاهترم. و هر كه چنين كند، از راه راست منحرف گشته است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۱. إِنَّما يَنْهاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذينَ قاتَلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَ أَخْرَجُوكُمْ مِنْ دِيارِكُمْ وَ ظاهَرُوا عَلى&amp;rlm; إِخْراجِكُمْ أَنْ تَوَلَّوْهُمْوَ مَنْ يَتَوَلَّهُمْ فَأُولئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ (ممتحنه۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;جز اين نيست كه خدا از دوستى&amp;rlm;ورزيدن با كسانى كه با شما در دين جنگيده&amp;rlm;اند و از سرزمين خود بيرونتان رانده&amp;rlm;اند يا دربيرون&amp;rlm;راندنتان همدستى كرده&amp;rlm;اند شما را باز دارد. و هر كه با آنها دوستى ورزد از ستمكاران خواهد بود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۲. يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنُوا لا تَتَوَلَّوْا قَوْماً غَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ قَدْ يَئِسُوا مِنَ الْآخِرَةِ كَما يَئِسَ الْكُفَّارُ مِنْ أَصْحابِ الْقُبُورِ (ممتحنه۱۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;ايد، با مردمى كه خدا بر آنها خشم گرفته است دوستى مكنيد. اينان از آخرت نوميدند، هم چنان كه آن كافرانى كه اينك در گورند از آخرت نوميدند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۳. قُلْ يا أَيُّهَا الَّذينَ هادُوا إِنْ زَعَمْتُمْ أَنَّكُمْ أَوْلِياءُ لِلَّهِ مِنْ دُونِ النَّاسِ فَتَمَنَّوُا الْمَوْتَ إِنْ كُنْتُمْ صادِقينَ (جمعه۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;بگو: اى قوم يهود، هر گاه مى&amp;rlm;پنداريد كه شما دوستان خدا هستيد، نه مردم ديگر، پس تمناى مرگ كنيد اگر راست مى&amp;rlm;گوييد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;با توجه به آیات فوق در قسمت &amp;quot;ب&amp;quot; کاملأ آشکار است که هدف این آیات این است که فقط خداوند را به عنوان دوست و یار و یاور وحامی خود بدانند و از او طلب کمک و یاری بکنند و از طرف دیگر مراد این آیات ایجاد الفت و محبت و دوستی و یاری و مساعدت میان مومنین بوده که در راس آن پدر معنوی مومنین حضرت رسول گرامی است و دوری از دوستی و یاری با غیر مومنین می&amp;zwnj;باشد و این که خداوند به عنوان محور اصلی این دوستی است. خلاصه این که دوستی با دوستان خدا و عدم دوستی (نه لزومأ دشمنی) با خدا ناباوران مانند کافران و مشرکان و معتقدان به سایر ادیان در صورتی که باورهای آنان را به تمسخر بگیرند (مورد ۷ و ۸ یعنی آیات ۵۱ و ۵۷ مائده ) و البته دشمنی با دشمنان خدا مانند دشمنی با شیطان و ظالمان و..&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;● ج: آیاتی که از بعض دیگر مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; استفاده شده و مراد آن سزاواری و شایستگی است.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;یکی از مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; &amp;quot;أَوْلى&amp;rlm;&amp;quot; است و به مفهوم شایسته تر و سزاوارتر است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آیاتی که مراد از &amp;quot;ولی&amp;quot; سزاواری و شایستگی است:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامينَ بِالْقِسْطِ شُهَداءَ لِلَّهِ وَ لَوْ عَلى&amp;rlm; أَنْفُسِكُمْ أَوِ الْوالِدَيْنِ وَ الْأَقْرَبينَ إِنْ يَكُنْ غَنِيًّا أَوْ فَقيراً فَاللَّهُ أَوْلى&amp;rlm; بِهِما فَلا تَتَّبِعُوا الْهَوى&amp;rlm; أَنْ تَعْدِلُوا وَ إِنْ تَلْوُوا أَوْ تُعْرِضُوا فَإِنَّ اللَّهَ كانَ بِما تَعْمَلُونَ خَبيراً (نساء ۱۳۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;ايد، به عدالت فرمانروا باشيد و براى خدا شهادت دهيد، هر چند به زيان خود يا پدر و مادر يا خويشاوندان شما- چه توانگر و چه درويش- بوده باشد. زيرا خدا به آن دو سزاوارتر است. پس، از هوا نفس پيروى مكنيد تا از شهادت حق عدول كنيد. چه زبان&amp;rlm;بازى كنيد يا از آن اعراض كنيد، خدا به هر چه مى&amp;rlm;كنيد آگاه است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. وَ الَّذينَ آمَنُوا مِنْ بَعْدُ وَ هاجَرُوا وَ جاهَدُوا مَعَكُمْ فَأُولئِكَ مِنْكُمْ وَ أُولُوا الْأَرْحامِ بَعْضُهُمْ أَوْلى&amp;rlm; بِبَعْضٍ في&amp;rlm; كِتابِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْ&amp;rlm;ءٍ عَليمٌ (انفال۷۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و كسانى كه بعداً ايمان آورده&amp;rlm;اند و مهاجرت كرده&amp;rlm;اند و همراه شما جهاد كرده&amp;rlm;اند، از شما هستند. به حكم كتاب خدا، خويشاوندان به يكديگر سزاوارترند. و خدا بر هر چيزى داناست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. ثُمَّ لَنَحْنُ أَعْلَمُ بِالَّذينَ هُمْ أَوْلى&amp;rlm; بِها صِلِيًّا (۷۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و ما آنهايى را كه سزاوارتر به داخل شدن در آتش و سوختن در آن باشند، بهتر مى&amp;rlm;شناسيم. (مریم۷۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. النَّبِيُّ أَوْلى&amp;rlm; بِالْمُؤْمِنينَ مِنْ أَنْفُسِهِمْ وَ أَزْواجُهُ أُمَّهاتُهُمْ وَ أُولُوا الْأَرْحامِ بَعْضُهُمْ أَوْلى&amp;rlm; بِبَعْضٍ في&amp;rlm; كِتابِ اللَّهِ مِنَ الْمُؤْمِنينَ وَ الْمُهاجِرينَ إِلاَّ أَنْ تَفْعَلُوا إِلى&amp;rlm; أَوْلِيائِكُمْ مَعْرُوفاً كانَ ذلِكَ فِي الْكِتابِ مَسْطُوراً (احزاب۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;پيامبر به مؤمنان از خودشان سزاتر است و زنانش مادران مؤمنان هستند و در كتاب خدا خويشاوندان نسبى از مؤمنان و مهاجران به يكديگر سزاوارترند، مگر آنكه بخواهيد به يكى از دوستان خود نيكى كنيد. و اين حكم در كتاب خدا مكتوب است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵. وَ يَقُولُ الَّذينَ آمَنُوا لَوْ لا نُزِّلَتْ سُورَةٌ فَإِذا أُنْزِلَتْ سُورَةٌ مُحْكَمَةٌ وَ ذُكِرَ فيهَا الْقِتالُ رَأَيْتَ الَّذينَ في&amp;rlm; قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ يَنْظُرُونَ إِلَيْكَ نَظَرَ الْمَغْشِيِّ عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِ فَأَوْلى&amp;rlm; لَهُمْ (محمد۲۰)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;اند مى&amp;rlm;گويند: چرا از جانب خدا سوره&amp;rlm;اى نازل نمى&amp;rlm;شود؟ چون سوره&amp;rlm;اى از محكمات نازل شود كه در آن سخن از جنگ رفته باشد، آنان را كه در دلشان مرضى هست بينى كه چون كسى كه بيهوشى مرگ بر او چيره شده به تو مى&amp;rlm;نگرند. پس برايشان شايسته&amp;rlm;تر&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶. فَالْيَوْمَ لا يُؤْخَذُ مِنْكُمْ فِدْيَةٌ وَ لا مِنَ الَّذينَ كَفَرُوا مَأْواكُمُ النَّارُ هِيَ مَوْلاكُمْ وَ بِئْسَ الْمَصيرُ (حدید۱۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و امروز نه از شما فديه&amp;rlm;اى پذيرند و نه از كافران. جايگاهتان آتش است. آتش سزاوار شماست. و بد سرانجامى است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;این آیات اولویت چیزی بر چیز دیگر را بیان می&amp;zwnj;کند مثل اولویت خویش0اوند بر غیر خویشاوند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اما آیه مورد ۴ (احزاب ۶) یکی از موارد دیگری است که درباره اولویت رسول گرامی بر نفوس مومنین می&amp;zwnj;باشد و از این آیه هم شیعیان تسلط پیامبر بر جان مومنین را نتیجه گرفته&amp;zwnj;اند و به طبع آن تسلط ائمه شیعه بر مال و جان مسلمین و از دیدگاه باورمندان به ولایت فقیه تسلط بی قید و شرط ولی فقیه بر جان و مال و ناموس (!) مسلمین را نتیجه گرفته&amp;zwnj;اند، لذا لازم است پیرامون این آیه نیز کنکاش بیشتری صورت گیرد که در ادامه مقاله خواهد آمد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;● د: آیاتی که از بعض دیگر مشتقات &amp;quot;ولی&amp;quot; استفاده شده و مراد آن سرپرستی کردن، میراث بردن و خونخواهی است&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آیاتی که خویشاوندان، سرپرست یتیمان و سفیان، میراث بران و نیز اولیای دم را &amp;quot;ولی&amp;quot; معرفی می&amp;zwnj;کند:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنُوا إِذا تَدايَنْتُمْ بِدَيْنٍ إِلى&amp;rlm; أَجَلٍ مُسَمًّى فَاكْتُبُوهُ وَ لْيَكْتُبْ بَيْنَكُمْ كاتِبٌ بِالْعَدْلِ وَ لا يَأْبَ كاتِبٌ أَنْ يَكْتُبَ كَما عَلَّمَهُ اللَّهُ فَلْيَكْتُبْ وَ لْيُمْلِلِ الَّذي عَلَيْهِ الْحَقُّ وَ لْيَتَّقِ اللَّهَ رَبَّهُ وَ لا يَبْخَسْ مِنْهُ شَيْئاً فَإِنْ كانَ الَّذي عَلَيْهِ الْحَقُّ سَفيهاً أَوْ ضَعيفاً أَوْ لا يَسْتَطيعُ أَنْ يُمِلَّ هُوَ فَلْيُمْلِلْ وَلِيُّهُ بِالْعَدْلِ وَ اسْتَشْهِدُوا شَهيدَيْنِ مِنْ رِجالِكُمْ فَإِنْ لَمْ يَكُونا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌ وَ امْرَأَتانِ مِمَّنْ تَرْضَوْنَ مِنَ الشُّهَداءِ أَنْ تَضِلَّ إِحْداهُما فَتُذَكِّرَ إِحْداهُمَا الْأُخْرى&amp;rlm; وَ لا يَأْبَ الشُّهَداءُ إِذا ما دُعُوا وَ لا تَسْئَمُوا أَنْ تَكْتُبُوهُ صَغيراً أَوْ كَبيراً إِلى&amp;rlm; أَجَلِهِ ذلِكُمْ أَقْسَطُ عِنْدَ اللَّهِ وَ أَقْوَمُ لِلشَّهادَةِ وَ أَدْنى&amp;rlm; أَلاَّ تَرْتابُوا إِلاَّ أَنْ تَكُونَ تِجارَةً حاضِرَةً تُديرُونَها بَيْنَكُمْ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُناحٌ أَلاَّ تَكْتُبُوها وَ أَشْهِدُوا إِذا تَبايَعْتُمْ وَ لا يُضَارَّ كاتِبٌ وَ لا شَهيدٌ وَ إِنْ تَفْعَلُوا فَإِنَّهُ فُسُوقٌ بِكُمْ وَ اتَّقُوا اللَّهَ وَ يُعَلِّمُكُمُ اللَّهُ وَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْ&amp;rlm;ءٍ عَليمٌ (بقره ۲۸۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;اى كسانى كه ايمان آورده&amp;rlm;ايد، چون وامى تا مدتى معيّن به يكديگر دهيد، آن را بنويسيد. و بايد در بين شما كاتبى باشد كه آن را به درستى بنويسد. و كاتب نبايد كه در نوشتن از آنچه خدا به او آموخته است سرپيچى كند. و مديون بايد كه بر كاتب املاء كند و از اللَّه، پروردگار خود بترسد و از آن هيچ نكاهد. اگر مديون سفيه يا صغير بود يا خود املاء كردن نمى&amp;rlm;توانست، ولىّ او از روى عدالت املاء كند. و دو شاهد مرد به شهادت گيريد. اگر دو مرد نبود، يك مرد و دو زن كه به آنها رضايت دهيد شهادت بدهند، تا اگر يكى فراموش كرد ديگرى به يادش بياورد. و شاهدان چون به شهادت دعوت شوند، نبايد كه از شهادت خوددارى كنند. و از نوشتن مدّت دين خود، چه كوچك و چه بزرگ، ملول مشويد. اين روش در نزد خدا عادلانه&amp;rlm;تر است، و شهادت را استواردارنده&amp;rlm;تر و شك و ترديد را زايل&amp;rlm;كننده&amp;rlm;تر. و هر گاه معامله نقدى باشد اگر براى آن سندى ننويسيد مرتكب گناهى نشده&amp;rlm;ايد. و چون معامله&amp;rlm;اى كنيد، شاهدى گيريد. و نبايد به كاتب و شاهد زيانى برسد، كه اگر چنين كنيد نافرمانى كرده&amp;rlm;ايد. از خداى بترسيد. خدا شما را تعليم مى دهد و او بر هر چيزى آگاه است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. وَ لِكُلٍّ جَعَلْنامَوالِيَ مِمَّا تَرَكَ الْوالِدانِ وَ الْأَقْرَبُونَ وَ الَّذينَ عَقَدَتْ أَيْمانُكُمْ فَآتُوهُمْ نَصيبَهُمْ إِنَّ اللَّهَ كانَ عَلى&amp;rlm; كُلِّ شَيْ&amp;rlm;ءٍ شَهيداً (نساء ۳۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;براى همه، در آنچه پدر و مادر وخويشاوندان نزديك به ميراث مى&amp;rlm;گذارند، ميراث&amp;rlm;برانى قرار داده&amp;rlm;ايم. و بهره هر كس را كه با او قرارى نهاده&amp;rlm;ايد بپردازيد كه خدا بر هر چيزى گواه است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. وَ ما لَهُمْ أَلاَّ يُعَذِّبَهُمُ اللَّهُ وَ هُمْ يَصُدُّونَ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرامِ وَ ما كانُوا أَوْلِياءَهُ إِنْأَوْلِياؤُهُإِلاَّ الْمُتَّقُونَ وَ لكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لا يَعْلَمُونَ (انفال۳۴)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;چرا خدا عذابشان نكند، حال آنكه مردم را از مسجد الحرام باز مى&amp;rlm;دارند و صاحبانآن نيستند؟ صاحبان آن تنها پرهيزگارانند ولى بيشترينشان نمى&amp;rlm;دانند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. إِنَّ الَّذينَ آمَنُوا وَ هاجَرُوا وَ جاهَدُوا بِأَمْوالِهِمْ وَ أَنْفُسِهِمْ في&amp;rlm; سَبيلِ اللَّهِ وَ الَّذينَ آوَوْا وَ نَصَرُوا أُولئِكَ بَعْضُهُمْ أَوْلِياءُ بَعْضٍ وَ الَّذينَ آمَنُوا وَ لَمْ يُهاجِرُوا ما لَكُمْ مِنْ وَلايَتِهِمْ مِنْ شَيْ&amp;rlm;ءٍ حَتَّى يُهاجِرُوا وَ إِنِ اسْتَنْصَرُوكُمْ فِي الدِّينِ فَعَلَيْكُمُ النَّصْرُ إِلاَّ عَلى&amp;rlm; قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَ بَيْنَهُمْ ميثاقٌ وَ اللَّهُ بِما تَعْمَلُونَ بَصيرٌ (انفال۷۲)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;آنان كه ايمان آورده&amp;rlm;اند و مهاجرت كرده&amp;rlm;اند و با مال و جان خويش در راه خدا جهاد كرده&amp;rlm;اند و آنان كه به مهاجران جاى داده و ياريشان كرده&amp;rlm;اند، خويشاوندان يكديگرند. و آنان كه ايمان آورده&amp;rlm;اند و مهاجرت نكرده&amp;rlm;اند خويشاوندان شما نيستند تا آن گاه كه مهاجرت كنند. ولى اگر شما را به يارىطلبيدند بايد به ياريشان برخيزيد مگر آنكه بر ضد آن گروهى باشد كه ميان شما و ايشان پيمانى بسته شده باشد. و خدا به كارهايى كه مى&amp;rlm;كنيد بيناست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵. وَ ضَرَبَ اللَّهُ مَثَلاً رَجُلَيْنِ أَحَدُهُما أَبْكَمُ لا يَقْدِرُ عَلى&amp;rlm; شَيْ&amp;rlm;ءٍ وَ هُوَ كَلٌّ عَلى&amp;rlm; مَوْلاهُ أَيْنَما يُوَجِّهْهُ لا يَأْتِ بِخَيْرٍ هَلْ يَسْتَوي هُوَ وَ مَنْ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَ هُوَ عَلى&amp;rlm; صِراطٍ مُسْتَقيمٍ (نمل۷۶)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;و خدا مثَل دو مرد را بيان مى&amp;rlm;كند كه يكى لال است و توان هيچ چيز ندارد و بار دوش مولاى خود است، هر جا كه او را بفرستد هيچ فايده&amp;rlm;اى حاصل نمى&amp;rlm;كند. آيا اين مرد با آن كس كه مردم را به عدل فرمان مى&amp;rlm;دهد و خود بر راه راست مى&amp;rlm;رود برابر است؟&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶. وَ لا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتي&amp;rlm; حَرَّمَ اللَّهُ إِلاَّ بِالْحَقِّ وَ مَنْ قُتِلَ مَظْلُوماً فَقَدْ جَعَلْنا لِوَلِيِّهِ سُلْطاناً فَلا يُسْرِفْ فِي الْقَتْلِ إِنَّهُ كانَ مَنْصُوراً (اسراء۳۳)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;كسى را كه خدا كشتنش را حرام كرده است مكشيد مگر به حق. و هر كس كه به ستم كشته شود، به طلب&amp;rlm;كننده خون او قدرتى داده&amp;rlm;ايم. ولى در انتقام از حد نگذرد، كه او پيروزمند است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷. وَ إِنِّي خِفْتُ الْمَوالِيَ مِنْ وَرائي&amp;rlm; وَ كانَتِ امْرَأَتي&amp;rlm; عاقِراً فَهَبْ لي&amp;rlm; مِنْ لَدُنْكَ وَلِيًّا (مریم۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;من پس از مرگ خويش، از خويشاوندانم بيمناكم و زنم نازاينده است. مرا از جانب خود فرزندى عطا كن،&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۸. قالُوا تَقاسَمُوا بِاللَّهِ لَنُبَيِّتَنَّهُ وَ أَهْلَهُ ثُمَّ لَنَقُولَنَّلِوَلِيِّهِ ما شَهِدْنا مَهْلِكَ أَهْلِهِ وَ إِنَّا لَصادِقُونَ (نمل۴۹)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;گفتند: به خدا سوگند خوريد كه بر او و كسانش شبيخون زنيم. و چون كسى به طلب خونش برخيزد، بگوييم: ما به هنگام هلاكت كسان او آنجا نبوده&amp;rlm;ايم، و ما راست گفتاريم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;۹. ادْعُوهُمْ لِآبائِهِمْ هُوَ أَقْسَطُ عِنْدَ اللَّهِ فَإِنْ لَمْ تَعْلَمُوا آباءَهُمْ فَإِخْوانُكُمْ فِي الدِّينِ وَمَواليكُمْ وَ لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُناحٌ فيما أَخْطَأْتُمْ بِهِ وَ لكِنْ ما تَعَمَّدَتْ قُلُوبُكُمْ وَ كانَ اللَّهُ غَفُوراً رَحيماً (احزاب۵)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;پسرخواندگان را به نام پدرشان بخوانيد كه در نزد خدا منصفانه&amp;rlm;تر است. اگر پدرشان را نمى&amp;rlm;شناسيد، برادران دينى و موالى شما باشند. اگر پيش از اين خطايى كرده&amp;rlm;ايد باكى نيست، مگر آنكه به قصد دل كنيد. و خدا آمرزنده و مهربان است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;این گروه از آیات دوستی و یاری را منبعث از رابطه خویشاوندی بیان می&amp;zwnj;کند، در واقع این خویشاوندی است که سبب مودت و دوستی و حمایت میان افراد یک فامیل می&amp;zwnj;شود، خصوصأ در دوران زندگی قبیله&amp;zwnj;ای که قدرت آن بر اساس وحدت میان افراد قبیله که خویشاوندان هم هستند شکل گرفته است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;نتیجه اینکه:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;با آوردن کلیه آیات مربوط به &amp;quot;ولی&amp;quot; و مشتقات آن روشن می&amp;zwnj;شود که هدف این آیات این است که مومنین فقط خداوند را به عنوان دوست و یار و یاور وحامی خود بدانند و از او طلب کمک و یاری بکنند و از طرف دیگر مراد این آیات ایجاد الفت و محبت و دوستی و یاری و مساعدت میان مومنین بوده که در راس آن پدر معنوی مومنین حضرت رسول گرامی است و دوری از دوستی و طلب یاری از غیر مومنین می&amp;zwnj;باشد و این که خداوند به عنوان محور اصلی این دوستی است. &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;خلاصه اینکه دوستی با دوستان خدا و عدم دوستی (نه لزومأ دشمنی) با خدا ناباوران مانند کافران و مشرکان و معتقدان به سایر ادیان در صورتی که باورهای آنان را به تمسخر بگیرند (مورد &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;۷&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; و &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;۸&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; یعنی آیات &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;۵۱&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; و &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;۵۷&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; مائده ) و البته دشمنی با دشمنان خدا مانند دشمنی با شیطان و ظالمان و..&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;در واقع آیات فوق می&amp;zwnj;خواهد یک رابطه وابستگی حقیقی میان مومنینن با خداوند ایجاد کند که جز به او به کسی تکیه نکنند و از طرف دیگر پیوندی عمیق میان مومنین ایجاد نماید تا در سایه آن هم مومنین در امنیت روانی باشند و هم از امنیت اجتماعی برخوردار باشند، این آیات نمی&amp;zwnj;خواهد هیچ کس بر مومنین تسلط یابد حتی رسول گرامی چه برسد به طاغوت و ستمگر به تعبیر دیگر مراد از آیات ولایت ایجاد پیونداجتماعی میان مومنین است در مقابل هر گونه سلطه نه اینکه بند بندگی را از گروهی به گروه دیگر تبدیل کند و این است راز رسالت انبیا، اما متاسفانه متولیان دین قصد انتقال بندگی مومنین به خود را دارند آنهم با تحریف کلام خدا و این انحراف در همه ادیان صورت گرفته و امت اسلام و شیعه نیز از این قاعده مستثنا نیست خصوصأ با این تعریف ظلم گستر و بنده ساز &amp;quot;ولایت فقیه&amp;quot; که انحراف دیگری از انحرافات متولیان دین است.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;ادامه دارد&lt;/p&gt;
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     <comments>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/09/17/19646#comments</comments>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/reflections">انديشه زمانه</category>
 <category domain="https://archive.radiozamaneh.com/taxonomy/term/5194">صالح نظری</category>
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 <pubDate>Mon, 17 Sep 2012 12:54:40 +0000</pubDate>
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    <title>حکومت شیعی در اصول کافی (۲)</title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2011/08/30/6611</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2011/08/30/6611&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-nevisandeh&quot;&gt;
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            &lt;div class=&quot;field-item odd&quot;&gt;
                    صالح نظری        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;صالح نظری &amp;minus; گفته شد، این مقاله در صدد یافتن پاسخ به پرسش&amp;zwnj;های زیر است: &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱. آیا امامان شیعه، حکومت را حق خود می&amp;zwnj;دانستند، هر چند برای آن تلاش نکردند؟&lt;/p&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. آیا امامان شیعه، برای تشکیل حکومت تلاش می&amp;zwnj;کردند؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. اگر امامان شیعه، خود برای تشکیل حکومت تلاش نمی&amp;zwnj;کردند، آیا از مبارزان ضد حکومت&amp;zwnj;های ظالم حمایت می&amp;zwnj;کردند؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. موضع امامان شیعه درباره حکومت اسلامی - شیعی - چیست؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در این مقاله موضع امامان شیعه درباره حکومت اسلامی - شیعی - براساس احادیث کتاب اصول کافی شیخ کلینی - بدون قضاوت درباره درستی یا نادرستی احادیث - مورد بررسی قرار می&amp;zwnj;گیرد. در هر مورد جملاتی از اصول کافی نقل شده و سپس نکته یا نکاتی درباره آن مطرح می&amp;zwnj;گردد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;***&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;یحیى بن عبداللّه بن حسن به موسى بن جعفر علیهما السلام نوشت : اما بعد من خودم را بتقواى خدا سفارش می&amp;zwnj;کنم، و ترا هم به آن سفارش مى کنم زیرا تقوى سفارش خداست نسبت به پیشینیان و پسینیان، یکى از یاوران دین خدا و ناشرین اطاعتش بر من وارد شد و خبر داد که بر من ترحم کرده&amp;zwnj;ای و ما را کمک نخواهى کرد؟ من دعوت بسوى آن کس از آل محمد صلى اللّه علیه و آله را که مردم بپسندند مشورت کردم و تو حاضر نشدى و پیش از تو هم پدرت حاضر نشد، شما از زمان قدیم چیزى را ادعا مى کنید که در خورتان نیست و آرزوى خود را بجائى کشانیده اید که خدا بشما عطا نکرده است، پس هواپرست شدید و گمراه گردید، و من ترا برحذر می&amp;zwnj;دارم از آنچه خدا ترا نسبت بخود برحذر داشته است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;حضرت ابوالحسن موسى بن جعفر علیه السلام به او نوشت: از جانب موسى پسر عبداللّه جعفر و هم پسر على (بن ابی&amp;zwnj;طالب ) که هر دو در بندگى و اطاعت خدا شریکند بسوى یحیى بن عبداللّه بن حسن. اما بعد همانا من ترا و خودم را از خدا بیم مى دهم و تو را از عذاب دردناک و عقاب سخت و کیفر کاملش آگاه مى سازم و تو و خودم را به تقواى خدا سفارش می&amp;zwnj;کنم، زیرا تقوى موجب زینت سخن و پابرجائى نعمتهاست، نامه ات بمن رسید، در آنجا نوشته بودى که من و پدرم از زمان پیش مدعى بوده ایم، در صورتی که تو چنین ادعائى از من نشنیده&amp;zwnj;ای و خدای تعالى در سوره زخرف فرماید: گواهى آنها نوشته شود و مورد بازخواست قرار گیرندحرصی که اهل دنیا بدنیا و خواستنیهاى آن دارند، تمام خواسته هاى آخرت آنها را هم در دنیا تباه کرده است و نوشته بودى که من بواسطه آرزو داشتن آنچه نزد توست مردم را از تو می&amp;zwnj;رانم. در صورتی که اگر راهى را که تو پیش گرفته اى مایل باشم، ناتوانى از دانستن روش و کم بصیرتى بدلیل جلوگیر من نباشد اما خداى تبارک و تعالى مردم را معجونى مرکب آفریده و قوائى شگفت آور غرائزى گوناگون باو عطا کرده است، من دو کلمه درباره انسان از تو مى پرسم. عترف در بدن تو چیست؟ و صهلج در انسان کدامست ؟ جوابش را بمن بنویس، من بتو سفارش می&amp;zwnj;کنم و از نافرمانى خلیفه بر حذرت می&amp;zwnj;دارم، و بفرمانبردارى و اطاعتش تشویقت می&amp;zwnj;کنم و دستور می&amp;zwnj;دهم که براى خود امانى بگیرى پیش از آنکه در چنگال افتى و از هر طرف گلوگیر شوى و از هر سو بخواهى نفس کشى، راهى نیابى، تا خدا باحسان و فضل خود و دلسوزى خلیفه اءبقاه الله بر تو منت نهد و خلیفه امانت دهد و بر تو مهربانى کند و خویشان پیغمبر صلى الله علیه و آله را نسبت بتو حفظ کند، درود بر کسی که از هدایت پیروى کند بما وحى رسیده که عذاب براى کسى است که تکذیب کند و رو بگرداند (۴۷ سوره ۲۰).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;جعفرى مى گوید: به من خبر رسید که نامه موسى بن جعفر علیه السلام بدست هارون افتاد، چون آنرا قرائت کرد گفت: مردم مرا بر موسى بن جعفر مى آغالند، در صورتیکه او از آنچه متهمش می&amp;zwnj;کنند منزه است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; امام کاظم به نواده امام حسن می&amp;zwnj;نویسد&amp;quot;من بتو سفارش می&amp;zwnj;کنم و از نافرمانى خلیفه بر حذرت می&amp;zwnj;دارم، و به فرمانبردارى و اطاعتش تشویقت می&amp;zwnj;کنم و دستور می&amp;zwnj;دهم که براى خود امانى بگیرى پیش از آنکه در چنگال افتى و از هر طرف گلوگیر شوى و از هر سو بخواهى نفس کشى، راهى نیابى، تا خدا به احسان و فضل خود و دلسوزى خلیفه ابقاه الله بر تو منت نهد و خلیفه امانت دهد و بر تو مهربانى کند&amp;quot; یعنی ختم مبارزه و مخالفت با خلیفه حاکم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;i&gt;آنکه امامش را شناسد تقدم و تأخر این امر زیانش نرساند&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. فضیل بن یسار گوید: از امام صادق علیه السلام درباره قول خدای تعالى (روزی که هر دسته از مردم را بامامشان مى خوانیم ۷۱ سوره ۱۷ )پرسیدم. فرمود: اى فضیل! تو امامت را بشناس، زیرا هرگاه امامت را شناختى تقدم یا تأخر این امر زیانت ندهد، کسی که امامش را بشناسد و پیش از قیام صاحب الامر بمیرد، مانند کسى است که در لشکر آن حضرت بوده است، نه بلکه مانند کسیک ه زیر پرچم آن حضرت نشسته باشد. در اینجا یکى از اصحابش گفت: مانند کسى است که در رکاب رسول خدا صلى اللّه علیه وآله شهید شده باشد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. اسماعیل بن محمد خزاعى گوید: من شنیدم که ابوبصیر از امام صادق علیه السلام مى پرسید: شما عقیده دارید که من حضرت قائم علیه السلام را درک مى کنم ؟ فرمود: اى ابابصیر! مگر نه این است که امامت را مى شناسى عرض کرد: چرا بخدا، شمائید امام من و دست حضرت را گرفت حضرت فرمود: اى ابابصیر! بخدا از اینکه در سایه خیمه قائم صلوات الله علیه بشمشیرت تکیه نکرده ئى باک نداشته باش.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. امام باقر علیه السلام فرمود: براى کسیکه در انتظار امر ما مرده است زیانى نیست که در میان خیمه حضرت مهدى و در میان قشون او نمرده باشد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; امید دینی انتظار ظهور منجی است و همین امید سبب گشایش در کارهاست، چه در زمان ظهور باشد، چه نباشد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; اما آیه مورد اشاره مربوط به قیامت است که هر گروهی از مردم با پیشوایان و رهبرانشان محشور می&amp;zwnj;شوند، چه این پیشوا به حق باشد چه به باطل، چه این پیشوا رهبر دینی باشد چه رهبر حاکمی.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; قیام و تدارک لشکر و در نتیجه تشکیل حکومت، پیش از قیام صاحب الامر از دیدگاه امام صادق محکوم است و تنها وظیفه شیعیان شناخت امام و انتظار ظهور منجی است، در این صورت مانند کسانی هستند که زیر پرچم آنحضرت نشسته باشند و پاداش شهادت در رکاب پیامبر را دارند و باکی از اینکه در رکاب منجی نخواهند بود نداشته باشند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; خلاصه این که ایده تلاش در تشکیل حکومت در امامان شیعه وجود نداشته است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;حقوق واجب امام بر رعیت و رعیت بر امام علیه السلام&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. ابو حمزه گوید: از امام باقر علیه السلام پرسیدم : حق امام مردم چیست ! فرمود: حق او بر آنها اینستکه : سخنش را بشنوند وفرمانش برند. عرض کردم : حق مردم بر امام چیست ؟ فرمود: اینکه (بیت المال را) میان آنها برابر تقسیم کند و با رعیت به عدالت رفتار کند، و چون این دو اصل در میان مردم عملى گشت. امام باک ندارد از آنکه کسى این سو و آن سو زند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. امیرالمؤ منین علیه السلام فرمود: با والیان خود خیانت نورزید و با رهبران خود دغلى نکنید و پیشوایان خود را نادان نخوانید و از رشته پیوند خود پراکنده مشوید که سست شوید و شوکت و دولت شما برود. پایه کارهاى شما باید روى این مبنا باشد، و ملازم این روش باشید.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. سدیر صیرفى گوید: شنیدم امام صادق علیه السلام مى فرمود: به پیغمبر صلى اللّه علیه وآله خبر وفاتش داده شد، در صورتى که تن درست بود و دردى نداشت این خبر را جبرئیل آورد حضرت براى نماز همگانى جار زد و مهاجر و انصار را دستور داد تا سلاح برگیرند، مردم جمع شدند و پیغمبر صلى اللّه علیه وآله بر منبر بر آمد و خبر وفات خود را به آنها داد و سپس فرمود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;:&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;خدا را به والى بعد از خود بیاد مى آورم، از اینکه مبادا بر جماعت مسلمین رحم نکند، باید بزرگشان را احترام کند و به ضعیفشان رحم کند و عالمشان را بزرگ شمرد و به آنها زیان نرساند تا خوارشان کند و نیازمندشان نسازد تا از دینشان به در برود و در خانه خود را به روى آنها نبندد تا تواناى آنها ناتوانشان را بخورد و در لشگرکشى آنها سختى روا ندارد تا نسل امتم را قطع نکند، سپس فرمود: شاهد باشید که من ابلاغ کردم و خیر خواهى نمودم. امام صادق علیه السلام فرمود: این آخرین سخنى بود که پیغمبر صلى اللّه علیه وآله بالاى منبرش فرمود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. حبیب بن ابى ثابت گوید: از همدان و حلوان براى امیرالمؤ منین علیه السلام عسل و انجیر آوردم، حضرت به نقیبان و رؤ ساء اصحابش دستور داد تا یتیمان را حاضر کنند، سپس سرمشکهاى عسل را در اختیار آنها گذاشت تا بلیسند و خود عسلها را قدح، قدح، به مردم تسلیم مى کرد به حضرت عرض شد: اى امیرمؤ منان ؟ چرا باید یتیمان سر مشکها را بلیسند؟ فرمود: زیرا امام پدر یتیمان است و من به حساب پدرها لیسیدن آنها را به ایشان وا گذاشتم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵. رسول خدا صلى اللّه علیه وآله فرمود: هر مؤمن و یا مسلمانى که بمیرد و بدهى داشته باشد که از بابت فساد و اسراف نباشد، بر امامست که آن را بپردازد و اگر نپردازد، گناهش بگردن اوست...&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶. رسول خدا صلى اللّه علیه وآله فرمود. امامت شایسته، جز براى مردیکه داراى سه خصلت باشد: ۱ - تقوى و ورعی که او را از نافرمانى خدا باز دارد، ۲ - خویشتن دارى که خشمش را آن کنترل کند. ۳ - نیکو حکومت کردن بر افراد زیر فرمانش، تا آنجا که نسبت به ایشان مانند پدرى مهربان باشد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt; و در روایت دیگر چنین است: تا آنجا که نسبت برعیت مانند پدرى مهربان باشد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷. سهل بن زیاد از معاویة بن حکیم نقل کند، و او از محمد بن اسلم، و او از مردى طبرستانى بنام محمد معاویه گوید: سپس خودم هم محمد طبرى را دیدم و او بمن خبر داد که شنیدم على بن موسى الرضا علیه السلام مى فرمود: هرگاه بدهکارى براى راه حقى قرض کرده باشد، تا یکسال مهلتش دهند، اگر برایش گشایشى شد، خودش می&amp;zwnj;پردازد و گرنه باید امام از جانب او از بیت المال بپردازد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; موارد مذکور در احادیث فوق همه درباره حاکم و امام مسلمین است که بسط ید دارد نه درباره امامان شیعه که بعد از شهادت امام علی حکومت نداشتند و دستشان از بیت المال کوتاه بود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;روش امام درباره خود و وضع خوراک و پوشاکش در زمان حکومتش&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. امیرالمؤ منین علیه السلام فرمود: خدا مرا پیشواى خلقش قرار داد، و بر من واجب ساخت که درباره خود و خوراک و نوشابه و پوشاکم، مانند مردم ضعیف و مستمند، بر خود تنگ گیرم، تا فقیر از فقیر من پیروى کند و ثروتمند بوسیله ثروتش سرکشى و طغیان ننماید&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. معلى بن خنیس گوید: روزى به امام صادق علیه السلام عرض کردم&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt; : &lt;/span&gt;آل فلان (بنى عباس ) و نعمتهائى را که دارند به یاد آوردم و با خود گفتم : اگر این نعمت براى شما مى&amp;zwnj;بود، ما هم با شما در عیش و خوشى بودیم، فرمود: هیهات، اى معلى! اگر چنین مى بود براى ما جز نگهبانى شبانه و تلاش روزانه و پوشاک زبر و درشت و خوراک سخت و بى خورش، چیزى نبود، از این رو آن امر از ما برکنار شد. آیا تو دیده ئى که هرگز خدایتعالى بردن حقى را جز این نعمت قرار دهد؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. زمانى که عاصم بن زیاد عبا پوشید و جامه نرم را بیرون کرد و برادرش ربیع بن زیاد شکایت او را خدمت امیرالمؤمنین علیه السلام آورد که او همسرش را غمگین نموده و فرزندانش را اندوهناک ساخته، حضرت فرمود: عاصم را نزد من آورید، او را خدمتش آوردند، چون حضرت او را دید، چهره درهم کشید و فرمود: از همسرت خجالت نکشیدى ؟ به فرزندانت رحم نکردى؟ گمان می&amp;zwnj;کنى که خدا چیزهاى خوب و پاکیزه را براى تو حلال کرده و نمى خواهد از آنها استفاده کنى، تو نزد خدا پست&amp;zwnj;تر از آنى، مگر خدا نمى فرماید: &amp;quot;خدا زمین را براى استفاده مردم نهاد که در آن میوه و نخل غلافدار است&amp;quot; (سوره ۱۱ آیه ۵۵ )مگر خدا نمى فرماید&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;:&lt;/span&gt; دو دریا را گذاشت که بهم برسند، میانشان حائلى است که بهم تجاوز نکنند، تا آنجا که فرماید: از آنها لؤ لؤ و مرجان بیرون می&amp;zwnj;شود( سوره ۲۲ آیه ۵۵)بخدا سوگند که بکار بردن نعمت هاى خدا را با عمل، نزد او محبوبتر است از بکار بردن آنها را با گفتار در صورتیکه خداى عزوجل مى فرماید&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;:&lt;/span&gt; و اما نعمت پروردگارت را بازگو (سوره &amp;nbsp;۱۱ آیه ۹۳)&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;عاصم گفت : یاامیرالمؤ منین ! پس چرا خود شما بخوراک سخت و پوشاک درشت، اکتفا نموده&amp;zwnj;ای ؟ فرمود: واى بر تو! همانا خداى عزوجل بر پیشوایان عدالت واجب ساخته که خود را در ردیف مردم ضعیف و ناتوان گیرند، تا فقر و تنگدستى، فقیر را از جا بدر نبرد. عاصم بن زیاد عبا را کنار گذاشت و جامه نرم در بر کرد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. حماد بن عثمان گوید: در محضر امام صادق علیه السلام بودم که مردى به آن حضرت عرضکرد اصلحک الله، شما فرمودى که على بن ابیطالب علیه السلام لباس زبر و خشن در بر می&amp;zwnj;کرد و پیراهن چهار درهمى می&amp;zwnj;پوشید و مانند اینها، در صورتى که بر تن شما لباس نو مى بینیم، حضرت به او فرمود: همانا على ابن ابیطالب علیه السلام آن لباسها را در زمانى مى پوشید که بد نما نبود، و اگر آن لباس را این زمان مى پوشید به بدى انگشت نما مى شد، پس بهترین لباس هر زمان، لباس مردم آن زمانست، ولى قائم ما اهلبیت علیهم السلام زمانیکه قیام کند، همان جامه على علیه السلام را پوشیده و به روش على علیه السلام رفتار کند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; آنچه درباره امام علی گفته شده واقعیت تاریخی دارد، ولی این دلیل نمی&amp;zwnj;شود چون من حاکم نیستم، زندگی مرفه داشته باشم در حالی که از نظر اعتقادی خود را امام مردم می&amp;zwnj;دانم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; امام صادق عدم حکومت کردن امامان تا زمان امام قائم را منتفی دانسته و این را یکی از نعمت&amp;zwnj;های خدا بر آنان می&amp;zwnj;داند زیرا برای آنان حکومت کردن &amp;quot;جز نگهبانى شبانه و تلاش روزانه و پوشاک زبر و درشت و خوراک سخت و بى خورش، چیزى نبود&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; و معتقد است &amp;quot;قائم ما اهلبیت علیهم السلام زمانیکه قیام کند، همان جامه على علیه السلام را پوشیده و به روش على علیه السلام رفتار کند&amp;quot; یعنی حکومت دینی اسلامی تا قیام مهدی تعطیل.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font size=&quot;5&quot;&gt;باب &amp;quot;زندگى حسین بن على علیهماالسلام&amp;quot;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font size=&quot;5&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;امام صادق علیه السلام فرمود: چون کار حسین چنان شد که شد فرشتگان به سوى خدا شیون و گریه برداشتند و گفتند: با حسین برگزیده و پسر پیغمبرت چنین رفتار کنند؟ پس خدا شبح و سایه حضرت قائم علیه السلام را به آنها نمود و فرمود: با این انتقام او را مى گیرم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; برای انتقام &amp;ndash;اگر عمل درستی باشد &amp;ndash; نیاز به لشکر و سپاه است و چون انتقام به زمان ظهور قائم موکول شده بنابراین امامان شیعه دست به تشکیل لشکر و سپاه نمی&amp;zwnj;زدند چه برسد تشکیل حکومت.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; منجی، زمان ظهور از که انتقام می&amp;zwnj;گیرد، از استخوان پوسیده &amp;ndash; اگر مانده باشد - قاتلان امام حسین یا بنا به ضرب المثل مشهور گردن مسگر شوشتری را به گناه آهنگر بلخی خواهد زد.&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; اگر این حدیث صحیح باشد، باید وعده ظهور همان وعده قیامت باشد که انسانها دوباره زنده می&amp;zwnj;شوند و منجی در آن حکومت می&amp;zwnj;کند و آن وقت انتقام معنا دارد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font size=&quot;5&quot;&gt;باب &amp;quot;زندگانى ابوالحسن الرضا علیه السلام&amp;quot;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font size=&quot;5&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. یاسر خادم وریان بن صلت گویند: چون... مأمون... عرضه داشت که امر خلافت را به عهده گیرد، ولى امام رضا علیه السلام خوددارى فرمود: مأمون گفت : پس باید ولایت عهدى را بپذیرد، امام فرمود: مى پذیرم با شروطى که از تو مى خواهم، مأمون گفت : هر چه خواهى بخواه، امام رضا علیه السلام نوشت&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt; :&lt;/span&gt;من در امر ولایت عهدى وارد مى شوم، به شرط آنکه امر و نهى نکنم و فتوى حکم ندهم و نصب و عزل ننمایم و هیچ امرى را که پا برخاست دگرگونش نسازم و از همه این امور مرا معاف دارى مأمون همه آن شروط را پذیرفت...&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. شاء از مسافر نقل کند که چون هارون بن مسیب خواست با محمد بن جعفر بجنگد، امام رضا علیه السلام به من فرمود: نزد او برو و بگو؛ فردا بیرون نرو، که اگر بروى شکست مى خورى و یارانت کشته مى شوند، و اگر پرسید: تو از کجا مى دانى ؟ بگو من در خواب دیده ام.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مسافر گوید: من نزد او رفتم و گفتم : قربانت، فردا بیرون نرو که اگر بیرون بروى، شکست مى خورى و یارانت کشته مى شوند، به من گفت. تو از کجا این را دانستى ؟ گفتم : در خواب دیده ام، جواب داد: آن بنده باکون نشسته خوابیده (که چنین خوابى دیده است )، سپس بیرون رفت و شکست خورد و یارانش کشته شدند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;..&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; معلوم می&amp;zwnj;شود امام انگیزه&amp;zwnj;ای برای پذیرش ولایت عهدی و در نتیجه خلافت نداشته که علیرغم اصرار مامون به شرط عدم دخالت در امور کشورداری ولایت عهدی را می&amp;zwnj;پذیرد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; در اینجا نیز عدم حمایت امام از مبارزان شیعه را مشاهده می&amp;zwnj;فرمایید، آنقدر که امام را از قاعدین (در برابر مجاهدین که خدا در قرآن اجر عظیم برای آنان ذکر کرده) می&amp;zwnj;دانستند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font size=&quot;5&quot;&gt;باب &amp;quot;زندگانى حضرت ابوالحسن على بن محمد (امام دهم)&amp;quot;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font size=&quot;5&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. ابراهیم بن محمد طاهرى گوید: متوکل عباسى در اثر دملی که در آورد بیمار شد و نزدیک به مرگ رسید، کسى هم جرأت نداشت آهنى به بدن او رساند مادرش نذر کرد: اگر او بهبودى یافت از دارائى خود پول بسیارى خدمت حضرت ابوالحسن على بن محمد (امام هادى علیه السلام)فرستد. فتح بن خاقان (ترک، وزیر و نویسنده متوکل ) به متوکل گفت: اى کاش نزد این مرد (امام هادى علیه السلام ) مى فرستادى، زیرا حتما او راه معالجه اى که سبب گشایش تو شود مى داند. متوکل شخصى را نزد حضرت فرستاد و او مرضش را به حضرت توضیح داد پیغام آورنده برگشت و گفت: دستور داد، درده روغن را گرفته، با گلاب خمیر کنند و روى زخم گذارند، چون این معالجه را به آنها خبر دادند، همگى مسخره کردند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فتح گفت : بخدا که او نسبت به آنچه فرموده داناتر است، درده روغن را حاضر کردند و چنانکه فرموده بود عمل کردند و روى دمل گذاردند، متوکل را خواب ربود و آرام گرفت، سپس سرباز کرد و هر چه داشت (از چرک و خون)بیرون آمد. مژده بهبودى او را بمادرش دادند، او ده هزار دینار نزد حضرت فرستاد و مهر خود را بر آن (کیسه پول) بزد، متوکل چون از بستر مرض برخاست بطحائى علوى، نزد او سخن چینى کرد که براى امام هادى پول و اسلحه مى&amp;zwnj;فرستند، متوکل به سعید دربان گفت : شبانه بر او حمله کن، و هر چه پول و اسلحه نزدش بود، بردار و نزد من بیاور&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;... در اتاق خود حضرت، کیسه پولى با مهر مادر متوکل بود و کیسه سر بمهر دیگرى، به من فرمود: جانماز را هم بازرسى کن. چون آن را بلند کردم، شمشیرى ساده و در غلاف، در زیر آن بود، آنها را برداشتم و نزد متوکل رفتم، چون نگاهش بمهر مادرش افتاد که روى کیسه پول بود، دنبالش فرستاد، او نزد متوکل آمد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;یکى از خدمتگزاران مخصوص به من خبر داد که مادر متوکل به او گفت : هنگامى که بیمار بودى و از بهبودیت ناامید گشتم، نذر کردم، اگر خوب شدى از مال خود ده هزار دینار خدمت او فرستم، چون بهبودى یافتى، پولها را نزدش فرستادم و این هم مهر من است بر روى کیسه.متوکل کیسه دیگر را گشود، در آن هم چهار صد دینار بود، سپس کیسه پول دیگرى بآنها اضافه کرد و به من دستور داد که همه را خدمت حضرت برم، من کیسه&amp;zwnj;ها را با شمشیر خدمتش بردم و عرض کردم : آقاى من! این مأموریت بر من ناگوار آمد، فرمود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;:&lt;/span&gt; ستمگران بزودى خواهند دانست که چه سرانجامى دارند (آخر سوره ۲۶).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. یکى از اصحاب ما (شیعیان ) گوید. رونوشت نامه متوکل را به امام هادى علیه السلام، در سال ۲۴۳ از یحیى بن هرثمه گرفتم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;این است متن آن نامه:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بسم الله الرحمن الرحیم، اما بعد، همانا امیرالمؤ منین قدر تو را مى شناسد و خویشاوندى تو را رعایت مى کند و حق تو را لازم مى داند و براى اصلاح حال تو و خاندانت و عزت و خوشبختى و آسودگى تو و ایشان هرچه لازم باشد، فراهم مى کند و از این رفتار خشنودى پروردگار و انجام دادن حقى که از تو و ایشان بر او واجب است، طلب مى کند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;امیرالمؤ منین عقیده دارد عبدالله بن محمد را از تولیت جنگ و نماز در مدینه پیغمبر صلى الله علیه وآله عزل کند، زیرا چنانکه تذکر داده بودى، حق شما را نشناخته و ارزشت را سبک گرفته و مشاء را به کارى متهم ساخته و نسبت داده که امیرالمؤ منین بر کنارى و درستى نیت شما را در عدم اراده و آماده نبودن ترا براى آن کار مى داند و امیرالمؤ منین منصب و ماءموریت عبدالله را به محمد بن فضل داد و او را با احترام و تعظیم و شنوائى از شما و اینکه با این رفتار تقرب به خدا و امیرالمؤ منین جوید دستور داد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;امیرالمؤمنین مشتاق دیدار و تجدید عهد با شماست. شما هم اگر دیدار و اقامت نزد او را تا هر مدتى که خواهى، حرکت کن و هر کسى را که دوست دارى از خانواده و غلامان و اطرافیانت همراه بیاور، و مسافرتت با مهلت و آرامش باشد، هر زمان خواهى کوچ کن و هر زمان خواهى بارانداز و هر گونه خواهى راه پیما. و اگر دوست دارى یحیى بن هرثمه پیشکار امیرالمؤ منین و سربازانى که همراه او است، پشت سرت بیایند و در کوچ کردن و راه پیمودن دنبال شما باشند، به اختیار و دستور شماست، هر گونه خواهى حرکت کنید تا نزد امیرالمؤ منین برسید. که هیچ یک از برادران و فرزندان و اهل بیت و ویژگیانش منزلتى پر مهر و وحسب و شرافتى پسندیده تر از تو ندارند و امیرالمؤ منین نسبت به ایشان دلسوزتر و مهربانتر و خوش رفتارتر و خاطر جمع تر نیست انشاء الله تعالى و السلام علیکم و رحمة الله و برکاته.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نویسنده ابراهیم بن عباس و صلى الله علیه وآله و سلم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; این دو حدیث نشان می&amp;zwnj;دهد حداقل دشمنی میان امام جواد و متوکل نبوده و امام برای درمان متوکل عباسی اقدام کرده و متوکل هم به درخواست&amp;zwnj;های امام پاسخ مثبت داده، عده&amp;zwnj;ای هم برای برهم زدن این رابطه موش&amp;zwnj;دوانی کردند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;زندگانى حضرت ابى محمد حسن بن على امام یازدهم علیهماالسلام&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;احمد بن حارث قزوینى گوید: من با پدرم در سامره بودم، و پدرم دامپزشک اصطبل امام حسن عسکرى علیه السلام بود. مستعین باللّه (خلیفه عباسى ) استرى داشت که در زیبائى و بزرگى مانند نداشت، ولى از سوارى دادن و لجام و زین گرفتن سرپیچى مى کرد، رام کنندگان ستور بر سرش ریخته بودند و چاره ئى براى سوارى او نیافته بودند، یکى از همدمان خلیفه گفت : یا امیرالمؤ منین ! چرا دنبال حسن بن رضا نمى فرستى تا بیاید، یا این استر را سوار شود و یا او را بکشد تا راحت شوى.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;خلیفه نزد ابو محمد (امام عسکرى علیه السلام ) فرستاد، پدرم نیز همراه او بود، پدرم گوید: چون حضرت وارد خانه شد، من با او بودم، نگاهى به استر کرد که در صحن منزل ایستاده بود، بجانب او رفت و دست بر کپلش گذاشت، استر را دیدم که عرق از او سرازیر است، سپس نزد مستعین رفت و سلام کرد مستعین او را خوش آمد گفت و نزدیک خود نشانید، و گفت : اى ابا محمد! این استر را لجام گذار. حضرت بپدرم گفت : غلام لجامش گذارد، مستعین گفت : خود شما لجامش گذارید، حضرت رولباسیش را کنار گذاشت و برخاست و او را زین گذاشت و برگشت. مستعین گفت&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt; : &lt;/span&gt;میل دارید سوارش شوید؟ فرمود: آرى بر او سوار شد، بدون اینکه سرکشى کند و در میان منزل او را براند، راندنى تند و آرام و بهترین راندنى که ممکن است، سپس برگشت و فرود آمد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مستعین گفت : اى ابا محمد! آنرا چگونه دیدى ؟ فرمود: اى امیرالمؤ منین ! در زیبائى و مهارت رفتار مانندش ندیده ام. و چنین استرى جز امیرالمؤ منین را شایسته نیست. خلیفه گفت : اى ابا محمد! امیرالمؤ منین هم شما را بر آن نشانید (و بشما بخشید) حضرت بپدرم فرمود: غلام آن را بگیر، پدرم آن را گرفت و افسار کشید&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; این هم نمونه دیگری از رابطه خوب امام حسن عسکری با خلیفه وقت.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font size=&quot;5&quot;&gt;همه امامان علیهم السلام به امر خداى تعالى قائم و بسویش رهبرند&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. حکم بن ابى نعیم گوید:... (به) امام باقر علیه السلام... عرض کردم : شما مهدى هستى؟ فرمود: همه ما به سوى خدا هدایت مى کنیم.عرض کردم: شما صاحب شمشیرى؟ فرمود همه ما صاحب شمشر و وارث شمشیریم.عرض کردم: شما هستى آنکه دشمنان خدا را مى کشى و دوستان خدا به وسیله شما عزیز مى شوند و دین خدا آشکار مى گردد؟ فرمود: اى حکم ! چگونه من او باشم، در صورتى که به ۴۵ سالگى رسیده ام؟ و حال آنکه صاحب این امر از من به دوران شیر خوارگى نزدیکتر و هنگام سوارى چالاک تر است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. ابو خدیجه از امام صادق علیه السلام راجع به امام قائم علیه السلام پرسید، حضرت محمد: همه ما قائم به امر خدائیم: یکى پس از دیگرى تا زمانى که صاحب شمشیر بیاید، چون صاحب شمشیر آمد، امر و دستورى غیر از آنچه بوده مى آورد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; پس امامان شیعه، خود را مسئول کشتن دشمنان خدا، عزت دوستان خدا و آشکار کننده دین خدا نمی&amp;zwnj;دانستند و در یک کلام خود را موظف به مبارزه برای تشکیل حکومت نمی&amp;zwnj;دانستند والا داشتن ۴۵ سال سن و عدم چالاکی در اسب یا شتر سواری بهانه&amp;zwnj;ای بیش نیست.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; امامان شیعه امر و دستورى (عدم تشکیل حکومت) داشتند ولی منجی امر و دستورى غیر از آنچه بوده (تشکیل حکومت) دارد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;نتیجه&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نتیجه&amp;zwnj;ای که از احادیث اصول کافی &amp;ndash; درست یا نادرست &amp;ndash; به دست می&amp;zwnj;آید، چنین است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;امامان شیعه، حتی اگر حکومت را حق خود می&amp;zwnj;دانستند (که محل تردید است)، برای آن تلاش نکردند و حتی تلاشگران شیعه را از مبارزه &amp;ndash; به علت اینکه وقتش نیست &amp;ndash; باز می&amp;zwnj;داشتند.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;از دیدگام امامان شیعه این برپایی حکومت اسلامی شیعی، وظیفه منجی (مهدی موعود ) است.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;بنابراین ادعای تشکیل چنین حکومتی تا قبل از ظهور موعود، ادعایی گزاف است. &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پایان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بخش اول:&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;../../../../../../../reflections/2011/08/24/6435&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;حکومت شیعی در اصول کافی (۱)&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
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     <comments>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2011/08/30/6611#comments</comments>
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 <pubDate>Tue, 30 Aug 2011 20:43:35 +0000</pubDate>
 <dc:creator>nikfar</dc:creator>
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    <title>حکومت شیعی در اصول کافی (۱)</title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2011/08/24/6435</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2011/08/24/6435&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-nevisandeh&quot;&gt;
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            &lt;div class=&quot;field-item odd&quot;&gt;
                    صالح نظری         &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;صالح نظری &amp;minus; در این مقاله موضع امامان شیعه درباره حکومت اسلامی - شیعی - براساس احادیث کتاب اصول کافی شیخ کلینی - بدون قضاوت درباره درستی یا نادرستی احادیث - مورد بررسی قرار می&amp;zwnj;گیرد.&lt;/p&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;این مقاله، که در دو قسمت عرضه می&amp;zwnj;شود، در صدد یافتن پاسخ به پرسش&amp;zwnj;های زیر است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. آیا امامان شیعه، حکومت را حق خود می&amp;zwnj;دانستند، هر چند برای آن تلاش نکردند؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. آیا امامان شیعه، برای تشکیل حکومت تلاش می&amp;zwnj;کردند؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. اگر امامان شیعه، خود برای تشکیل حکومت تلاش نمی&amp;zwnj;کردند، آیا از مبارزان ضد حکومت&amp;zwnj;های ظالم حمایت می&amp;zwnj;کردند؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. موضع امامان شیعه درباره حکومت اسلامی - شیعی - چیست؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در این نوشته، در هر مورد قطعه&amp;zwnj;ای از اصول کافی نقل شده و سپس نکته یا نکاتی درباره آن مطرح می&amp;zwnj;گردد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;در اینکه ائمه علیه السلام خلفاء خدایند در زمین و درهاى توجه به اویند&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ابن سنان گوید از امام صادق علیه السلام پرسیدم تفسیر قول خداى جل جلاله را (سوره ۵۵، آیه &amp;nbsp;۲۴: خدا از میان شما کسانى را که ایمان آورده و کار شایسته کرده&amp;rlm;اند وعده فرموده است که در زمین به خلافت گمارد چنانکه پیشینیان ایشان را بخلافت گماشت)فرمود: ایشان ائمه هستند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; پیشینیان چگونه به خلافت گماشته شدند؟ جز این است که با به کارگیری تعلیمات نبی خود یک زندگی شرافتمندانه داشتند؟ حال و آینده نیز بر همین روال است، این خلافت ارتباطی به حکومت کردن ندارد، در هر زمانی بالاخره یک نفر حاکم (خلیفه) است در حالیکه وعده خلافت به تمام کسانی که ایمان آورده و کار شایسته کرده&amp;rlm;اند داده شده است و این همان جانشینی خدا در زمین می&amp;zwnj;باشد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; اگر مراد فقط ائمه شیعه باشند یعنی به جز ائمه شیعه، کسی مؤمن نیکوکار نیست، این اهانت به مؤنین نیکوکار است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; اگر خلافت حق مؤمن نیکوکار است و منحصر به ائمه شیعه نیست، این خلافت به معنای حاکم حکومت نمی&amp;zwnj;تواند باشد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;ائمه علیهم السلام والیان امر و حسد برده شدگانى هستند که خداى عزوجل در قرآن فرموده&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. حمران بن اعین گوید: از امام صادق علیه السلام پرسیدم قول خداى عزوجل را &lt;b&gt;&amp;ndash; &amp;quot;&lt;/b&gt;همانا آل ابراهیم کتاب دادیم&amp;quot;&lt;b&gt; &amp;minus;&lt;/b&gt;فرمود: مقصود نبوت است، گفتم: حکمت چیست؟ فرمود: فهمیدن و قضاوت است گفتم&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;:&lt;/span&gt; &amp;quot;و به آنها ملک بزرگ دادیم&amp;quot;؟ &lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;فرمود: اطاعت است&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. برید اجلى گوید: امام باقر علیه السلام درباره قول خداى عزوجل تبارک و تعالى &lt;b&gt;(&lt;/b&gt;ما به آل ابراهیم کتاب و حکمت و ملک بزرگ دادیم&lt;b&gt;)&lt;/b&gt;فرمود: خدا پیغمبران و رسولان و امامان را از آل ابراهیم قرار داد، پس چگونه این مردم نسبت به آل ابراهیم علیه السلام این مقام را مختلفند ولى درباره آل محمد صلى الله علیه و آله وسلم انکار مى&amp;rlm;کنند. عرض کردم &lt;b&gt;&amp;quot;&lt;/b&gt;و به ایشان ملک بزرگى دادیم&lt;b&gt;&amp;quot;&lt;/b&gt;چیست؟ فرمود: ملک بزرگ این است که امامان را در آن خانواده قرار داد، هر که اطاعت آنها کند اطاعت خدا کرده و هر که نافرمانى آنها کند نافرمانى خدا کرده است، این است ملک بزرگ&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; کتاب نبوت است، حکمت فهمیدن و قضاوت است، ملک بزرگ سرزمین وسیع است اما این موضوع آل ابراهیم چه ارتباطی به اطاعت از امام دارد، از این آیه اطاعت از امام به دست نمی&amp;zwnj;آید.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; از موضوع اطاعت هم حکومت به دست نمی&amp;zwnj;آید.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;بیان صحیفه، جفر، جامعه و مصحف فاطمه علیها السلام&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&amp;rlm;&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. عبدالملک بن اعین به امام صادق علیه السلام فرمود: طایفه زیدیه و معتزله گرد محمد بن عبدالله (بن حسن معروف به نفس زکیه) را گرفته&amp;rlm;اند آیا براى او سلطنتى هست؟ فرمود: بخدا که نزد من دو کتابست که نام تمام انبیا و سلاطینى که در زمین فرمانروائى می&amp;zwnj;کنند، در آنها ثبت است، بخدا که در هیچیک از آنها نام محمدبن عبدالله نیست&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. فضیل بن سکرة گوید: بر امام صادق علیه السلام وارد شدم، فرمود اى فضیل مى&amp;rlm;دانى اندکى پیش چه مطالعه می&amp;zwnj;کردم؟، عرض کردم : نه، فرمود: کتاب فاطمه علیهاالسلام را مطالعه می&amp;zwnj;کردم، تمام سلاطینى که در زمین فرمانروائى مى&amp;rlm;کنند، بنام خود و نام پدرانشان در آن نوشته است و من براى فرزندان حسن چیزى در آن ندیدم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; احادیث فوق نشان می&amp;zwnj;دهد ائمه چقدر به نوادگان امام حسن حساس&amp;zwnj;اند واین یک واقعیت تاریخی است که نوادگان امام حسن انسان&amp;zwnj;های مبارزی بودند و در مقابل خلفا می&amp;zwnj;ایستادند و بیشترین شهید را در راه آزادی از ظلم و استبداد خلفا تقدیم می&amp;zwnj;کردند، در حالی که بعد از حادثه کربلا تحرک قابل ملاحظه&amp;zwnj;ای از سوی ائمه و شیعیانشان مشاهده نشده است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; شیعیان زیدی، گروهی هستند که &amp;quot; زید فرزند امام سجاد &amp;quot; را امام پنجم و منجی و مهدی موعود می&amp;zwnj;دانند و اکنون نیز شیعیان زیدی - با تقریب بیست درصد شیعیان جهان &amp;ndash; عمدتا در یمن زندگی می&amp;zwnj;کنند.&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; زید بن علی بن حسین، انسان شریف و مبارزی بود که علیرغم مخالفت پدرش، با حکومت مروانیان مبارزه کرده و به شهادت می&amp;zwnj;رسد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;در اینکه ائمه به کدام دسته از گذشتگان می&amp;zwnj;&amp;zwnj;مانند و کراهت قول به نبوت ایشان&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;امام صادق علیه السّلام فرمود: درباره ما به دانستن حلال و حرام باید توقف کرد. اما نبوت، نه.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; اصل مطلب درباره امامان شیعه همین است &amp;quot;درباره ما به دانستن حلال و حرام باید توقف کرد&amp;quot; ونسبت&amp;zwnj;های دیگر نارواست.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;ائمه صلوات الله علیهم در علم و شجاعت و اطاعت برابرند&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. امام صادق علیه السّلام درباره آیه (کسانی که ایمان آوردند و فرزندانشان هم در ایمان از آنها پیروى کردند، فرزندانشان را به ایشان ملحق کنیم و از عملشان چیزى کمشان ندهیم / سوره ۲۱، آیه ۵۲) فرمود: کسانی که ایمان آوردند، پیغمبر صلى اللّه علیه وآله و امیرالمؤمنین&amp;zwnj;اند، و فرزندان او، ائمه و اوصیاء صلوات الله علیهم باشند که خدا فرماید: به آنها ملحق می&amp;zwnj;&amp;zwnj;کنیم و جحتى را که محمد صلى اللّه علیه و آله درباره على آورده، نسبت به اولادش کاهش ندهیم و حجت همه یکى است و طاعتشان هم یکى است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. حضرت ابوالحسن علیه السّلام فرمود: ما خانواده در علم و شجاعت برابریم و در بخشیدن بهر اندازه که دستور داریم، مى بخشیم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. حارث بن مغیرة گوید: شنیدم امام صادق علیه السلام مى فرمود: ما نسبت به امر و فهم و حلال و حرام در یک روش هستیم و اما پیغمبر صلى اللّه علیه و آله و على فضیلت خود را دارند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; ترجمه آیه ارتباطی با تاویل آن ندارد، منظور از ایمان آوردن، ایمان به خدا و رسول است بنابراین شامل رسول خدا نمی&amp;zwnj;شود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; به نظر نمی&amp;zwnj;آید امامان شیعه از نظر علم و شجاعت با هم برابر باشند، حداقل رفتار اجتماعی آنان چنین نشان می&amp;zwnj;دهد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; این جمله صحیح است &amp;quot; ما نسبت به امر و فهم و حلال و حرام در یک روش هستیم و اما پیغمبر (ص) و على فضیلت خود را دارند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&amp;quot;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; اینجا نیز مسئله اطاعت هست که ارتباطی به حکومت ندارد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;نادری است درباره غیبت&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ابى اسحاق گوید: جمعى از موثقین اصحاب امیرالمؤ منین علیه السلام نقل کردند که شنیدیم امیرالمؤ منین علیه السلام در یکى از خطبه هایش چنین مى فرمود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;: &lt;/span&gt;بار خدایا من می&amp;zwnj;دانم که بساط علم و دانش برچیده نمی&amp;zwnj;شود و مایه هایش از میان نمی&amp;zwnj;رود و می&amp;zwnj;دانم که تو روى زمینت را از حجتى بر خلق خالى نسازى که او یا آشکار باشد و فرمانش نبرند و یا ترسان و پنهان تا حجت تو باطل نگردد و دوستانت بعد از آنکه هدایتشان فرمودى گمراه نشوند، ولى آنها کجایند و چقدر؟ ایشان از لحاظ شماره بسیار اندک و از لحاظ ارزش نزد خداى جل ذکره بسیار بزرگند، ایشان پیرو پیشوایان دین و امامان رهبرند. همان امامانى که به آدابشان پرورش یافته و براه آنها رفته&amp;zwnj;اند. اینجاست که علم و دانش ایشانرا به حقیقت ایمان آگاه ساخته و روحشان نداى پیشوایان دانش را لبیک گوید و همان احادیثى که بر دیگران مشکل آید براى ایشان دلنشین باشد و بآنچه تکذیب کنندگان، از آن وحشت دارند و متجاوزان سرباز می&amp;zwnj;زنند انس و الفت دارند. آنها پیرو دانشمندانند، براى اطاعت خداى تبارک و اولیائش با اهل دنیا معاشرت کنند و نسبت بدین و براى ترس از دشمن خویش تقیه را آئین خود سازند، روحهاى ایشان بمقام بالا مربوط است و دانشمندان و پیروانشان در زمان دولت باطل لال و خاموشند و همیشه بانتظار دولت حق نشسته اند، خدا هم با کلمات خود حق را ثابت کند و باطل را از میان ببرد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt; هاى هاى، خوشا بحالشان که در زمان صلح و آرامش بر دینشان شکیبائى ورزیدند، هان از اشتیاق بدیدارشان در زمان ظهور دولتشان، خدا ما و ایشان و پدران و همسران و فرزندان نیکوکارشان را در بهشت برین جمع خواهد کرد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; چنانچه از متن حدیث پیداست ظاهرا امام علی پیش بینی دوران سخت دینداران را می&amp;zwnj;کند به طوری که عقاید خود را تقیه و پنهان می&amp;zwnj;کنند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; اما این که &amp;quot; به انتظار دولت حق نشسته اند&amp;quot; همان باور عمومی همه ادیان است که در انتظار منجی موعود نشسته&amp;zwnj;اند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; به نظر می&amp;zwnj;آید دولت حق در قیامت برپا می&amp;zwnj;شود که خداوند مؤمنین را در بهشت برین جمع خواهد کرد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;باب &amp;quot;در امر غیبت&amp;quot;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;عبداللّه بن عطا گوید: به امام باقر علیه السلام عرض کردم : شیعیان شما در عراق بسیارند و به خدا مانند شما در خاندانت کسى نیست، پس چرا خروج نمى کنى؟ فرمود: اى عبداللّه بن عطا! تو گوشهایت را براى بیخردان مى گسترى به خدا من صاحب شما نیستم، گوید عرض کردم : پس صاحب ما کیست؟ فرمود: بنگرید هر که ولادتش از مردم نهان گشت او صاحب شماست، همانا کسى از ما خاندان نیست که انگشت نما شود و میان دهان مردم افتد، جز اینکه مرگش یا از خون دل خوردن و یا از بینیش بخاک مالیده شدن باشد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; از نظر امام باقر خروج بر حاکم وقت و به تبع آن تشکیل حکومت وظیفه امام نیست و این وظیفه فقط بر عهده امام غایب است (نایب خود خوانده امام که جای خود دارد) و باور به آن نتیجه گوش کردن به حرف بی خردان است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; از نظر امام باقر امامان شیعه چون انگشت نما و شناخته شده هستند اگر کوچکترین تحرک سیاسی بکنند بر اثر خون دل خوردن و یا حقیرانه مرگشان رقم می&amp;zwnj;خورد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;آنچه ادعاى امامت راستگو را از دروغگو معلوم می&amp;zwnj;کند&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱. زید بن على بن الحسین، خدمت امام باقر علیه السلام رسید و نامه هائى از اهل کوفه همراه داشت که او را بطرف خود خوانده و از اجتماع خود آگاهش نموده و دستور نهضت داده بودند، امام باقر علیه السلام باو فرمود: این نامه&amp;zwnj;ها از خود آنها شروع شده یا جواب نامه ایستکه بآنها نوشته ئى و ایشانرا دعوت کرده ئى ؟ گفت : ایشان شروع کرده اند، زیرا حق ما را می&amp;zwnj;شناسند و قرابت ما را با رسول خدا صلى اللّه علیه و آله می&amp;zwnj;دانند و در کتاب خداى عزوجل وجوب دوستى و اطاعت ما را مى بینند و فشار و گرفتارى و بلا کشیدن ما را مشاهده می&amp;zwnj;&amp;zwnj;کنند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;امام باقر علیه السلام فرمود: اطاعت از طرف خداى عزوجل واجب گشته و روشى است که خدا آنرا در پیشینیان امضاء کرده و در آخرین همچنان اجرا می&amp;zwnj;کنند، و اطاعت نسبت بیک نفر از ماست و دوستى نسبت بهمه ما و امر خدا نسبت باولیائش جارى می&amp;zwnj;شود طبق حکمى و فرمانى قطعى و آشکار و حتمى بودنى انجام شدنى و اندازه ئى بى کم و زیاد و موعدى معین در وقتى معلوم مبادا کسانیکه ایمان ثابتى ندارند، ترا سبک کنند، ایشان ترا در برابر خواست خدا هیچگونه بى نیازى ندهند، شتاب مکن که خدا بواسطه شتاب بندگانش شتاب نمیکند تو بر خدا سبقت مگیر که گرفتارى ناتوانت کند و بخاکت اندازد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;زید در اینجا خشمگین شد و گفت : امام از ما خاندان آنکس نیست که در خانه نشیند و پرده را بیندازد و از جهاد جلوگیرى کند. امام از ما خاندان کسى است که از حوزه خود، دفاع کند و چنانکه سزاوارست در راه خدا جهاد کند و نیز از رعیتش دفاع کند و دشمن را از حریم و پیرامونش براند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;امام باقر علیه السلام فرمود: اى برادر، تو آنچه را بخود نسبت دادى، حقیقة هم در خود مى بینى بطورى که بتوانى براى آن دلیلى از کتاب خدا یا برهانى از قول پیغمبر صلى اللّه علیه و آله بیاورى و یا نمونه و مانندى براى آن ذکر کنى؟ همانا خداى عزوجل حلال و حرامى وضع فرموده و چیزهائى را واجب ساخته و مثلهائى زده و سنتهائى را مقرر داشته و براى امامى که بامر او قیام می&amp;zwnj;کند نسبت باطاعتیکه براى او واجب ساخته، شبهه و تردیدى باقى نگذاشته تا امام بتواند امرى را پیش از رسیدن وقتش انجام دهد یا در راه خدا پیش از فرا رسیدن موقعش جهاد کند. در صورتیکه خداى عزوجل درباره شکار مى فرماید&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;: &lt;/span&gt;وقتى که محرم هستید شکار را نکشید (سوره ۹۵ آیه ۵)آیا کشتن شکار مهمتر است یا کشتن انسانیکه خدایش &amp;zwj;محترم شمرده، خدا براى هرچیز موعدى معین کرده، چنانچه مى فرماید&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;: &lt;/span&gt;چون از احرام در آمدید شکار کنید (۳ سوره ۵)و فرموده است :شعائر خدا و ماههاى حرام را حلال نکنید (سوره ۲ آیه ۵)و ماهها را شماره معلومى قرار داد و چهار ماه از آن را حرام ساخت و فرمود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;: &lt;/span&gt;چهار ماه در زمین گردش کنید و بدانید که شما خدا را ناتوان نسازید ۲ سوره ۹ سپس فرمود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;: &lt;/span&gt;چون ماههاى حرام سپرى شد، مشرکین را در هر کجا یافتید بکشید (سوره ۵ آیه ۹) پس براى کشتن موعدى قرار داد و باز فرموده است&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt; : &lt;/span&gt;قصد بستن عقد زناشوئى نکنید تا مدت مقرر بسر رسد پس خدا براى هر چیزى موعدى و براى هر موعدى نوشته اى مقرر داشته است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;اکنون اگر تو از پروردگارت گواهى دارى و نسبت بامر خود یقین دارى و کارت پیشت روشن است خود دانى وگرنه امرى را که نسبت بآن شک و تردید دارى پیرامونش نگرد، و براى از میان رفتن سلطنتى که روزیش را تمام نکرده و بپایان خود نرسیده و موعد مقررش نیامده قیام مکن، که اگر پایانش برسد و روزیش بریده شود و موعد مقررش برسد، حکم قطعى بریده شود و نظام حق پیوسته گردد و خدا براى فرمانده و فرمانبر خوارى و زبونى در پى آرد، بخدا پناه می&amp;zwnj;برم از امامیکه از وقت شناسى گمراه گردد، و فرمانبران نسبت بآن داناتر از فرمانده باشند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;برادرم! تو مى خواهى ملت و آیین مردمى را زنده کنى که به آیات خدا کافر شدند و نافرمانى پیغمبرش کردند و بدون رهبرى خدا پیرو هواى نفس خود شدند و بدون دلیلى از جانب خدا و فرمانى از پیغمبرش ادعاى خلافت کردند؟ برادرم! ترا در پناه خدا مى برم از اینکه فردا در کناسه بدار آویخته شوى آنگاه چشمان حضرت جوشید و اشکش جارى شد و فرمود: میان ما و آنکه پرده ما را درید و حق ما را انکار کرد و راز ما را فاش ساخت و ما را به غیر جدمان نسبت داد و درباره ما چیزى گفت که خود نگفتیم، خدا داور باشد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; در این حدیث انصافأ استدلال جناب زید بن قوی تر از استدلال برادرش امام باقر است و با آیات قرآن و سنت نبوی بیشتر سازگاری دارد، برای همین است که گروهی از شیعیان زیدی مذهب شدند و اکنون نیز پیروان قابل توجهی دارند، امام باقر از آیات قران که برای هر چیزی موعدی قرار داده، زمان قیام و تشکیل حکومت را با زمان ظهور منجی پیوند می&amp;zwnj;دهد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; امام باقرعملأ هر قیامی و تشکیل حکومتی قبل از ظهور منجی را خلاف سنت الهی می&amp;zwnj;داند، بر این اساس است که روحانیت سنتی شیعه هر حاکم قبل از ظهور منجی را طاغوت می&amp;zwnj;نامد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲. عبدالله بن ابراهیم گوید:...چون پدرم رحمه اللّه شروع کرد که براى محمد بن عبداللّه بن حسن (نوه امام حسن علیه السلام ) بیعت گیرد و تصمیم گرفت که دوستانش را ببیند، گفت : من فکر می&amp;zwnj;کنم تا جعفر بن محمد (امام ششم ) علیهما السلام را نبینم این کار درست نشود...امام صادق علیه السلام فرمود: تو مطیع تر از مرا مى توانى پیدا کنى و به من نیازى ندارى. به خدا که تو می&amp;zwnj;دانى من آهنگ رفتن بیابان مى کنم و یا تصمیم آن را مى گیرم سنگینى مى کنم و به تاخیر مى اندازم و نیز قصد رفتن حج مى کنم و جز با خستگى و رنج و سختى به آن نمى رسم. به فکر دیگران باش و از آنها بخواه و به ایشان مگو که نزد من آمده ئى، پدرم گفت، گردن مردم به سوى شما دراز است، اگر شما از من بپذیرى هیچکس عقب نشینى نمى کند، و شما هم از جنگ کردن و ناراحت شدن معافى.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;... امام صادق علیه السلام به او فرمود: من ترا به خدا پناه مى دهم از اینکه متعرض این کار شوى که صبح و شام در فکر آن هستى، و مى ترسم که این اقدام، شرى به تو رساند، گفتگوى آنها ادامه پیدا کرد و سخن به جائى رسید که پدرم نمى خواست، و از جمله سخنان پدرم این بود که بچه جهت حسین به امامت سزاوارتر از حسن شد؟ امام صادق علیه السلام فرمود: خدا رحمت کند حسن را و رحمت کند حسین را، براى چه این سخن به میان آوردى ؟ پدرم گفت زیرا اگر حسین علیه السلام عدالت مى ورزید، سزاوار بود امامت را در بزرگترین فرزند امام حسن علیه السلام قرار دهد. امام صادق علیه السلام فرمود: همانا خداى تبارک و تعالى که به محمد صلى اللّه علیه و آله وحى فرستاد، بخواست خود وحى فرستاد و با هیچکس از مخلوقش مشورت نکرد، و محمد صلى اللّه علیه و آله على علیه السلام را به آنچه خواست دستور داد و او هم چنانچه دستور داشت عمل کرد، ما درباره على نگوئیم، جز همان بزرگداشت و تصدیقى را که رسول خدا صلى اللّه علیه و آله فرموده است، اگر حسین دستور مى داشت که به بزرگسال تر وصیت کند یا آنکه امامت را میان فرزندان خود و امام حسن نقل و انتقال دهد عمل مى کرد، او نزد ما متهم نیست که امامت را براى خود ذخیره کرده باشد، در صورتیکه او مى رفت و امامت را مى گذاشت او به آنچه ماءمور بود، رفتار کرد، و او جد تو و عموى تست اگر نسبت به او خوب گوئى، چقدر براى تو شایسته است، و اگر زشت گوئى خدا ترا بیامرزد، پس عمو! سخن مرا بشنو و اطاعت کن، به خدائیکه جز او شایسته پرستشى نیست، من نصیحت و خیر خواهى را از تو باز نداشتم، چگونه ولى ترا نمى بینم که عمل کنى، و امر خدا هم برگشت ندارد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پدرم در اینجا خوشحال شد امام صادق علیه السلام به او فرمود: به خدا تو می&amp;zwnj;دانى که او همان لوچ چشم موى پیشانى برگشته، سیاه رنگى است که در ته سلیگاه سده اءشجع کشته مى شود پدرم گفت : او آن نیست. به خدا سوگند که او در برابر یک روز، یک روز مى جنگد و در برابر یکساعت، یک ساعت و در برابر یک سال، یکسال، و به خونخواهى تمام فرزندان ابیطالب قیام مى کند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;امام صادق علیه السلام به او فرمود: خدا ترا بیامرزد، چقدر مى ترسم که اینبیت بر رفیق ما منطبق شود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt; منتک نفسک فى الخلاء ضلالا (نفست در خلوت به تو وعده هاى دروغ و محال داده ) نه به خدا، او بیشتر از چهار دیوار مدینه را به دست نمى آورد، و هر چه تلاش کند و خود را به مشقت افکند، دامنه فعالیتش بطائف نرسد، این مطلب ناچار واقع شود، از خدا بترس و بر خود و برادرانت رحم کن، به خدا من او را نامبارکترین نطفه ئى مى دانم که صلب مردان بزهدان زنان ریخته است به خدا که او در میان خانه هاى سده اشجع کشته مى شود، گویا اکنون او را برهنه و روى خاک افتاده مى بینم که خشتى میان دو پایش هست، و این جوان هم هرچه بشنود سودش ندهد موسى بن عبدالله گوید: مقصودش من بودم او هم همراهش خروج کند وشکست خورد و رفیقش (محمد) کشته شود، سپس موسى برود و با پرچم دیگرى خروج کند و سپهبد آن کشته شود و لشکرش پراکنده شود، اگر از من بپذیرد، باید در آنجا از بنى عباس امان خواهد، تا خدا فرج دهد و به تحقیق من مى دانم که این امر عاقبت ندارد و تو هم مى دانى و ما هم مى دانیم که پسر چشم لوچ سیاه رنگ موى پیشانى بر گشته تو، در ته رودخانه سده اءشجع در میانه خانه&amp;zwnj;ها کشته خواهد شد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پدرم برخاست و مى گفت : بلکه خدا ما را از تو بى نیاز مى کند و تو هم خودت از این عقیده بر مى گردى یا آنکه خدا ترا بر مى گرداند با دیگران، و از این سخنان مقصودى ندارى جز اینکه دیگران را از ما بگردانى و تو وسیله سرپیچى آنها شوى، امام صادق علیه السلام فرمود: خدا می&amp;zwnj;داند که من جز خیر خواهى و هدایت ترا نمى خواهم و من جز کوشش در این راه تکلیفى ندارم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پدرم برخاست و از شدت خشم جامه اش بزمین مى کشید، امام صادق علیه السلام خود را به او رسانید و فرمود به تو خبر دهم که من از عمویت که دائى تو هم هست شنیدم مى فرمود: تو و پسران پدرت کشته مى شوید، اگر از من مى پذیرى و عقیده دارى که بنحو احسن دفاع کنى، بکن، به خدائیکه جز او شایان پرستشى نیست و او به پنهان و آشکار داناست و رحمان و رحیم است و بزرگوار و برتر از خلق خود است، من دوست دارم همه فرزندان و عزیزترین آنها و عزیزترین خانواده ام را قربانت کنم، و نزد من چیزى با تو برابر نیست، خیال مکن که من با تو دوروئى کردم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پدرم متأسف و خشمگین از نزدش خارج شد، سپس حدود بیست شب گذشت که مامورین ابى جعفر (منصور خلیفه عباسى ) آمدند و پدر و عموهایم : سلیمان بن حسن و حسن بن حسن و ابراهیم بن حسن، و داود بن حسن و على بن حسن و سلیمان بن داود بن حسن و على بن ابراهیم بن حسن بن جعفر بن حسن و طباطباء ابراهیم بن اسماعیل بن حسن و عبدالله بن داود را گرفتند و به زنجیز بستند و بر محملهاى بى فرش و روپوش نشانیدند و ایشانرا در نمازگاه عمومى نگه داشتند تا مردم سرزنششان کنند، ولى مردم بحال آنها رقت کرده و از سرزنش خوددارى کردند، سپس آنها را بردند و جلو در مسجد پیغمبر صلى اللّه علیه وآله نگه داشتند&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;عبدالله بن ابراهیم جعفرى گوید: خدیجه دختر عمر بن على به ما گفت : چون آنها را جلو در مسجد که باب جبرئیلش گویند نگه داشتند، امام صادق علیه السلام پیدا شد و همه عبایش روى زمین بود، آنگاه از در مسجد بیرون آمد و سه مرتبه فرمود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;: &lt;/span&gt;خدا شما را لعنت کند، اى گروه انصار. شما براى چنین کارى با پیغمبر معاهده و بیعت نکردید، همانا به خدا من آزمند بودم ولى مغلوب شدم، قضاى خدا بازگشت ندارد، سپس حرکت کرد و یکتاى نعلینش را بپا کرد و دیگرى در دستش بود و تمام دنباله عبایش را به زمین مى کشید و به خانه خود رفت و بیست شب تب کرد و شب و روز گریه مى کرد که ما نسبت به او نگران شدیم این بود گفتار خدیجه&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; در این حدیث نیز مانند حدیث قبل عدم تمایل امام صادق جهت همراهی با نوادگان امام حسن که مردمی مبارز بودند را نشان می&amp;zwnj;دهد و نیز بی نتیجه بودن مبارزات آنان و شکست شان در مبارزه را یادآوری می&amp;zwnj;کند (نتیجه گرایی در مقابل مامور به وظیفه ).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; امام صادق نه تنها تمایل به مبارزه نداشت بلکه مبارزین را از ادامه مبارزه منع می&amp;zwnj;کرد و البته برای کشته شدنشان غصه می&amp;zwnj;خورد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳. جعفرى گوید: موسى بن عبدالله بن حسن نقل کرد که چون محملهاى ایشان پیدا شد امام صادق علیه السلام از مسجد برخاست و به جانب محملى که عبدالله بن حسن در آن بود، برفت تا با او سخن گوید، ولى به شدت از او جلوگیرى کرد و پاسبانى به او حمله کرد و او را کنار زد و گفت : از این مرد دور شو، همانا خدا ترا و دیگران را کارگزارى کند، سپس ایشان را به کوچه&amp;zwnj;ها بردند و امام صادق علیه السلام به منزلش برگشت و هنوز به بقیع نرسیده بودند که آن پاسبان ببلاى سختى گرفتار شد، یعنى شترش به او لگدى زد که رانش خرد شد و همانجا در گذشت. آنها را بردند و ما مدتى بودیم تا محمد بن عبدالله بن حسن آمد و خبر داد که ابو جعفر پدر و عموهاى او را کشت، غیر از حسن بن جعفر و طباطبا و على بن ابراهیم و سلیمان بن داود و داوود بن حسن و عبدالله بن داود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در این هنگام محمد بن عبدالله ظهور کرد و مردم را به بیعت خود دعوت نمود و من سومین کسى از بیعت کنندگانش بودم، مردم اجتماع کردند و هیچ یک از قریش &amp;zwj;وانصار وعرب با او مخالفت نکرد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;موسى گوید: محمد با عیسى بن زید که مورد اعتماد و رئیس لشکرش بود مشورت کرد که براى بیعت دنبال بزرگان قومش فرستد. عیسى بن زید گفت : آنها را با نرمى خواندن سود ندارد، زیرا نمى پذیرند، جز اینکه بر ایشان سخت گیرى. آنها را به من واگذار. محمد گفت : تو هر کس از آنها را که خواهى متوجهش شو&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;. &lt;/span&gt;عیسى گفت : نزد رئیس و بزرگ آنها یعنى جعفر بن محمد علیه السلام فرست زیرا اگر تو با او سخت گیرى کنى، همه مى فهمند که با آنها همان رفتار خواهى کرد که با امام صادق علیه السلام کردى.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;موسى گوید: چیزى نگذشت که امام صادق علیه السلام را آوردند و در برابرش نگه داشتند، عیسى بن زید به او گفت : اسلم تسلم تسلیم شو تا سالم بمانى امام صادق علیه السلام فرمود: مگر تو بعد از محمد صلى اللّه علیه و آله پیغمبرى تازه ئى آورده ئى ؟ محمد گفت : نه، بلکه مقصود این است که : بیعت کن تا جان و مال و فرزندانت در امان باشد و به جنگ کردن هم تکلیف ندارى، امام صادق علیه السلام فرمود: من توانائى جنگ و کشتار ندارم و به پدرت دستور دادم و او را از بلائیکه به او احاطه کرده بر حذر داشتم ولى حذر در برابر قدر سودى نبخشد، پسر برادرم ! بفکر استفاده از جوانها باش و پیران را واگذار. محمد گفت : سن و من و تو خیلى نزدیک بهم است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;امام صادق علیه السلام فرمود، من در مقام مبارزه با تو نیستم و نیامده ام تا نسبت به کاریکه در آن مشغولى بر تو پیشى گیرم. محمد گفت : نه به خدا، ناچار باید بیعت کنى، امام صادق علیه السلام فرمود برادر زاده ! من حال باز خواست و جنگ ندارم، همانا من مى خواهم به بیابان روم، ناتوانى مرا باز می&amp;zwnj;دارد و بر من سنگینى مى کند تا آنکه بارها خانواده ام در آن باره به من تذکر مى دهند ولى تنها ناتوانى مرا از رفتن باز مى دارد، ترا به خدا و خویشاوندى میان ما که مبادا از ما رو بگردانى و ما بدست تو بدبخت و گرفتار شویم....&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; این حدیث نیز همان ماجرا وعدم تمایل و یا دخالت در امر قیام و مبارزه علیه حکومت را امام صادق نشان می&amp;zwnj;دهد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴. عبداللّه بن مفضل گوید: چون حسین بن على، کشته شده در فخ خروج کرد و مدینه را بتصرف در آورد، موسى بن جعفر را براى بیعت طلب کرد، حضرت تشریف آورد و باو فرمود: پسر عمو! بمن تکلیفى مکن که پسر عمویت به عمویت امام صادق کرد، تا از من چیزیکه نمیخواهم سر زند؟ چنانکه از امام صادق علیه السلام چیزى سر زد که نمى خواست. حسین بحضرت عرضکرد: مطلبى بود که من بشما عرضکردم : اگر خواهى در آن خارج شو و اگر نخواهى شما را در آن مجبور نمى کنم خدا یاور است و سپس خداحافظى کرد&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt; ابو الحسن موسى بن جعفر هنگام خداحافظى به او فرمود: پسر عمو! تو کشته خواهى شد، پس نیکو جنگ کن زیرا این مردم فاسقند، اظهار ایمان مى کنند و در دل مشرکند و انالله و انا علیه راجعون من مصیبت شما جماعت را بحساب خدا می&amp;zwnj;گذارم، سپس حسین خروج کرد و کارش بدانجا رسید که رسید، یعنى همگى کشته شدند، چنانچه آنحضرت علیه السلام فرمود&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;minus; این حدیث رفتار امام کاظم نیز مانند رفتار پدرانش دوری از سیاست و حکومت به خوبی نمایان است ادعای غیب گویی و پیش بینی آینده نیز مشکل را حل نمی&amp;zwnj;کند اگر این توان غیب گویی در امامان بود باید امام علی و امام حسین از آن بهره جسته و خود را به هلاکت (!) نمی&amp;zwnj;انداختند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;ادامه دارد&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
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 <pubDate>Wed, 24 Aug 2011 08:41:22 +0000</pubDate>
 <dc:creator>nikfar</dc:creator>
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