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    <title>عقل و نقل</title>
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    <title>محمد تازی و محمد رازی (۲)</title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/04/28/13761</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/04/28/13761&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-sartitr&quot;&gt;
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                    گزارشی از فلسفه و عقل ستیزی فقیهان         &lt;/div&gt;
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                    اکبر گنجی        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
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        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;اکبر گنجی &amp;minus; &amp;nbsp;در این بخش ضمن اشاره به آرای پاره&amp;zwnj;ی دیگری از فقیهان - خصوصاً فقیهان معاصر - &amp;nbsp;به ریشه&amp;zwnj;ها و بنیادهای نزاع فقیهان و فیلسوفان پرداخته و نشان خواهیم داد که چرا فقیهان در برابر فیلسوفان ایستاده و آنان را تکفیر می&amp;zwnj;کردند.&lt;/p&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بیان ساده&amp;zwnj;ی مدعا این بود که محمد رازی- نماد فیلسوفان- در برابر پیامبر گرامی اسلام ایستاده و محصولات عقلی خود را برتر از فرآورده&amp;zwnj;های وحیانی حضرت محمد قلمداد می&amp;zwnj;کند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;هشتم- شیخ بهایی: &lt;/b&gt;شیخ بهائی (۱۰۳۰- ۹۵۳) سخنان تندی علیه فلاسفه بیان کرده است. او فیلسوفان را ریزه خواران سفره&amp;zwnj;ی ارسطو و افلاطون قلمداد می&amp;zwnj;کند. می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ای کـرده به علم مجازی خو&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نشــنیده زعـلم حـقیقی بــو&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;سـرگرم بـه &lt;b&gt;حکـمت یـونانی&lt;/b&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;دلســرد ز &lt;b&gt;حکــمت ایــمانی&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تا کی ز شفاش، شفا طلبی&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;وز کاسه&amp;zwnj;ی زهر، دواطلبی؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تـا چـند چـو نکـبتیان مانی&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بـر ســفره&amp;zwnj;ی چـرکن یـونانی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;سـؤر المـؤمن&amp;quot; فـرموده نـبی&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;از سـور ارسـطو چه می&amp;zwnj;طلبی؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تا چند ز فلسفه ات لافی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;واین یابس و رطب به هم بافی؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;رسوا کردت به میان بشر&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;برهان ثبوت &amp;quot;عقل عشر&amp;quot;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در سر ننهاده بجز بادت&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;برهان &amp;quot;تناهی ابعادت&amp;quot;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تا کی لافی ز &amp;quot;طبیعی دون&amp;quot;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تا کی باشی به رهش مفتون؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;و آن فکر که شد به هیولا صرف&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;صورت نگرفت از آن یک حرف&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تصدیق چه گونه به این بتوان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;که اندر ظلمت، برود الوان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;علمی که مسائل او این است&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بی شبهه، &lt;b&gt;فریب شیاطین است&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تا چند دو اسبه پی اش تازی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تا کی به مطالعه اش نازی؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;واین علم دنی که تورا جان است&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;فضلات فضایل یونان است &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;خود گو تا چند چو خرمگسان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نازی به سر فضلات کسان!&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تا چند ز &lt;b&gt;غایت بی دینی&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;خشت کتبش بر هم چینی؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;اندر پی آن کتب افتاده&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پشتی به کتاب خدا داده&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نی رو به شریعت مصطفوی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نی دل به طریقت مرتضوی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نه بهره ز علم فروع و اصول&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شرمت بادا ز خدا و رسول [۳۴]&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شیخ بهایی &amp;quot;حکمت یونانیان&amp;quot; را در برابر &amp;quot;حکمت ایمانیان&amp;quot; قرار می&amp;zwnj;دهد که همان دین اسلام است. او می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;علم نبود غیر علم عاشقی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مابقی تلبیس ابلیس شقی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;علم فقه و علم تفسیر و حدیث&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;هست تلبیس ابلیس شقی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;زان نگردد بر تو هرگز کشف راز&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;گر بود شاگرد تو صد فخر راز&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;از هیولا تا به کی این گفت و گوی؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;رو به معنی آر و از صورت مگوی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;دل که فارغ شد ز مهر آن نگار&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;سنگ استنجای شیطانش شمار&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;این علوم و این خیالات و صور&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;فضله&amp;zwnj;ی شیطان&lt;/b&gt; بود بر آن حجر&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تو، به غیر از علم عشق ار دل نهی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;سنگ استنجا به شیطان می&amp;zwnj;دهی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شرم بادت، زانکه داری، ای دغل!&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;سنگ استنجای شیطان در بغل&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;لوح دل، از فضله&amp;zwnj;ی شیطان بشوی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ای مدرس! درس عشقی هم بگوی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;چند و چند از &lt;b&gt;حکت یونانیان&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;حکمت ایمانیان&lt;/b&gt; را هم بدان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;دل منور کن به انوار جلی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;چند باشی کاسه لیس بوعلی؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;سرور عالم، شه دنیا و دین&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;سر ممن را شفا گفت ای حزین!&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;سور رسطالیس و سور بوعلی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;کی شفا گفته نبی منجلی[۳۵].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;نهم- ملا محسن فیض کاشانی: &lt;/b&gt;ملا محسن فیض کاشانی (۱۰۹۰- ۱۰۰۶ ه.ق) شاگرد و داماد ملاصدرا است. او به پیروی از غزالی، وقت صرف کردن برای خواندن فلسفه را ناروا می&amp;zwnj;داند. به گمان او راه فلاسفه پر خطر و هلاکت خیز است. فلسفه&amp;zwnj;های موجود، آغشته&amp;zwnj;ی با تحریفات&amp;zwnj;اند. اگر فلسفه دارای معارفی است که به درد جهان پس مرگ می&amp;zwnj;خورد، پیامبر اسلام نکاتی که به آدمیان یاد داده بهتر و کاملتر است. اما اگر معارف فلسفی به درد آخرت نمی&amp;zwnj;خورد، پس به چه دردی می&amp;zwnj;خورد؟ بدین ترتیب برای عموم افراد بهتر است که از فلسفه دوری گزینند: &amp;quot;&lt;b&gt;فالأ ولی الاعراض من علومهم و عدم الخوض فی طریقتهم&lt;/b&gt;&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;اما خواصی که رسوخ در همه&amp;zwnj;ی معارف دینی دارند، آشنایی شان با فلسفه رواست. فیض می&amp;zwnj;گوید غزالی برای عوام به شریعت التزام بورزند و وقت خود را مصروف امور بی فایده نکنند، از سر شفقت و مصلحت فلسفیدن را مذمت کرده است[۳۶].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فیض در پایان عمر ضمن ندامت از فلسفه آموزی پیشین خود در کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;الانصاف&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;سبحان&amp;zwnj; الله&amp;zwnj; عجب&amp;zwnj; دارم&amp;zwnj; از قومی&amp;zwnj; که&amp;zwnj; بهترین&amp;zwnj; پیغمبران&amp;zwnj; را برایشان&amp;zwnj; فرستاده&amp;zwnj;اند به&amp;zwnj; جهت&amp;zwnj; هدایت&amp;zwnj;، و خیر ادیان&amp;zwnj;، ایشان&amp;zwnj; را ارزانی&amp;zwnj; فرمود از روی&amp;zwnj; مرحمت&amp;zwnj; و عنایت&amp;zwnj;، و پیغمبر ایشان&amp;zwnj; کتابی&amp;zwnj; گذاشته&amp;zwnj; و خلیفه&amp;zwnj;&amp;zwnj;ی دانا به&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; کتاب&amp;zwnj; واحداً بعد واحد به&amp;zwnj; جای&amp;zwnj; خود گماشته&amp;zwnj;، به&amp;zwnj; نصّی&amp;zwnj; از جانب&amp;zwnj; حق&amp;zwnj; تا افاضت&amp;zwnj; نور او تا قیام&amp;zwnj; قیامت&amp;zwnj; باقی&amp;zwnj; و تشنگان&amp;zwnj; علم&amp;zwnj; و حکمت&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; قدر حوصله&amp;zwnj; و درجه&amp;zwnj;&amp;zwnj;ی ایمان&amp;zwnj; هر یک&amp;zwnj; ساقی&amp;zwnj; باشد، آن گاه&amp;zwnj; که&amp;zwnj; گفت&amp;zwnj;:&amp;quot;من&amp;zwnj; در میانه&amp;zwnj;&amp;zwnj;ی شما دو گوهر گرانبها باقی&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گذارم&amp;zwnj; که&amp;zwnj; اگر پس&amp;zwnj; از من&amp;zwnj; به&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; دو چنگ&amp;zwnj; زنید، هرگز گمراه&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;شوید، یکی&amp;zwnj; قرآن&amp;zwnj; و دیگر عترت&amp;zwnj; و اهل&amp;zwnj;بیتم&amp;zwnj;&amp;quot;، ایشان&amp;zwnj; التفات&amp;zwnj; به&amp;zwnj; هدایت&amp;zwnj; او نمی&amp;zwnj;نمایند و از پی&amp;zwnj; &lt;b&gt;دریوزگی&amp;zwnj; &lt;/b&gt;علم&amp;zwnj; بر در امم&amp;zwnj; سالفه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گردند و از نم&amp;zwnj; جوی&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; قوم&amp;zwnj; استمداد می&amp;zwnj;جویند و به&amp;zwnj; عقول&amp;zwnj; ناقصه&amp;zwnj;&amp;zwnj;ی خود، استبداد می&amp;zwnj;نمایند...همانا این&amp;zwnj; قوم&amp;zwnj; گمان&amp;zwnj; کرده&amp;zwnj;اند که&amp;zwnj; بعضی&amp;zwnj; از علوم&amp;zwnj; دینیه&amp;zwnj; هست&amp;zwnj; که&amp;zwnj; در قرآن&amp;zwnj; و حدیث&amp;zwnj; یافت&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;شود و از کتب&amp;zwnj; فلاسفه&amp;zwnj; یا متصوفه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;توان&amp;zwnj; دانست&amp;zwnj; و از پی&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; باید رفت&amp;zwnj;. مسکینانه&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;دانند که&amp;zwnj; خلل&amp;zwnj; و قصور نه&amp;zwnj; از جهت&amp;zwnj; حدیث&amp;zwnj; یا قرآن&amp;zwnj; است&amp;zwnj; بلکه&amp;zwnj; خلل&amp;zwnj; در فهم&amp;zwnj; و قصور در درجه&amp;zwnj;ی ایمان&amp;zwnj; ایشان&amp;zwnj; است&amp;zwnj;...و بالجمله&amp;zwnj; طائفه&amp;zwnj;ای&amp;zwnj; واجب&amp;zwnj; و ممکن&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گویند و قومی&amp;zwnj; علت&amp;zwnj; و معلول&amp;zwnj; می&amp;zwnj;نامند و فرقه&amp;zwnj;ای&amp;zwnj; وجود و موجود نام&amp;zwnj; می&amp;zwnj;نهند و من&amp;zwnj; عندی&amp;zwnj; را هرچه&amp;zwnj; خوش&amp;zwnj; آید گوید...و شكّی&amp;zwnj; در این&amp;zwnj; نیست&amp;zwnj; که&amp;zwnj; در محکمات&amp;zwnj; ثقلین&amp;zwnj; از این&amp;zwnj; نوع&amp;zwnj; سخنان&amp;zwnj; که&amp;zwnj; در میان&amp;zwnj; این&amp;zwnj; طوایف&amp;zwnj; متداول&amp;zwnj;، و اصطلاحاتی&amp;zwnj; که&amp;zwnj; بر زبان&amp;zwnj; ایشان&amp;zwnj;، متقاول&amp;zwnj; است&amp;zwnj;، هیچ&amp;zwnj; خبر و اثر نیست&amp;zwnj; و تأویل&amp;zwnj; متشابهات&amp;zwnj;، همه &amp;zwnj;کس&amp;zwnj; را میسّر نه&amp;zwnj; بلکه&amp;zwnj; مخصوص&amp;zwnj; راسخین&amp;zwnj; فی&amp;zwnj;العلم است&amp;zwnj;...&lt;b&gt;نه&amp;zwnj; متکلم&amp;zwnj;&lt;/b&gt; و &lt;b&gt;نه&amp;zwnj; متفلسف&amp;zwnj;&lt;/b&gt; و &lt;b&gt;نه&amp;zwnj; متصوف&lt;/b&gt;&amp;zwnj; و نه&amp;zwnj; متکلف&amp;zwnj;، بلکه&amp;zwnj; &lt;b&gt;مقلد قرآن&amp;zwnj; و حدیث&amp;zwnj; پیغمبر و تابع&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj;بیت&lt;/b&gt; علیهم السلام آن&amp;zwnj; سرور. از سخنان&amp;zwnj; حیرت&amp;zwnj;افزای&amp;zwnj; طوائف&amp;zwnj; اربع&amp;zwnj; ملول&amp;zwnj; و کرانه&amp;zwnj;، و از ماسوای&amp;zwnj; قرآن&amp;zwnj; مجید و حدیث&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj;بیت&amp;zwnj; و آنچه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; این&amp;zwnj; دو آشنا نباشد، بیگانه&amp;zwnj;... من&amp;zwnj; هرچه&amp;zwnj; خوانده&amp;zwnj;ام&amp;zwnj; همه&amp;zwnj; از یاد من&amp;zwnj; برفت&amp;zwnj; الّا حدیث&amp;zwnj; دوست&amp;zwnj; که&amp;zwnj; تکرار می&amp;zwnj;کنم&amp;zwnj;&amp;quot;[۳۷].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;دهم- ملا طاهر شیرازی نجفی قمی: &lt;/b&gt;ملاطاهر قمی (وفات ۱۰۹۸) ، فقیه و متکلم شیعه، از جمله آثارش کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;الفوائد الدینیه فی الرد علی الحمکا و الصوفیه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; است .&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;یازدهم- محمد باقر مجلسی:&lt;/b&gt;ملا محمد باقر مجلسی (۱۱۱۰- ۱۰۳۷ ه.ق)- ملقب به علامه مجلسی- صاحب كتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;بحار الانوار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; از فقیهان نامدار شیعیان است.مجلسی در موارد عدیده فلاسفه را تکفیر کرده است.فیلسوفان را &amp;quot;فلسفه بافان&amp;quot; نام می&amp;zwnj;نهد[۳۸].دلایل فیلسوفان را شبهاتی سست و خرافاتی به شمار آورده[۳۹] و خودشان را نقل کلام بی دین&amp;zwnj;ها و شک آوران راهزن حق و یقین قلمداد کرده است[۴۰]. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;كسی كه به كلمات فلاسفه رجوع كند و اصول مطالبشان را فحص كند، درمی&amp;zwnj;يابد كه اكثر آنها با شرايع پيامبران تطبيق نمی&amp;zwnj;كند. و اگر برخی اصول شرايع و ضروريات اديان به زبان می&amp;zwnj;آورند، &lt;b&gt;فقط از ترس تكفير مؤمنين می&amp;zwnj;باشد كه مبادا به جرم كفر كشته شوند&lt;/b&gt;. فلاسفه به زبان ايمان دارند و دلهايشان تسليم نيست و &lt;b&gt;بيشترشان كافرند&lt;/b&gt;&amp;quot;[۴۱].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مجلسی در &lt;b&gt;&lt;i&gt;بحارالانوار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; نوشته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;هذه الجنایه علی الدین و تشهیر کتب فلاسفه بین المسلمین من بدع خلفاء المعاندین&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مجلسی یکی از بدعت&amp;zwnj;ها و منکرات خلفای جور را این می&amp;zwnj;داند که کتب فلاسفه ترجمه و میان مسلیمن پخش کردند. وقتی آرای فیلسوفان میان مردم رفت، این آرا اختلاف افکن و فسادپرورند. در ادامه می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;مشهور نمودن کتب فلاسفه در ميان مسلمانان از بدعت&amp;zwnj;های خلفای جور دشمن ائمه دين است تا به دين وسيله مردم را از دين و امامان عليهم السلام برگردانند... صفدی در شرح لامية العجم ذکر کرده که چون مأمون عباسی با بعضی از پادشاهان نصاری صلح کرد ـ گمان می&amp;zwnj;برم که پادشاه جزيره&amp;zwnj;ی قبرس باشد ـ از آن&amp;zwnj;ها طلب کرد که مخزن و کتابخانه&amp;zwnj;ی کتب يونان را در اختيار او بگذارند...پادشاه دوستان خصوصی خود را که صاحب رأی نيکو می&amp;zwnj;&amp;zwnj;دانست جمع کرد و با ايشان مشورت نمود، تمامی آن&amp;zwnj;ها رأی دادند که آن کتب را در اختيار مأمون نگذارد و نزد او نفرستد مگر يک نفر از آن&amp;zwnj;ها که گفت اين کتب را نزد ايشان بفرست زيرا اين علوم (يعنی فلسفه) داخل هيچ دولت دينی نشده است مگر آن که آن&amp;zwnj;ها را به فساد کشانيده و اختلاف در بين علمای ايشان ايجاد کرده است... مشهور اين است که اول کسی که کتاب&amp;zwnj;های يونانيان را به زبان عربي ترجمه کرد خالد بن يزيد بن معاويه بود&amp;quot;[۴۲].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;آن گاه به داستان طرح نقشه&amp;zwnj;ی قتل هشام بن حکم- به اتهام طعن بر فلاسفه- پرداخته و می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;إنّهم علیهم السلام ترکوا بیننا أخبارهم فلیس لنا فی هذا الزمان ألاّ التمسّک بأخبارهم واندبّر فی آثارهم ، فترک الناس فی زماننا آثار اهل بیت نبیّهم و استبدّوا بآرائهم، فمنهم من سلک مسلک الحکماء الذین ضلّوا و أضلّوا ، و لم یقروّا بنبی و لم یؤمنوا بکتاب و اعتمدوا علی عقولهم الفاسده و آرائهم الکاسده، فاتخذوهم ائمه و قاده&lt;/b&gt;: حضرات ائمه (ع) (بعد از خودشان) احادیث شان را در میان ما به جا گذاشته&amp;zwnj;اند پس در این زمان برای ما چاره&amp;zwnj;ای نیست مگر این که به احادیث ایشان چنگ زنیم و در آثار و اخبارشان تفکّر و اندیشه کنیم با وجود این، در زمان ما اکثر مردم آثار و اخبار اهل بیت پیغمبرشان را رها نموده و خود رأی شده، پس گروهی از آن&amp;zwnj;ها راه روش و مکتب فلاسفه را برگزیده اند، همان فلاسفه&amp;zwnj;ای که خودشان گمراه شده و دیگران را هم گمراه کرده، و به هیچ پیغمبری اقرار نکرده وبه هیچ کتابی از کتاب&amp;zwnj;های آسمانی ایمان نیاورده اند، و بر عقل&amp;zwnj;های ناقص و نظریات و اندیشه&amp;zwnj;های بی رونق وسست خودشان تکیه کرده اند، پس (گروهی از نادانان نیز) آنان را پیشوای خود قرار داده وبه آن&amp;zwnj;ها اقتدا کرده&amp;zwnj;اند و عقائدشان را از آنها اخذ نموده&amp;zwnj;اند. نصوص صریح و صحیح از امامان معصوم (ع) را از معانی اصلی آن به معانی دیگر توجیه و تأویل می&amp;zwnj;کنند؛ زیرا که این احادیث و نصوص صحیحه با آنچه فیلسوفان بدان معتقدند سازگار نیستند با آن که می&amp;zwnj;بینند که دلیل&amp;zwnj;های فلاسفه و شبهه&amp;zwnj;های آنها مفید ظن وگمان و بلکه مفید وهم نیز نمی&amp;zwnj;باشد بلکه افکارشان مانند تار عنکبوت سست و بی پایه است&amp;quot;[۴۳].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ما فقط به تکفیرها می&amp;zwnj;پردازیم، وگرنه اعمالی که فقیهان نسبت به فیلسوفان انجام داده اند، خود داستان مستقلی است که باید گزارش شود. به عنوان نمونه، حکیم ملامحمدصادق اردستانی (وفات ۱۱۳۴) در میان برف و سرمای زمستان از اصفهان به حکم ملامحمدباقرمجلسی اخراج شد. این تبعید زمستانی، موجب مرگ فرزند خردسال آن فیلسوف در سرمای زمستان شد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;دوازدهم- صاحب حدائق: &lt;/b&gt;شیخ یوسف بحرانی (۱۱۸۶- ۱۱۰۷ ق) گفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;أن الاصحاب (قدس سرّهم) ذهبوا إلی تکفیر الفلاسفه و من یحذوا حذوهم&lt;/b&gt;:اصحاب امامیه به تکفیر فلاسفه و پیروانش معتقد بودند&amp;quot;[۴۴].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;سیزدهم- علامه&amp;zwnj;ی بحرالعلوم: &lt;/b&gt;علامه بحرالعلوم (۱۲۱۲- ۱۱۵۵) در اجازه اش به یکی از شاگردان خود ضمن تأکید بر توجه علمای سابق به احادیث ائمه، خطاب به او می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;ثم خلف من بعدهم خلف اضاعوا الصلوه و اتبعوا الشهوات&lt;/b&gt; که از علم و علما کناره گیری نموده و ویرانی را آبادی جلوه دادند، حساب را فراموش ودر طلب سراب برآمده و ساکن برهوت گشتند وبه خوشی&amp;zwnj;های گذران زمان دل خوش داشتند...از جمله&amp;zwnj;ی اینان کسانی&amp;zwnj;اند که برجهالت برگرفته از &lt;b&gt;سردمداران کفر و گمراهی&lt;/b&gt; - که منکرنبوت ورسالت هستند - حکمت و علم نام نهادند و صاحبان این حکمت و علم دروغین را امام و رهبر خویش گرفتند و اقوال و آراء آنان را اگر چه مخالف نص قرآن بود پذیرفتند و هر آنچه را که آنان بدان قائل نبودند، اگر چه آن عین حق و صواب بود انکار کردند&amp;quot;[۴۵].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;چهاردهم- میرزای قمی: &lt;/b&gt;میرزای قمی (۱۲۳۱- ۱۱۵۱) صاحب &lt;b&gt;&lt;i&gt;قوانین الاصول&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; است. سیدصدرالدین موسوی عاملی صدر اصفهانی درباره&amp;zwnj;ی این کتاب گفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;لیت ابن سینا دری اذ جاء مفتخرا باسم الرئیس بتصنیف القانون ان الاشارات و القانون قد جمعا مع الشفا فی مضامین القوانین: ای کاش ابن سینا که به سبب نگارش کتاب قانون به شیخ الرئیس معروف شد می&amp;zwnj;دانست که کتاب اشارات و قانون و شفا هر سه در مضامین کتاب قوانین الاصول میرزای قمی جمع شده اند&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;میرزای قمی در &lt;b&gt;&lt;i&gt;قوانین می&amp;zwnj;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;والذی جعله الطلّبه فی أمثال زماننا وسیله لانحرافهم عن تحصیل الفقه و اشتغالهم بتحصیل حکمه الیونانیین من المشّائین و الامشراقییّن تمسّکاً بأنّ معرفه الله تعالی مقدّم علی عبادته و طاعته ولایمکن الاّ بتحصیل هذه العلوم، فهو من وساوس الوسواس الخنّاس الذی یوسوس فی صدور الناس. فربّما یصرفون عمرهم جمیعاً فی تحصیل هذه العلوم تمسّکأّ بأنّه من مقدمات الفقه اذالفقه هو العلم بالاحکم الشرّعیه و ذلک یتوقّف علی معرفه الشارع ومالا یتم الواجب الاّ به فهو واجب. حاشا و کلاّ أن یکون ذلک موجباً للمعرفه أو موجباً لمیزیدها أو ممّا یتوقّف معرفه الفقه والشرّع علیها. نعم و قد یصیر موجباً للزندقه والإلحاد و قد یوجب کثره البعد عن ساحه القرب والنّدامه والحسره یوم التناد&lt;/b&gt;: آنچه که طلاب در مثل این زمان&amp;zwnj;ها وسیله برای انحرافشان از تحصیل فقه قرار دادند ومشغول تحصیل حکمت یونانیان - از مشاء واشراق آن - شدند و دلیل شان این است که معرفت خداوند مقدّم برعبادت و اطاعت اوست و آن (یعنی معرفت) هم ممکن نیست مگر با تحصیل این علوم (حکمت یونانیان ) پس از وسوسه&amp;zwnj;های &lt;b&gt;وسواس خنّاس&lt;/b&gt; است که در سینه&amp;zwnj;های مردم وسوسه می&amp;zwnj;کند و چه بسا تمام عمرشان را در تحصیل این علوم صرف می&amp;zwnj;کنند به این دلیل که این علوم از مقدمات فقه است زیرا فقه علم به احکام شرعی است و آن توقف برمعرفت شارع دارد و مقدمه&amp;zwnj;ی واجب هم واجب است، حاشا وکلاً (هرگز) که تحصیل فلسفه موجب معرفت خداوند و یا موجب زیادی معرفت اللّه یا از اموری باشد که معرفت فقه وشرع توقف برآن داشته باشد بلی گاهی &lt;b&gt;(تحصیل فلسفه)موجب زندقه و الحاد می&amp;zwnj;گردد&lt;/b&gt; و گاهی موجب دوری زیادی از ساحت قرب حق تعالی شده و ندامت وحسرت رابه دنبال دارد&amp;quot;[۴۶].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;پانزدهم- ملا احمد نراقی: &lt;/b&gt;ملااحمد نراقی (۱۲۴۴- ۱۱۸۵) در &lt;b&gt;&lt;i&gt;معراج السعاده&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; پس از بیان ضرورت کسب یقین و جزم در اعتقادات می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;و طریق آن[جزم و یقین ] این نیست که به او (مکلف) مناظره وجدل تعلیم شود یا به خواندن کتب کلامی و حکمی [فلسفه] اشتغال نماید و بلکه باید مشغول شود به تلاوت قرآن و تفسیر و خواندن احادیث و فهمیدن آن&amp;zwnj;ها و مواظبت کند به وظایف عبادات و طاعت وبه این سبب روز به روز اعتقاد او قوی تر می&amp;zwnj;گردد...و اعتقاد کسانی که عمر خود را صرف کلام وحکمت متعارفه (فلسفه) نموده و روز و شب را به مجادله ومباحث کلامیه به سر برده اند، مانند ریسمانی است که در مقابل باد آویخته باشد و هر ساعتی آن را به طرفی حرکت دهد. گاهی چنان رود و گاهی چنین، زمانی به شمال میل کند و لحظه&amp;zwnj;ای به یمین، هر چه شنیدند متحرک می&amp;zwnj;شود و به اندک چیزی که به عقل شان رسد متأمل می&amp;zwnj;گردند. و اگر اعتقاد صحیحی داشته باشند همان است که در حال طفولیت اخذ کرده اند&amp;quot;[۴۷].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در بخش دیگری از همین کتاب می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;ونه از اشخاصی باشی که عمر خود را صرف علوم عقلیه نموده و به &lt;b&gt;فضول یونانیان&lt;/b&gt; خود را راضی می&amp;zwnj;کنند و عقول قاصره&amp;zwnj;ی خود را در هر چیزی دلیل و رهبر می&amp;zwnj;دانند و هرچه عقل ناقص ایشان آن را نفهمد طرح یا تأویل می&amp;zwnj;کنند و آیات و اخبار را تا توانند از ظاهر خود صرف می&amp;zwnj;کنند و احکام شریعت نبویه در نزد ایشان مهجور و از تتبع آیات و اخبار دورند، علمای شریعت را مذمّت و بدگویی می&amp;zwnj;کنند و ایشان را به بی فهمی و نادانی نسبت می&amp;zwnj;دهند، ورثه&amp;zwnj;ی انبیا را جاهل و نادان می&amp;zwnj;شمارند و از برای خود که هنوز عقل را از وهم تمیز نداده&amp;zwnj;اند زیرکی و فطانت ثابت می&amp;zwnj;کنند و از این غافل که &lt;b&gt;عقل بی رهنمایی شرع قدم بر نمی&amp;zwnj;تواند داشت وگامی در راه نمی&amp;zwnj;تواند گذاشت&lt;/b&gt;&amp;quot;[۴۸].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نراقی در کتاب شعر خود- &lt;b&gt;&lt;i&gt;مثنوی طاقدیس&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;- نیز از فلاسفه این چنین یاد می&amp;zwnj;کند :&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;آن یکـی گـردید مـحو فـلسفه&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;خـویش را دانـا شـمرده از سـفه&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فکر او تحدید اطـراف و جـهات&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;کـار او تشـریح و حـیوان ونـبات&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ازقدیم آمد جهان یا حادث است&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;آفریدش با غرض یا عـابث است&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بـی خــبر لیکـن ز احکـام اله&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مـی ندانـد جـز نـمازی گـاهگاه&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;صـد دلیـل آرد پی تجدید نـفس&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نفس او لیکن به صد زنجیر حبس&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ای خیو برروی عـلم و فـضل تو&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;تیره صد مدرس بـود از جـهل تـو&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;وهـم و پـنداری به هم آمـیختی&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شـوری از چـون و چـرا آمـیختی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نامش اسـتدلال وبرهان سـاختی&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مـهر چـیدی و قـماری بـاختی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;صـد خطا زین گونه استدلال&amp;zwnj;ها&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;دیـده&amp;zwnj;ای در مـاه&amp;zwnj;ها و سـال ها[۴۹].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;شانزدهم- صاحب جواهر:&lt;/b&gt; شیخ حسن نجفی (۱۲۶۶- ۱۲۰۰) ، صاحب &lt;b&gt;&lt;i&gt;جواهرالکلام&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; به فردی که در دستش کتابی فلسفی داشت، می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;به خدا سوگند حضرت محمد صلی الله عليه وآله وسلم جز برای ابطال اين خرافات و مزخرفات از جانب خداوند مبعوث نشده است&amp;quot;[۵۰].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;هفدهم- شیخ انصاری:&lt;/b&gt;شیخ انصاری (۱۲۸۱- ۱۲۱۴) در کتاب طهارت نوشته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;إن السیره المستمرّه من الاصحاب (قدس سرّهم) فی تکفیر الحکماء المنکرین بعض ضروریات&lt;/b&gt;: سیره&amp;zwnj;ی مستمر اصحاب برتکفیر فلاسفه که منکر بعض ضروریات&amp;zwnj;اند بوده است&amp;quot;[۵۱].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شیخ انصاری تأمل عقلانی در احکام شرعی را به رسمیت نمی&amp;zwnj;شناسد، چه رسد به اصول عقاید. به گمان او، دقت&amp;zwnj;های عقلانی در اعتقادات دینی، آدمی را در معرض &amp;quot;هلاکت ابدی&amp;quot; و &amp;quot;عذاب همیشگی&amp;quot; قرار می&amp;zwnj;دهد. می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;واجب تر از فرو نرفتن در مطالب و استدلالات عقلی برای کشف و استنباط احکام فرعی شرعی، فرو نرفتن در مطالب عقلی نظری برای دریافت مسائل اصول دین است ؛ زیرا این شیوه موجب واقع شدن در معرض &lt;b&gt;هلاکت ابدی&lt;/b&gt; و &lt;b&gt;عذاب همیشگی&lt;/b&gt; است و ائمه معصومین (ع) نیز در روایات مربوط به نهی از فرو رفتن در مسئله&amp;zwnj;ی قضا وقدر نسبت به این خطر هشدار دادند&amp;quot;[۵۲].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;هجدهم- محمد رضا مظفر: &lt;/b&gt;آیه اللّه محمد رضا مظفر (۱۳۸۳- ۱۳۲۲ ) به تفاوت&amp;zwnj;های فلسفه و کلام می&amp;zwnj;پردازد. می&amp;zwnj;گوید که علم کلام در خدمت دین است، اما فلسفه، عقل مستقل از دین است، نه تابع دین. به همین دلیل مشاهده می&amp;zwnj;کنیم که آموزه&amp;zwnj;های فلسفی با فرآورده&amp;zwnj;های نقلی و شرعی تعارض دارند. فیلسوف تابع استدلال است و نگران آن نیست که نتایج کارش ناقض آموزه&amp;zwnj;های وحیانی باشد.ورود فلسفه&amp;zwnj;ی یونانی به جهان اسلام، موجب فساد فکری مسلمین شد.ائمه&amp;zwnj;ی شیعیان در برابر این عوامل گمراهی (فلاسفه) و بدعت گزاران در دین ایستادند.می نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;فرق فلسفه با علم کلام این است که علم کلام را مسلمانان برای دفاع از دین وضع کردند، اما فلسفه تعهّد دینی ندارد و مسیر معینی را دنبال نکرده و از دین خاصی تبعیت نمی&amp;zwnj;کند...این بی تعهّدی، فیلسوف را برآن می&amp;zwnj;دارد که نظری را ابراز کند که با شریعت اسلامی ویا ظاهر آن مغایرت دارد. این تفاسیر، واقعاً و یا در نظر مسلمین، &lt;b&gt;موجب خروج از دین می&amp;zwnj;شود&lt;/b&gt;. فیلسوف از این که برهانی را که دین و یا مذهبی مطرح کرده است نقض کند ابائی ندارد وقتی که فلسفه یونانی گسترش پیدا کرد، برخی از اعراب کور و کورانه و سطحی از آن تقلید کردند و موجب &lt;b&gt;فساد در افکار مسلمین&lt;/b&gt; شدند و مسلمین احساس کردند که از جانب فلسفه یونانی مورد هجوم واقع شدند... ائمه ما با &lt;b&gt;مبارزه&amp;zwnj;ی با بدعت گذاران&lt;/b&gt; &lt;b&gt;در دین&lt;/b&gt; و &lt;b&gt;عوامل گمراهی مردم&lt;/b&gt;، عقاید اسلامی را در برابر امواج فکری یونانی مخصوصاً نگه داشتند. فلسفه ناتوان تر از آن است که بتواند به ما عقیده&amp;zwnj;ی صاف و صحیح وخالص ببخشد. لازم نیست که ما به شیوه&amp;zwnj;ی فلاسفه به خداوند معتقد باشیم؛ زیرا که خداوند ما را بر چنین چیزی مکلف نکرده است...کسی که عقیده&amp;zwnj;ای ندارد و می&amp;zwnj;خواهد در اعتقاداتش به چیزی چون فلسفه تکیه کند، همانند کسی است که مشت برآهن سرد می&amp;zwnj;کوبد&amp;quot;[۵۳].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;نوزدهم- آیت الله بروجردی:&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;از فقیه&amp;zwnj; فرزانه&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; آیت&amp;zwnj;الله&amp;zwnj; آقا سید موسی&amp;zwnj; شبیری&amp;zwnj; زنجانی&amp;zwnj; شنیدم&amp;zwnj; که&amp;zwnj; گفت&amp;zwnj;:&amp;quot;آیت&amp;zwnj;الله&amp;zwnj; بروجردی&amp;zwnj; می&amp;zwnj;خواست&amp;zwnj; علوم&amp;zwnj; معقول&amp;zwnj; [فلسفه&amp;zwnj;] را شبه&amp;zwnj; تحریمی&amp;zwnj; کند و آقای&amp;zwnj; آقا سید محمد رضا سعیدی&amp;zwnj; [شهید آیت&amp;zwnj;الله&amp;zwnj; سعیدی&amp;zwnj;] که&amp;zwnj; با فلسفه&amp;zwnj; مخالف&amp;zwnj; بود، در اطراف&amp;zwnj; این&amp;zwnj; موضوع&amp;zwnj; نزد آیت&amp;zwnj;الله&amp;zwnj; بروجردی&amp;zwnj; فعالیت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;کرد، اما وساطت&amp;zwnj; آقای&amp;zwnj; بهبهانی&amp;zwnj; و دیگر آقایان&amp;zwnj; از عملی&amp;zwnj; شدن&amp;zwnj; این&amp;zwnj; کار جلوگیری&amp;zwnj; نمود&amp;quot;. مخالفت&amp;zwnj; مرحوم&amp;zwnj; آیت&amp;zwnj;الله&amp;zwnj; بروجردی&amp;zwnj; با تدریس&amp;zwnj; فلسفه&amp;zwnj; در حوزه قم&amp;zwnj; مشهور و مسلّم&amp;zwnj; است&amp;zwnj; و این&amp;zwnj; مخالفت&amp;zwnj; چه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; صورت&amp;zwnj; نهی&amp;zwnj; صریح&amp;zwnj; و چه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; صورت&amp;zwnj; اظهار نارضایتی&amp;zwnj; از طرف&amp;zwnj; ایشان&amp;zwnj; بروز کرده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;...مرحوم&amp;zwnj; آیت&amp;zwnj;الله&amp;zwnj; بروجردی&amp;zwnj; از ادامه&amp;zwnj;ی چاپ&amp;zwnj; تعلیقه&amp;zwnj;ی علامه&amp;zwnj; طباطبایی بر &lt;b&gt;&lt;i&gt;بحارالانوا&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;ر مجلسی&amp;zwnj; جلوگیری&amp;zwnj; کردند.&amp;quot;[۵۴].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;وقتی علامه&amp;zwnj;&amp;zwnj;ی طباطبایی&amp;zwnj; نگارش&amp;zwnj; تعلیقاتی&amp;zwnj; بر &lt;b&gt;&lt;i&gt;بحارالانوار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; را آغاز کرد و خبر آن به آیت الله بروجردی رسید، او از آیت الله منتظری خواست که شهریه&amp;zwnj;ی طلابی که در درس&amp;zwnj;های وی حاضر می&amp;zwnj;شوند را قطع کند. آیت الله منتظری به ایت الله بروجردی می&amp;zwnj;گوید که نمی&amp;zwnj;توان شهریه&amp;zwnj;ی طلاب را قطع کرد. شما اجازه دهید تا با ایشان صحبت کنیم و مسئله را به گونه&amp;zwnj;ای حل نمائیم. آیت الله منتظری با علامه&amp;zwnj;ی طباطبایی گفت و گو کرده و به وی می&amp;zwnj;گوید برای این که آقایان ساکت شوند، فعلا شما از تدریس فلسفه&amp;zwnj;ی ملاصدرا خودداری کنید. بدین ترتیب، کار تعلیقیه نویسی ناقدانه بر &lt;b&gt;&lt;i&gt;بحارالانوار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; نیز پایان گرفت.آیت الله منتظری از فقیهان مدافع فلسفه- خصوصاً فلسفه&amp;zwnj;ی صدرایی- بود و خود نیز آن فلسفه را تدریس کرده بود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;بیستم- آیت الله خویی:&lt;/b&gt; آیه الله خوئی (۱۴۱۳- ۱۳۱۷ق) می&amp;zwnj;گوید که ورود فلسفه&amp;zwnj;ی یونانی به جهان اسلام باعث اختلاف میان مسلمین و تکفیر و قتل و کشتار شد. خون&amp;zwnj;های بی گناه بسیاری ریخته شد. می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;احدی از مسلمین در این مطلب تردید نداشت که کلامی که خداوند بر پیامبر اکرم (ص)نازل کرده است، برهانی بر نبوت او و راهنمای امت است و احدی نیز تردید نداشت که &amp;quot;متکلم&amp;quot; یکی از صفات ثبوتیه خداوند است که از آن به عنوان صفات جمالیه یاد می&amp;zwnj;شود خداوند نیز در قرآن خویش را به این صفت توصیف کرد : &lt;b&gt;و کلم اللّه موسی تکلیماً&lt;/b&gt; همه&amp;zwnj;ی مسلمانان بر این باور بودند و کمترین اختلافی بر این موضوع نداشتند و تا آن که &lt;b&gt;فلسفه&amp;zwnj;ی یونان&lt;/b&gt; در میان آنان وارد شد و آنان را به فرقه&amp;zwnj;های گوناگون تقسیم کرد و هر فرقه به تکفیر دیگری پرداخت، تا آن جا که بر درگیری و کشتار یکدیگر منجر شد. از این رهگذر چه آبروهای محترمی که هتک شد و چه خون&amp;zwnj;های بی گناهی که ریخته شد در حالی که قاتل و مقتول هر دو معتقد به توحید و رسالت و معاد بودند و...ای کاش می&amp;zwnj;دانستم که آنان که موجب بروز چنین اختلافاتی بین مسلمین شدند، چه عذری دارند و پاسخ خداوند را در قیامت چه خواهند داد؟ &lt;b&gt;انا اللّه وانا الیه راجعون&lt;/b&gt;&amp;quot;[۵۵].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;آنچه آیت الله خویی بدان توجه نمی&amp;zwnj;کند این است که فقیهان شمشیر تکفیر را از غلاف بیرون کشیده و این و آن را تکفیر و به قتل رساندند. هر معرفتی، اختلاف انگیز است. مگر قرآن و سنت معتبر میان مسلمین ایجاد اختلاف نکرده اند؟ آیا علمی وجود دارد که همه در آن یک گونه بیندیشند و آرای یکسانی داشته باشند؟ تکفیرگری کار فقیهان است که خود را وارث انبیأ و مفسر رسمی دین قلمداد می&amp;zwnj;کنند.آیت الله خویی در پاسخ استفتایی درباره&amp;zwnj;ی فلسفه نوشته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;برای ما روشن نشده که بعضی چیزها متوقف باشد بر آموختن فلسفه بلکه در خلال اصول دین و اصول فقه به مقداری که لازم است به آن اشاره کرده&amp;zwnj;اند . و اگر می&amp;zwnj;ترسد که بر اثر آموختن آن گمراه شود حرام است و اگر نه فی حد نفسه مانعی ندارد والله العالم&amp;quot; (صراط النجاة، ج۱، س۱۲۹۱).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;بیست و یکم-آيت الله وحيد خراسانی&lt;/b&gt; :&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;عرفان پيش من است، همه مولوی را می&amp;zwnj;خواهی پيش من است، هر جا را می&amp;zwnj;خواهی برايت بگويم، فلسفه را بخواهی از اول &lt;b&gt;&lt;i&gt;اسفار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; تا آخر، از هر جا بگويی از اول مفهوم وجود تا آخر مباحث طبيعيات برايت بگويم، اما &lt;b&gt;همه کشک است&lt;/b&gt;، هر چه هست در قرآن و روايات است&amp;quot;[۵۶].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;آیت الله وحید خراسانی در سخنرانی خود به مناسبت شهادت امام صادق (ع) گفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;ما امام صادق (ع) را نشناختیم ؛ اگر جعفر بن محمد (ع)را می&amp;zwnj;شناختیم دنبال این و آن نمی&amp;zwnj;رفتیم . قی کرده&amp;zwnj;های فلاسفه یونان را نشخوار نمی&amp;zwnj;کردیم . زباله&amp;zwnj;های عرفات اکسلوفان را هضم نمی&amp;zwnj;کردیم ، خواه ناخواه واماندیم و بیچاره شدیم و از این اقیانوس معرفت محروم شدیم&amp;quot;[۵۷].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;بیست و دوم- نتیجه &lt;/b&gt;:در آغاز نکاتی پیرامون فلسفه گفته شد. اینک با چند نکته به این مقاله پایان می&amp;zwnj;دهیم:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۱-۲۲- &lt;/b&gt;از وقتی فلسفه تفسیر علی و ماهوی عالم هستی را آغاز کرد، بذرهای سکولاریسم در اذهان آدمیان کاشته شد.از آن به بعد ماهیات/طبایع/واقعیات و روابط ذاتی میان آنها جانشین خدایان شد.طبیعت و ماهیت ربطی به خداوند ندارد. به تعبیر فیلسوفان مسلمان، خداوند جعل وجود می&amp;zwnj;کند، نه جعل ماهیت.خداوند به ماهیات وجود می&amp;zwnj;بخشد، نه آن که اقتضاهای ذاتی ماهیات را به آنها ببخشد.لئو اشترواس به نقل از ارسطو آورده است که پیشینیان از خدایان سخن می&amp;zwnj;گفتند، اما نخستین فیلسوفان کسانی بودند که طبیعت را جانشین خدایان کردند:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;ارسطو نخستین فیلسوفان را &amp;quot;کسانی که در باب طبیعت سخن می&amp;zwnj;گویند&amp;quot; می&amp;zwnj;نامید و می&amp;zwnj;گفت که اینان با پیشینیانشان که &amp;quot;در باب خدایان سخن می&amp;zwnj;گفتند&amp;quot; فرق دارند...تا زمانی که بشر به فکرت&amp;nbsp;&lt;b&gt;طبیعت&lt;/b&gt;&amp;nbsp;نرسیده است مفهوم حقوق طبیعی هم ناچار غایب است. کشف&amp;nbsp;&lt;b&gt;طبیعت&lt;/b&gt;&amp;nbsp;کار فیلسوف است. آنجا که فلسفه وجود ندارد، حقوق طبیعی هم شناخته نیست؛ &lt;b&gt;&lt;i&gt;عهد قدیم&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;که می&amp;zwnj;شود گفت اصل موضوعه&amp;zwnj;ی بنیادینش نفی ضمنی فلسفه است، &amp;quot;&lt;b&gt;طبیعت&lt;/b&gt;&amp;quot; نمی&amp;zwnj;شناسد؛ واژه&amp;zwnj;ی عبری مربوط به طبیعت حتی در تورات عبرانی وجود ندارد. بدیهی است که واژه&amp;zwnj;هایی چون &amp;quot;آسمان و زمین&amp;quot; بیانگر همان واقعیتی که در مفهوم &amp;quot;طبیعت&amp;quot; نهفته است نیستند.&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;i&gt;عهد قدیم&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;از حقوق طبیعی بی خبر است چرا که طبیعت را نمی&amp;zwnj;شناسد و کشف طبیعت مقدم بر کشف حقوق طبیعی است. پس فلسفه از فلسفه&amp;zwnj;ی سیاسی کهن تر است&amp;quot;[۵۸].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ابوعلی سینا هم می&amp;zwnj;گفت که خداوند زردآلو را زردآلو نکرده است.این نوع تفاسیر، نقش خداوند را تا حدود زیادی از جهان حذف کرد.بوعلی به اقتفای ارسطو ماهیت گرا (&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;essentialist)&lt;/span&gt;&amp;nbsp;بود، اما طبیعت (&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;nature)&lt;/span&gt;&amp;nbsp;را نباید با ماهیت یکی گرفت.فیلسوف حتی اگر ماهیت گرا نباشد، با تحلیلی که از عالم ارائه می&amp;zwnj;کند، نقش خداوند را از جهان حذف یا به شدت کاهش می&amp;zwnj;دهد.به تعبیر دیگر، سخن گفتن از واقعیت، و مدعای وجود اوصاف ذاتی و روابط ضروری میان پدیده&amp;zwnj;های عالم، خداوند را از جهان حذف می&amp;zwnj;کند. یعنی موجودات جهان خارج دارای اوصافی ذاتی و روابطی ضروری هستند که مستقل از خداوند است و خداوند هم قادر به سلب اوصاف ذاتی و روابط ضروری میان آنها نیست.گام بعد هم این بود که عقل آدمی، مستقل از وحی و شرع، قادر به شناخت این اوصاف و روابط ضروری میان پدیدهاست (به تعبیر فیلسوفان مسلمان، جهان هستی ثبوتاً و اثباتاً دینی نیست. به تعبیر امروزیان، اولی بحثی متافیزیکی و دومی بحثی معرفت شناختی است).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;این جهان (جهان فیلسوفان) با جهان متون مقدس (قرآن و سنت معتبر نبوی) تفاوت دارد. جهانی که قرآن می&amp;zwnj;شناساند، جهانی است که خداوند هر لحظه در آن در حال دخالت مستقیم است. در جنگ&amp;zwnj;ها شرکت می&amp;zwnj;کند، تیراندازی می&amp;zwnj;کند، با آدمیان وارد گفت و گو می&amp;zwnj;شود. به عنوان نمونه، اگر به فلسفه&amp;zwnj;های متافیزیکی فیلسوفان مسلمان بنگرید، دعا در آن جایی ندارد.آن نظام خودبنیاد نیازی به دعا و نیایش ندارد.اما در نظام دینی گفته می&amp;zwnj;شود:&amp;quot;&lt;b&gt;فاذکرونی اذکروکم&lt;/b&gt;:پس مرا یاد کنید تا شما را یاد کنم&amp;quot; (بقره، ۱۵۲).&amp;quot;و چون بندگانم درباره&amp;zwnj;ی من از تو پرسش کنند[بگو]من نزدیکم و چون بخواندم دعای دعاکننده را اجابت می&amp;zwnj;کنم&amp;quot; (بقره، ۱۸۶).مدلل کردن این مدعیات در آن نظام ها، کاری به غایت دشوار است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۲-۲۲- &lt;/b&gt;منقول است که امام فخز رازی (۶۰۶- ۵۴۴) پس از نقل حدیث و روایت از پیامبر گرامی اسلام گفته بود: &amp;quot;&lt;b&gt;محمد تازی می&amp;zwnj;گوید فلان، اما محمد رازی می&amp;zwnj;گوید بهمان&lt;/b&gt;&amp;quot;. این همان خیره سری ای است که محدثان و فقیهان بر نمی&amp;zwnj;تابیدند. شمس تبریزی هم تاب تحمل چنین سخنانی را نداشت.می گفت:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;فخر رازی چه زهره داشت که گفت: محمد تازی چنين می&amp;zwnj;گويد و محمد رازی چنين می&amp;zwnj;گويد! اين مرتد وقت نباشد؟ اين کافر مطلق نبود! ؟ مگر توبه کند&amp;quot;[۵۹].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شمس تبریزی در جای دیگری از &lt;b&gt;&lt;i&gt;مقالات&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; گفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;اگر این معنی&amp;zwnj;ها و بحث بشایستی ادراک کردن، پس خاک عالم بر سر ببایستی کردن ابایزید را و جنید را حسرت فخر رازی، که او را صد سال شاگردی بایستی کردن. گویند: هزار تا کاغذ تصنیف کرده است فخر رازی در تفسیر قرآن، بعضی گویند پانصد تا کاغذ، [اما] صد هزار فخر رازی در گرد راه ابایزید نرسد، و چون حلقه بر در باشد&amp;quot;[۶۰].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شمس هم نمی&amp;zwnj;توانست این نوع خرورزی را تحمل نماید. می&amp;zwnj;گفت:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;می آمدند به خدمت اين شهاب در دمشق و هزار معقول می&amp;zwnj;شنيدند، فايده می&amp;zwnj;گرفتند ، سجود می&amp;zwnj;کردند .&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;برون می&amp;zwnj;آمدند و می&amp;zwnj;گفتند :فلسفی است ، الفيلسوف دانا به همه چيز .من آن را از کتاب محو کردم ، گفتم:آن خداست که داناست به همه چيز ! نبشتم : الفيلسوف دانا به چيز&amp;zwnj;های بسيار! قيامت را منکر بودی .&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;گفت: مگر فلک از سير باز ايستد! &amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شمس که این چنین به فخر رازی می&amp;zwnj;تازد، خود در مفالات گفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;مرا رساله&amp;zwnj;ی محمد رسول الله سود ندارد، مرا رساله&amp;zwnj;ی خود باید. اگر هزار رساله بخوانم که تاریکتر شوم. خداست که خداست. هر که مخلوق بود خدا نبود، نه محمد نه غیر محمد&lt;/b&gt;&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;امام فخررازی، فقیه شافعی و متکلم اشعری، شیری بود که در هیچ قفسی نمی&amp;zwnj;گنجید.بی جهت نبود که او را &amp;quot;امام المشککین&amp;quot; نام نهاده&amp;zwnj;اند. حتی عارفی چون مولوی هم با چنین فلسفه ورزی ای مخالف بود، اگرچه از موضع عاشقانه. می&amp;zwnj;گفت:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;صد هزاران ز اهل تقلید و نشان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;افکندشان نیم وهمی در گمان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;که بظن تقلید و استدلالشان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;قایمست و جمله پر و بالشان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شبهه&amp;zwnj;ای انگیزد آن شیطان دون&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;درفتند این جمله کوران سرنگون&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پای استدلالیان چوبین بود&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پای چوبین سخت بی تمکین بود&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;(مثنوی، دفتر اول، ابیات: ۲۱۳۳- ۲۱۳۰).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;اندرین ره گر خرد ره بین بدی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فخررازی رازدار دین شدی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;با چنین عیب و نکالش ای عجب&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فخر دین خواهد که گویندش لقب&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;دستورالعمل مولوی در برابر چنین عقلانیتی روشن بود. می&amp;zwnj;گفت:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;عقل قربان کن بپیش مصطفی&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;حسبی الله گو که الله ام کفی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;خویش ابله کن تبع می&amp;zwnj;رو سپس&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;رستگی زین ابلهی یابی و بس&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;اکثر اهل الجنه البله&amp;zwnj;ای پسر&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بهر این گفتست سلطان البشر&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;(مثنوی، دفتر چهارم، ابیات ۱۴۰۷ و ۱۴۱۸ و ۱۴۱۹).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شاید این سخن-&amp;quot;&lt;b&gt;محمد تازی می&amp;zwnj;گوید فلان، اما محمد رازی می&amp;zwnj;گوید بهمان&lt;/b&gt;&amp;quot;- از امام فخر رازی نباشد، اما به هر جهت، او سخنانی بر زبان رانده است که حتی بزرگان وسیع المشربی چون شمس و مولوی هم بر نمی&amp;zwnj;تابیدند. فخر رازی در برخی از آثارش، تصویر یک عقل گرای جازم را از خود به نمایش می&amp;zwnj;گذارد. وی حجیت نقل را رد کرده و همه&amp;zwnj;ی نقلیات (کتاب و سنت) و نبوت را بدون دلیل عقلی نامعتبر به شمار آورده است. چون استناد به کتاب و سنت متوقف بر اثبات صدق نبوت مدعی پیامبری است، و این کار عقل است. توسل به نقل برای اثبات نقل، مستلزم دور و تسلسل است. او در کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;البراهین در علم کلام&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;پیش از آن که در مطلوب شروع کنیم بباید دانستن که دلیل از سه قسم بیرون نبود: یا عقلی محض باشد یا نقلی محض یا مرکب باشد از مقدماتی که بعضی عقلی و بعضی سمعی باشد. اما آنچه عقلی محض باشد یا همه&amp;zwnj;ی مقدمات آن یقینی بود یا همه ظنی بود یا بعضی یقینی بود و بعضی ظنی بود.اگر همه&amp;zwnj;ی مقدمات یقینی بود، نتیجه هم یقینی بود، زیرا آنچه لازمه&amp;zwnj;ی مقدمات حقه&amp;zwnj;ی یقینی است ناچار باید یقینی بوده باشد. ولی اگر همه&amp;zwnj;ی مقدمات ظنی بود یا بعضی یقینی بود و بعضی ظنی، نتیجه نیز ظنی خواهد بود، زیرا فرع هرگز قوی تر از اصل نیست. به این ترتیب هنگامی که همه&amp;zwnj;ی اجزاء یک اصل و یا برخی از اجزاء آن ظنی بوده باشد، ناچار فرع به ظنی بودن سزاوارتر خواهد بود. اما آن دلائل که سمعی محض باشد، این خود محال است، زیرا که &lt;b&gt;صحت استدلال به آیه یا خبر، موقوف است بر صحت نبوت، لیکن صحت نبوت، اثبات نتوان کردن به دلیل سمعی والا دور لازم آید، بلکه اثبات آن به مقدمات عقلی توان کردن&lt;/b&gt;. پس آن دلائل عقلی که مثبت نبوت بود، جزیی از آن دلیل سمعی بود فی الحقیقه، اگر چه در وقت استدلال به زبان نگویند. &lt;b&gt;پس معلوم سمعی محض محال باشد&lt;/b&gt;، اما آنچه مرکب باشد از مقدماتی که بعضی سمعی باشد و بعضی عقلی، بسیار باشد و چون این معلوم شد، گوییم عقلا را خلاف است در آنچه دلیل سمعی، مفید یقین باشد یا نه. قومی گویند دلیل سمعی البته مفید یقین نبود، زیرا دلیل سمعی موقوف است بر ده مقدمه که هر یک از آنها ظنی است و هر چه موقوف باشد بر ظنی، خود آن هم ظنی باشد.بیان آن که دلیل سمعی موقوف است برده مقدمه&amp;zwnj;ی ظنی بدین ترتیب قابل ذکر است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه&amp;zwnj;ی نخست آن است که دلیل سمعی، موقوف است بر معرفت لغات. و نقل لغات، بر سبیل آحاد است، زیرا راوی آن لغت ها، علمای آن لغت اند، چون خلیل و اصمعی و ابوعبیده و ابن الاعرابی و به اتفاق مردم آن قوم معصوم نیستند. و روایت آحاد، از قومی که معصوم نباشند مفید یقین نبود، بلکه مفید ظن بود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه&amp;zwnj;ی دوم آن است که تمسک به دلیل لفظی، موقوف است بر صحت نوح، زیرا اختلاف اعراب الفاظ ، سبب اختلاف معانی بود و منقسم است بر اصول نحو و فروع آن، و اصول نحو منقول است به روایت آحاد. با آنکه کوفیان در اکثر مواضع، تکذیب روایت بصریان کنند و بصریان تکذیب روایت کوفیان کنند، اما تفاریع نحو، مثبت است به دلائل سخت ضعیف و چون تمسک به دلائل سمعی موقوف باشد بر نحو و درست شد که اصول و فروع نحو، ظنی است. پس مقصود حاصل شد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه&amp;zwnj;ی سوم آن است که تمسک به دلائل لفظی، موقوف است بر نفی اشتراک، زیرا که بر تقدیر وقوع اشتراک روا بود که مراد از این آیه و از این خبر نه آن معنی باشد که ما تعیین کرده ایم، بلکه مراد معنی دیگر بود. پس تعیین این یک معنی موقوف بر نفی اشتراک، خود یک معنی ظنی است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه&amp;zwnj;ی چهارم آن است که تمسک به دلائل لفظی موقوف است به آنچه آن را به عنوان یک اصل حمل لفظ بر حقیقت می&amp;zwnj;نامند. زیرا اگر این اصل مقرر نبود، روا نباشد که مراد از این لفظ ، این باشد که حقیقت است، بلکه آن بود که مجاز است، و چون مجازات پیوسته بسیار و فراوان است، پس هیچ معنی متعین نشود ، لیکن این که گفته اند: اصل در کلام، حمل بر حقیقت کردن است، خود یک مقدمه&amp;zwnj;ی ظنی بشمار می&amp;zwnj;آید.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه&amp;zwnj;ی پنجم، تمسک به دلائل لفظی موقوف است بر نفی حذف و اضمار. زیرا اگر حذف و اضمار جایز باشد، روا بود که نفی، اثبات باشد و اثبات نفی. لیکن حذف در قرآن بسیار است که در آیه شریفه آمده: &lt;b&gt;لا اقسم بیوم القیمه&lt;/b&gt; (قیامت، ۱) و اکثر مفسران حذف کلمه&amp;zwnj;ی &lt;b&gt;لا&lt;/b&gt; کند و نیز در قرآن آمده است: &lt;b&gt;ما منعک ان تسجد&lt;/b&gt; (ص ، ۷۵) که در اینجا نیز برخی از مفسران کلمه&amp;zwnj;ی &lt;b&gt;لا&lt;/b&gt; را زائد دانسته&amp;zwnj;اند. پس چون از حذف و اضمار نفی اثبات و اثبات نفی می&amp;zwnj;شود، می&amp;zwnj;توان گفت جمله دلائل سمعی ظنی بود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه&amp;zwnj;ی ششم، آن است که معانی سخن به سبب تقدیم و تأخیر، متغیر شود و تقدیم و تأخیر در قرآن و اخبار بسیار فرض کرده می&amp;zwnj;شود. پس نفی آن مظنون بود نه مقطوع.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه&amp;zwnj;ی هفتم، شرط تمسک به عمومات قرآن و اخبار، عدم مخصص است زیرا که بر آن تقدیر که ، مخصص در محل نزاع موجود بوده، دلیل باقی نمی&amp;zwnj;ماند؛ زیرا که عدم مخصص مظنون بود نه مقطوع. چون آنچه در وسع عاقل باشد، آن باشد که بجوید تا هیچ مخصص هست یا نه و چون بعد از تأمل تمام نیابد، حکم کند به عدم مخصص و عدم العلم بالشیء لایفید العلم بعدم الشیء، بلکه فقط ظن ضعیف حاصل شود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه&amp;zwnj;ی هشتم، تمسک به دلائل سمعیه در اثبات احکامی که قابل نسخ بود، آن است که ناسخ، طاری نشده باشد. لیکن عدم ناسخ، مظنون باشد نه مقطوع. چنانکه در نفی مخصص تقریر کردیم.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه&amp;zwnj;ی نهم، شرط تمسک به دلائل سمعی آن است که دلیل دیگر سمعی معارض آن نبود. زیرا اگر معارض داشته باشد، ناچار باید به مرجحات مراجعه شود که این امر نیز مفید مظنه خواهد بود. از سوی دیگر می&amp;zwnj;دانیم که عدم معارض مظنون است نه مقطوع.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مقدمه دهم، &lt;b&gt;شرط تمسک به دلائل سمعی، عدم معارض عقلی قاطع است. زیرا در صورتی که فرض شود که یک دلیل عقلی قاطع، معارض دلیل سمعی است، ناچار باید دست از ظاهر دلیل سمعی برداشت و در این هنگام از دلیل بودن، خارج می&amp;zwnj;گردد. &lt;/b&gt;لکن عدم معارض عقلی، قاطع مظنون است نه مقطوع؛ زیرا نهایت امر این است که انسان به وجود معارض عقلی عالم نیست، ولی علم نداشتن نسبت به عدم معارض عقلی، مستلزم علم به عدم معارض نیست. پس پیدا شد که دلائل سمعی، موقوف است بر این ده مقدمه&amp;zwnj;ی ظنی و آنچه بر یک امر ظنی موقوف است ناچار ظنی خواهد بود&amp;quot;[۶۱].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بدین ترتیب روشن می&amp;zwnj;شود که هرگاه ظواهر کتاب و سنت معتبر با عقل تعارض داشت، باید جانب عقل را گرفت و فرآورده&amp;zwnj;های نقلی را تأویل کرد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;سخن بر سر این بود که فیلسوف کسی است که مدعی است من فقط و فقط تابع استدلال هستم، نه هیچ امر دیگری.این نوع عقل گرایی به هیچ وجه مقبول محدثان و فقیهان و متکلمان و عارفان مسلمان نبود. هر یک به گونه&amp;zwnj;ای به نزاع با چنین عقلی برخاستند. آنان مدعی بودند که چنین عقلی مورد تأیید شارع نیست. عقل در قرآن، همان گونه که علی بن ابی طالب و محمد عابد الجابری گفته اند، به معنای &amp;quot;حفظ التجارب&amp;quot; است، نه نیروی استدلالی که خود و فرآورده هایش نیز مورد تأیید باشد (&amp;quot;&lt;b&gt;والعقل حفظ التجارب&lt;/b&gt;&amp;quot;، نهج البلاغه شهیدی، نامه ۳۱ ، ص ۳۰۵). به تعبیر دیگر، عقلی مقبول دین است که نتیجه&amp;zwnj;ی آن موید آموزه&amp;zwnj;های نقلی باشد. اما اگر نتایج فرایند عقلی، برخلاف فرآورده&amp;zwnj;های نقلی باشد، مطرود است. مگر علی بن ابی طالب درباره&amp;zwnj;ی برخی مسائل فلسفی نگفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;[و سئل عن القدر فقال:]. &lt;b&gt;طریق مظلم فلا نسلکوه، و بحر عمیق فلاتلجوه ، و سر الله فلاتتکلفوه&lt;/b&gt;:[و او را از قدر پرسیدند، فرمود]راهی است تیره آن را مپیمائید و دریایی است ژرف بدان در میائید، و راز خداست برای گشودنش خود را مفرسایید. (نهج البلاغه شهیدی، ص ۴۱۴) .&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مگر یکی از ارکان چهارگانه&amp;zwnj;ی کفر را تعمق به شمار نیاورده است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;والکفر علی اربع دعایم. علی التعمق و التنازع و الزیغ و الشقاق . فمن تعمق لم ینب الی الحق&lt;/b&gt;&amp;quot; (نهج البلاغه شهیدی، کلمات قصار ۳۱ ، ص ۳۶۵).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;و مگر نگفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;لا تفكروا فی&amp;zwnj; ذات&amp;zwnj; الله&amp;zwnj; ولكن&amp;zwnj; تفكروا فی&amp;zwnj; الاء الله&amp;zwnj;&lt;/b&gt;: در ذات&amp;zwnj; خداوند فكر نكنيد، بلكه&amp;zwnj; در نعمتهای&amp;zwnj; او بينديشيد&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;و در خطبه&amp;zwnj; اشباح&amp;zwnj; در پاسخ&amp;zwnj; به&amp;zwnj; كسی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; درباره&amp;zwnj; توصيف&amp;zwnj; خداوند پرسيده&amp;zwnj;، می&amp;zwnj;&amp;zwnj;فرمايند:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;پس&amp;zwnj; ای&amp;zwnj; پرسنده&amp;zwnj; بينديش&amp;zwnj;! و آنچه&amp;zwnj; قرآن&amp;zwnj; از وصف&amp;zwnj; پروردگار به&amp;zwnj; تو می&amp;zwnj;&amp;zwnj;نمايد بپذير، و نور هدايت&amp;zwnj; قرآن&amp;zwnj; را چراغ&amp;zwnj; راه&amp;zwnj; خود گير؛ و از آنچه&amp;zwnj; شيطان&amp;zwnj; تو را به&amp;zwnj; دانستن&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; وا می&amp;zwnj;&amp;zwnj;دارد، و كتاب&amp;zwnj; خدا آن&amp;zwnj; را بر تو واجب&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;&amp;zwnj;شمارد، و در سنت&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; و ائمه&amp;zwnj; هدی&amp;zwnj; نشانی&amp;zwnj; ندارد، دست&amp;zwnj; بدار، و علم&amp;zwnj; او را به&amp;zwnj; خدا واگذار - كه&amp;zwnj; دستور دين&amp;zwnj; چنين&amp;zwnj; است&amp;zwnj; -، و نهايت&amp;zwnj; حق&amp;zwnj; خدا بر تو اين&amp;zwnj;؛ و بدان&amp;zwnj;! كسانی&amp;zwnj; در علم&amp;zwnj; دين&amp;zwnj; استوارند كه&amp;zwnj; اعتراف&amp;zwnj; به&amp;zwnj; نادانی&amp;zwnj; بی &amp;zwnj;نيازشان&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; است&amp;zwnj; تا ناانديشيده&amp;zwnj; پادرميان&amp;zwnj; گذارند، و فهم&amp;zwnj; آنچه&amp;zwnj; را در پس&amp;zwnj; پرده&amp;zwnj;های&amp;zwnj; غيب&amp;zwnj; نهان&amp;zwnj; است&amp;zwnj; آسان&amp;zwnj; انگارند، لاجرم&amp;zwnj; به&amp;zwnj; نادانی&amp;zwnj; خود در فهم&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; معنيهای&amp;zwnj; پوشيده&amp;zwnj; اقرار آرند، و خدا اين&amp;zwnj; اعتراف&amp;zwnj; آنان&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; ناتوانی&amp;zwnj; در رسيدن&amp;zwnj; بدانچه&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;&amp;zwnj;دانند ستوده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;، و ژرف&amp;zwnj; نگريستن&amp;zwnj; آنان&amp;zwnj; را در فهم&amp;zwnj; آنچه&amp;zwnj; بدان&amp;zwnj; تكليف&amp;zwnj; ندارند، راسخ&amp;zwnj; بودن&amp;zwnj; در علم&amp;zwnj; فرموده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. پس&amp;zwnj; بدين&amp;zwnj; بس&amp;zwnj; كن&amp;zwnj;! و بزرگی&amp;zwnj; خدای&amp;zwnj; سبحان&amp;zwnj; را با ميزان&amp;zwnj; خرد خود مسنج&amp;zwnj;. تا از تباه &amp;zwnj;شدگان&amp;zwnj; مباشی&amp;quot; (نهج البلاغه شهیدی، صص ۷۵- ۷۴).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;۳-۲۲-&lt;/b&gt; برخی از فقیهان فیلسوف بوده&amp;zwnj;اند. به همین دلیل نمی&amp;zwnj;توان همه&amp;zwnj;ی فقیهان را فلسفه ستیز به شمار آورد.اما فقیهان فیلسوف هم معلوم نیست که &amp;quot;&lt;b&gt;عقل مستقل از شرع&lt;/b&gt;&amp;quot; را بپذیرند، چه رسد به &amp;quot;&lt;b&gt;عقل معارض با فرآورده&amp;zwnj;های نقلی&lt;/b&gt;&amp;quot; یا &amp;quot;&lt;b&gt;عقل مبطل وحی&lt;/b&gt;&amp;quot; را.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;قصه&amp;zwnj;ی &amp;quot;محمد تازی&amp;quot; و &amp;quot;محمد رازی&amp;quot; بسیار مهم است. آنان که این داستان را برساختند، منظوری داشتند[۶۲]. گویی، &amp;quot;محمد تازی&amp;quot; به تعبد فرا می&amp;zwnj;خواند. برای این که منبع فرآورده&amp;zwnj;های او، یکی از &amp;quot;منابع&amp;quot; شناخته شده&amp;zwnj;ی معرفت نبود و نیست.&amp;quot;وحی&amp;quot; به تعبیر علامه&amp;zwnj;ی طباطبایی، &amp;quot;&lt;b&gt;شعور مرموز&lt;/b&gt;&amp;quot; و معدن حقایق محض است. اما &amp;quot;محمد رازی&amp;quot;، شک و تردید می&amp;zwnj;آفرید. وعده&amp;zwnj;ی یقین و حقیقت محض نمی&amp;zwnj;داد. پیام او این بود که فرایند عقلانی مهم است، باید روش اندیشیدن را آموخت، نه آموزه&amp;zwnj;های خاصی را جاودانی قلمداد کرد. عقلی که به محدودیت&amp;zwnj;های خود معترف است، به نقد و استدلال بیش از هر چیز دیگر بها می&amp;zwnj;دهد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فقیهان شیعه، با استثناتاتی ، بر خلاف دعوی و لاف زدن&amp;zwnj;های بی اساس، بسیار عقل ستیز بوده&amp;zwnj;اند و از عقل مانند هر چیز دیگر فقط عقل ابزاری را می&amp;zwnj;پسندند یعنی آن چه در راه منافع و مصالح آنان قرار گیرد. ریشه مسئله هم به ادوار اولیه بر می&amp;zwnj;گردد. فقیهان که متولی ظاهری اسلام خوانده می&amp;zwnj;شوند نمی&amp;zwnj;توانند &amp;quot;عقل مستقل از شرع&amp;quot; را تاب آورند. آن&amp;zwnj;ها به تکفیر فیلسوفان همت گذاردند و از این رهگذر راه را بر فلسفه&amp;zwnj;هایی که در صدد آشتی پدیده&amp;zwnj;های طبیعی و فراطبیعی بر می&amp;zwnj;آمدند سد کردند. بی شک امروزه ما نیازمند گشایش باب مبارک تفکر انتقادی و فلسفی&amp;zwnj;اندیشی هستیم. فقهی&amp;zwnj;گری معاصر می&amp;zwnj;بایست خوی تکفیری خود را نسبت به فلسفه و فیلسوفان کنار بگذارد و با تشویق متدینان در صدد پروراندن فیلسوفان مدافع دین باشد و نه هیچ چیز دیگر.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پایان&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;پانویس&amp;zwnj;ها:&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۴- &lt;b&gt;&lt;i&gt;کلیات شیخ بهایی&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، به کوشش و ویرایش کاظم عابدینی مطلق ، انتشارات فراگفت، صص ۱۸۷- ۱۸۶.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۵- &lt;b&gt;&lt;i&gt;کلیات شیخ بهایی&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، صص ۱۶۱- ۱۶۰.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۶- ملامحسن فیض کاشانی ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;المحجة البیضاء&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، کتاب العلم ، صص ۷۲- ۷۱.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۷- &lt;b&gt;&lt;i&gt;ده&amp;zwnj; رساله&amp;zwnj; محقق&amp;zwnj; بزرگ&amp;zwnj; فیض&amp;zwnj; کاشانی&amp;zwnj;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ص ۱۹۹-۱۸۳.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۸- &lt;b&gt;آسمان و جهان&lt;/b&gt; ، ترجمه&amp;zwnj;ی كتاب السماء و العالم بحارالانوار. محمد باقر مجلسی. مترجم: محمد باقر كمره&amp;rlm;اى&amp;rlm;. ناشر: اسلاميه&amp;rlm;. تهران. چاپ اول&amp;rlm;:۱۳۵۱ ش&amp;rlm;. ج&amp;rlm;۳ ص: ۱۶۳.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۹- پیشین، جلد ۲، ص ۱۳۴.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۰- پیشین، جلد ۱، ص ۲۰۵.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۱- علامه&amp;zwnj;ی مجلسی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;بحار الانوار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، مؤسسة الوفاء. بيروت &amp;ndash; لبنان. ۱۴۰۴ ه.ق . ج۸ ص:۳۲۸.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۲- مجلسی نوشته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;أقول هذه الجناية على الدين وتشهير كتب الفلاسفة بين المسلمين من بدع خلفاء الجور المعاندين لأئمة الدين ليصرفوا الناس عنهم وعن الشرع المبين. ويدل على ذلك ما ذكره الصفدي في شرح لامية العجم: أن المأمون لما هادن بعض ملوك النصارى أظنه صاحب جزيرة قبرس طلب منهم خزانة كتب اليونان وكانت عندهم مجموعة في بيت لا يظهر عليه أحد، فجمع الملك خواصه من ذوي الرأي واستشارهم في ذلك فكلهم أشار بعدم تجهيزها إليه إلا مطران واحد فإنه قال: جهزها إليهم ما دخلت هذه العلوم على دولة شرعية إلا أفسدتها وأوقعت الاختلاف بين علمائها... والمشهور أن أول من عرب كتب اليونان خالد بن يزيد بن معاوية ... ويدل على أن الخلفاء وأتباعهم كانوا مائلين إلى الفلسفة، وأن يحيى البرمكي كان محبا لهم ناصرا لمذهبهم ما رواه الكشي بإسناده عن يونس بن عبد الرحمن قال: كان يحيى بن خالد البرمكي قد وجد على هشام شيئا من طعنه على الفلاسفة فأحب أن يغري به هارون ويضربه على القتل، ثم ذكر قصة طويلة في ذلك أوردناها في باب أحوال أصحاب الكاظم عليه السلام. وفيها أنه أخفى هارون في بيته ودعا هشاما ليناظر العلماء وجروا الكلام إلى الإمامة وأظهر الحق فيها وأراد هارون قتله فهرب ومات من ذلك الخوف رحمه الله. وعد أصحاب الرجال من كتبه كتاب الرد على أصحاب الطبائع، وكتاب&amp;rlm; الرد على أرسطاطاليس في التوحيد. وعد الشيخ منتجب الدين في فهرسه من كتب قطب الدين الراوندي كتاب تهافت الفلاسفة. وعد النجاشي من كتب الفضل بن شاذان كتاب رد على الفلاسفة وهو من أجلة الأصحاب. وطعن عليهم الصدوق ره في مفتتح كتاب إكمال الدين. وقال الرازي عند تفسير قوله تعالى: فَلَمَّا جاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّناتِ فَرِحُوا بِما عِنْدَهُمْ مِنَ الْعِلْمِ: فيه وجوه ثم ذكر من جملة الوجوه أن يريد علم الفلاسفة والدهريين من بني يونان وكانوا إذا سمعوا بوحي الله صغروا علم الأنبياء إلى علمهم، وعن سقراط: أنه سمع بموسى عليه السلام، وقيل له: أوهاجرت إليه، فقال: نحن قوم مهذبون فلا حاجة إلى من يهذبنا! وقال الرازي في المطالب العالية: أظن أن قول إبراهيم لأبيه يا أَبَتِ لِمَ تَعْبُدُ ما لا يَسْمَعُ ولا يُبْصِرُ ولا يُغْنِي عَنْكَ شَيْئاً إنما كان لأجل أن أباه كان على دين الفلاسفة وكان ينكر كونه تعالى قادرا، وينكر كونه تعالى عالما بالجزئيات فلا جرم خاطبه بذلك الخطاب&amp;quot; (بحار الأنوار، ۵۷/۱۹۷ ـ ۱۹۸). &amp;rlm;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۳-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۴-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۵-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۶- ميرزا ابوالقاسم قمی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;قوانين الاصول&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ص&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۷-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۸-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴۹-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۰- السلسبيل، ميرزا ابوالحسن اصطهباناتی، ۳۸۶ .&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۱-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۲-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۳-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۴- شناختنامه&amp;zwnj; علامه&amp;zwnj;طباطبایی&amp;zwnj;، ۴/ ۱۴۴-۱۴۳ مقاله&amp;zwnj; &amp;quot;نقد مقاله عقل&amp;zwnj; و دین&amp;quot;&amp;raquo; علی&amp;zwnj; ملکی&amp;zwnj;میانجی&amp;zwnj;، آقای&amp;zwnj; میانجی&amp;zwnj; همچنین&amp;zwnj; می&amp;zwnj;نویسد:&amp;quot;از آیت&amp;zwnj;الله&amp;zwnj; موسی&amp;zwnj; شبیری&amp;zwnj; زنجانی&amp;zwnj; شنیدم&amp;zwnj; که&amp;zwnj; گفت&amp;zwnj;: آیت&amp;zwnj;الله&amp;zwnj; شاهرودی&amp;zwnj; فتوای&amp;zwnj; تحریم&amp;zwnj; ادامه&amp;zwnj; حاشیه&amp;zwnj; بحارالانوار را صادر کرد&amp;quot; (همان&amp;zwnj;/ ۱۴۵).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۵-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۶- مجله نور الصادق، شماره ۹.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۷-یک&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;left&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot; class=&quot;rteright&quot;&gt;۵۸- لئو اشتراوس، &lt;b&gt;&lt;i&gt;حقوق طبیعی و تاریخ&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ترجمه&amp;zwnj;ی باقر پرهام، نشر آگاه ، ص ۱۰۲- ۱۰۱.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵۹- شمس ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;مقالات&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، دکتر علی موحد، انتشارات خوارزمی، ص ۲۸۸.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot; class=&quot;rteright&quot;&gt;۶۰- شمس ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;مقالات&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ص ۱۳۵.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شمس در جای دیگری درباره&amp;zwnj;ی فخر رازی گفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;فخر رازی از اهل فلسفه بوده است، يا از آن قبيل. خوارزمشاه را با او ملاقات افتاد. آغاز کرد که : چنين در رفتم در دقايق اصول و فروع، همه کتابهای اوليان و آخريان را بر هم زدم. از عهد افلاطون تا اکنون، هر تصنيف که معتبر بود، پيش من شبهت هر یکی معين شد و روشن است. و دفترهای اوليان را همه بر هم زدم و حد هريکی بدانستم. و اهل روزگار خود را برهنه کردم و حاصل هريک را بديدم . فلان فن را، بجايی رسانيدم تا وهم گم شد.! امير از جهت طعن می&amp;zwnj;گويدش:- و از آن علمک ديگر (فرمانروايی) نيز که من می&amp;zwnj;دانم، تو کناری! &amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶۱- امام فخر رازی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;البراهین در علم کلام&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، سید محمد باقر سبزواری، انتشارات دانشگاه تهران، ۱۳۴۱ ، جلد ۲ ، صص ۱۹۹- ۱۹۳.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶۲- ما به هیچ وجه مدعی نیستیم که امام فخر رازی چنان سخنی بر زبان رانده است. او نقدهای بسیاری بر فیلسوفان وارد آورد.اما این متکلم اشعری همچنان نزد اهل سنت متهم به بی ایمانی بود. در &lt;b&gt;&lt;i&gt;الفرق فی شرح احوال مذاهب المسلمین&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ابتدأ به نقدهای خود بر فیلسوفان اشاره کرده و سپس به اتهاماتی که بدو زده&amp;zwnj;اند پرداخته و طلب یاری می&amp;zwnj;کند. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;فضل و توفیق حق ما را بر آن داشت کتابهایی تصنیف کنیم که متضمن رد آنها باشد. چون کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;نهایة العقول&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; و کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;المباحث المشرقیه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; و کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;الملخص&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; و کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;شرح اشارات&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; و کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;جواب المسائل النجاریة&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; و کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;البیان والبرهان&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; و کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;العمادیة فی المطالب المعادیة&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; . همه&amp;zwnj;ی این کتابها در بیان اصول دین و شرح ابطال شبهات فلاسفه مخالفان است که دوست و دشمن اعتراف دارند که هیچ کس از متقدمان و متأخران مانند این کتب تصنیف نکرده&amp;zwnj;اند و اما تألیفات دیگر خود را که در دیگر علوم نوشته ایم در اینجا یاد نکردیم، با این همه بسا &lt;b&gt;دشمنان و حاسدان که پیوسته زبان به دشنام و طنز بر ما دراز دارند و در دین و ایمان من طعن می&amp;zwnj;زنند و ما را بر مذهب اهل سنت و جماعت نمی&amp;zwnj;دانند، با آن که کوششهای فراوان و سعی بی پایان ما را در یاری عقیدت مردم سنت و جماعت دیده و دانسته&amp;zwnj;اند.&lt;/b&gt; دانایان قوم بخوبی دانسته&amp;zwnj;اند که مذهب من و پیشینیان من جز مذهب سنیان و اهل جماعت نیست. اکنون گروه شاگردان من و شاگردان پدرم در اطراف گیتی هستند که ترویج دین حق و آیین رستگاری کنند و بدعتها را باطل کنند. طعنه&amp;zwnj;ی مخالفان شگفت نیست، زیرا دشمنان منند و بر من حسد برده&amp;zwnj;اند. تعجب از دوستان مشفق و یاران متفق است که چگونه دم فرو بسته و در کنج خموشی نشسته. باری در مقام یاری نبوده، رفتار دشمنان مرا دیده وظیفه&amp;zwnj;ی خود را در دوستی انجام نداده&amp;zwnj;اند. کیست که نداند این جهان، جهان احتیاج و نیازمندی است. دستی به کمک دوستی دراز کنند و قدمی به حمایت و مساعدت کسی بردارند. اگر در این جهان بی نیازی امکان پذیر بود، موسی بن عمران (ع) با آن ید و بیضا و اژدها کردن عصا از خداوند مسألت نکردی و نگفتی که &lt;b&gt;فَأَرْسِلْهُ مَعِيَ رِدْءًا يُصَدِّقُنِي&lt;/b&gt; از خداوند توفیق خود و شما را خواهانم. امیدوارم به لطف و کرم بی نهایت خود ما را در دنیا و آخرت از عوامل و موجبات کیفر مصون بدارد&amp;quot; (فخر رازی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;الفرق فی شرح احوال مذاهب المسلمین والمشرکین&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، چهارده رساله ، صص ۱۴۵- ۱۴۳).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;بخش پیشین:&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://radiozamaneh.com/reflections/2012/04/22/13459&quot;&gt;محمد تازی و محمد رازی (۱)&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
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     <comments>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/04/28/13761#comments</comments>
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 <pubDate>Sat, 28 Apr 2012 16:10:35 +0000</pubDate>
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    <title>محمد تازی و محمد رازی (۱)</title>
    <link>https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/04/22/13459</link>
    <description>&lt;div class=&quot;fb-social-like-widget&quot;&gt;&lt;fb:like  href=&quot;https://archive.radiozamaneh.com/reflections/2012/04/22/13459&quot; send=&quot;false&quot; layout=&quot;box_count&quot; show_faces=&quot;false&quot; width=&quot;500&quot; action=&quot;like&quot; font=&quot;arial&quot; colorscheme=&quot;light&quot;&gt;&lt;/fb:like&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;field field-type-text field-field-sartitr&quot;&gt;
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            &lt;div class=&quot;field-item odd&quot;&gt;
                    گزارشی از عقل ستیزی فقیهان         &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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                    اکبر گنجی        &lt;/div&gt;
        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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        &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;اکبر گنجی &amp;minus; این مقاله ناظر به نزاع نقل و عقل، یا فقیهان با فیلسوفان مسلمان است. کل داستان مدعای ستبر و ساده&amp;zwnj;ای دارد: فیلسوفان یا عقل گرایان، مغازه&amp;zwnj;ای در کنار دکان پیامبران گشوده اند، مشتریان پیامبران را می&amp;zwnj;ربایند و اجناس تقلبی و هلاک کننده&amp;zwnj;ی خود را به آنها می&amp;zwnj;فروشند. پیامبران &amp;quot;طبیبان روح&amp;quot;&amp;zwnj;اند که بابت طبابت خود، اجر و مزدی طلب نکرده و نمی&amp;zwnj;کنند. مقاله این مدعا و نزاع را در بستری تاریخی، ضمن آرای فقیهان می&amp;zwnj;کاود.&lt;/p&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در بخش دوم و پایانی، همین گزارش را ادامه داده و بستری تحلیلی برای این نزاع فراهم خواهیم آورد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;!--break--&gt;&lt;!--break--&gt;&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;یکم- طرح مسئله: &lt;/b&gt;در بحث تکفیر فیلسوفان ابتدا باید به چند نکته&amp;zwnj;ی مقدماتی توجه کرد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;الف&lt;/b&gt;- فلسفه از منظری که ما بدان می&amp;zwnj;نگریم، اگر نگوئیم عین عقلانیت است، مستلزم استدلال و عقلانیت است. در هر زمینه ای، مدعیات باید با ادله&amp;zwnj;ی عقلی موجه شوند.نتیجه محصول فرایند عقل استدلالگر است. فیلسوف از آن جهت که فیلسوف است، تنها به عقل استدلالی التزام می&amp;zwnj;ورزد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;ب&lt;/b&gt;- فلسفه از یونان- از طریق ترجمه- وارد جهان اسلام شد. مسلمین به عنوان دینداران، به خوبی می&amp;zwnj;دیدند که نتایج عقل فیلسوفانه بعضاً متعارض با فرآورده&amp;zwnj;های وحیانی است. آنان می&amp;zwnj;خواستند از این برساخته&amp;zwnj;ی بشری- یعنی فلسفه - برای تحکیم و اثبات آموزه&amp;zwnj;های وحیانی استفاده کنند. در واقع، فلسفه به خدمت دین در آمد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;ج&lt;/b&gt;- فلسفه، در مقام تعریف - اگر به معنای تابع محض استدلال بودن باشد- به هیچ وجه دینی شدنی نیست. از این جهت، چیزی به نام &amp;quot;فلسفه&amp;zwnj;ی مسیحی&amp;quot;، &amp;quot;فلسفه&amp;zwnj;ی یهودی&amp;quot;، &amp;quot;فلسفه&amp;zwnj;ی اسلامی&amp;quot; ، &amp;quot;فلسفه&amp;zwnj;ی بودایی&amp;quot; و...وجود ندارد. قوت و ضعف هر مدعا و آموزه ای، به قوت و ضعف ادله&amp;zwnj;ای که برای آن دست و پا می&amp;zwnj;شود، بستگی دارد.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;د&lt;/b&gt;- فلسفه&amp;zwnj;ی یهودی، فلسفه&amp;zwnj;ی فیلسوفان یهودی است. فلسفه&amp;zwnj;ی مسیحی، فلسفه&amp;zwnj;ی فیلسوفان مسیحی است. فلسفه&amp;zwnj;ی اسلامی، فلسفه&amp;zwnj;ی فیلسوفان مسلمان است. در حقیقت، فلسفه در خدمت اثبات و تأیید و عقلانی سازی آموزه&amp;zwnj;های دینی در آمده است.آنچه فیلسوفان مسلمان پدید آورده اند، یک نظام متافیزیکی ستبر است که امروزه این گونه نظام&amp;zwnj;های متافیزیکی به حاشیه رفته یا فروپاشیده&amp;zwnj;اند. در عوض، معرفت شناسی و فلسفه&amp;zwnj;ی زبان و فلسفه&amp;zwnj;های مرتبه&amp;zwnj;ی دوم (فلسفه دین، فلسفه&amp;zwnj;ی اخلاق، فلسفه&amp;zwnj;ی فلسفه، فلسفه&amp;zwnj;ی منطق، فلسفه&amp;zwnj;ی علم، فلسفه&amp;zwnj;ی هنر ، و...) بازارشان به شدت گرم است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;ه&lt;/b&gt;- فلاسفه&amp;zwnj;ی مسلمان، با بحث&amp;zwnj;های خود، چراغ عقلانیت را در جهان اسلام روشن نگاه داشتند. محدثان و فقیهان دشمن &amp;quot;عقل مستقل از نقل&amp;quot; بودند و یا در بهترین حالت به آن بی اعتنا بودند. مدعای آنان ساده بود. باید مطیع محض آنچه پیامبر &amp;quot;نقل&amp;quot; کرده است بود.به تعبیر دیگر، باید به کتاب و سنت معتبر، &amp;quot;تعبد&amp;quot; داشت. حداکثر نقشی که عقل در این چارچوب می&amp;zwnj;توانست ایفا کند این بود که کاشف از مراد شارع باشد. یعنی کشف کند که خداوند یا معصوم از سخنانی که گفته&amp;zwnj;اند چه هدف و منظوری داشته اند؟ همین و بس. اما عقلی که بخواهد مستقل از شرع باشد و به نتایجی معارض یا ناسازگار یا متفاوت از فرآورده&amp;zwnj;های وحیانی برسد، مردود و مطرود است. در همدلانه&amp;zwnj;ترین شکل می&amp;zwnj;توان گفت که آنان به &amp;quot;عقل فهمی&amp;quot; باور داشتند، نه &amp;quot;عقل نقدی&amp;quot;. برخی از فقیهان و محدثان و اخباریون تا آنجا پیش رفته&amp;zwnj;اند که با مفاهیمی که در نقل و شرع نیامده- حتی اگر در خدمت اثبات و تأیید آموزه&amp;zwnj;های دینی/نقلی باشد- مخالفت کرده&amp;zwnj;اند. اینان گفته&amp;zwnj;اند که فقط باید از اصطلاحات و مفاهیمی که در شرع آمده، استفاده کرد و آن اصطلاحات را به کار برد. استفاده&amp;zwnj;ی از اصطلاحاتی که در نقل و شرع نیامده، نیز &amp;quot;بدعت&amp;quot; است. علمای اهل سنت فلسفه&amp;zwnj;ی یونانی را در تقابل با قرآن به شمار می&amp;zwnj;آوردند. کتاب&amp;zwnj;های زیادی در این زمینه نوشته شد. از جمله : &lt;b&gt;&lt;i&gt;رشف انصائح الایمانیه فی کشف الفضائح الیونانیه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; و &lt;b&gt;&lt;i&gt;ترجیح اسالیب القرآن علی اسالیب الیونان&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; .&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فیلسوفان مسلمان، اگر چه فلسفه را در خدمت اثبات یا تأیید فرآورده&amp;zwnj;های وحیانی قرار دادند، اما زبان و مفاهیم جدیدی را به کار گرفتند. اکثر آن مفاهیم در زبان شرع جایی نداشت. به هر حال، به نوعی برای اثبات آن آموزه ها، استدلال می&amp;zwnj;کردند و چراغ عقلانیت را زنده نگاه می&amp;zwnj;داشتند. فقیهان به این جهت- و معارض یافتن آموزه&amp;zwnj;های فلسفی با فرآورده&amp;zwnj;های وحیانی- آنان را تکفیر می&amp;zwnj;کردند و اگر می&amp;zwnj;توانستند، جانشان را می&amp;zwnj;گرفتند.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شاعران ما نیز کوشیدند تا فلاسفه را دشمن قرآن و ایمان به شمار آورند:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فلسفی مرد دین مپندارید&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;حیز را جفت سام یل منهید&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;قفل اسطوره&amp;zwnj;ی ارسطو را&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بر در احسن الملل منهید&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;نقش فرسوده&amp;zwnj;ی فلاطون را&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بر طراز بهین حلل منهید&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ناصر خسرو هم گفته بود:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;آن فلسفه است و این سخن دینی&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;دین شکرست و فلسفه هپیونست&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;در برابر اینها و غزالی و فخر رازی، امثال خواجه نصیرالدین طوسی وجود داشته&amp;zwnj;اند که به صراحت می&amp;zwnj;گفتند همه- از جمله فقیهان و اصولیون- قبل از هر چیز، ابتدا می&amp;zwnj;بایست اصول عقاید خود را بنیان نهند و این کار بدون استدلال عقلی امکان پذیر نمی&amp;zwnj;باشد. خواجه نصیر در آغاز &lt;b&gt;&lt;i&gt;تلخیص المحصل&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;پایه و زیربنای معارف دینی اصول دین است که مسائل آن باید یقینی باشد و تا آن مسائل با یقین اثبات نشود گفت و گو در تمامی معارف دینی بی فائده است . درست مانند اصول فقه و فروع و مسائل فقه که برای فهم و گفت و گو در فروع و مسائل فقه باید از پایه یعنی اصول آغاز کرد . البته در اصول فقه می&amp;zwnj;شود مقلد بود ولی بحث کننده نباید بدون آن که نخست مبانی اصول فقه را فراگیرد به بحث از فروع فقه بپردازد چون در این صورت مثل کسی خواهد بود که بخواهد ساختمانی را بدون پایه بسازد . پژوهنده مباحث فقهی باید جوری باشد که اگر از او دلیل مسئله&amp;zwnj;ای را پرسیدند توانائی استدلال و تحلیل فقهی آن را داشته باشد&amp;quot;[۱].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;این سخنان در شرایطی ایراد می&amp;zwnj;شد که استفاده&amp;zwnj;ی از مشهورات و مسلمات اساس کلام اشعری را تشکیل می&amp;zwnj;داد. اما در جهان تسنن که متکلمانی چون غزالی و امام فخر رازی شدیدترین ضربه&amp;zwnj;ها را به فلسفه وارد آورده بودند، حنابله نیز در این راه کوشا بودند. ابوالعباس تقی الدین احمدبن عبدالحلیم معروف به ابن تیمیه (۷۲۸-۶۶۱) با کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;الرد علی المنطقیین&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; به رویارویی با علم منطق رفت. در کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;درء تعارض العقل والنقل&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; کوشید تا عقل معارض با وحی را طرد کند. مدعای او ساده بود: باید ایمان داشت و ایمان جازم فقط و فقط وقتی حاصل می&amp;zwnj;شود که مومن حتی اگر سخنان پیامبر (یا کلام الله) با عقل صریح مخالف باشد، جانب خدا و پیغمبر را بگیرد[۲]. به تعبیر دیگر، در صورت تعارض عقل و نقل (شرع)، واجب است که شرع بر عقل تقدم یابد. او برای آموزه&amp;zwnj;ی خود به اصطلاح توجیهی برساخته است. می&amp;zwnj;گوید همه&amp;zwnj;ی آنچه در شرع آمده یا پیامبر آورده، مورد تصویب عقل قرار گرفته است، اما تمامی فرآورده&amp;zwnj;های عقلانی مورد تأیید و تصویب شرع نیست.یعنی کلیه&amp;zwnj;ی احکام عقلانی وقتی معتبرند که به تصویب شرع رسیده شوند، اما اعتبار شرع خودبنیاد است و هیچ نیازی به تأیید عقل ندارد.می نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;اذا تعارض الشرع والعقل، وجب تقدم الشرع. لأن العقل مصدق للشرع فی کل ما أخبربه ؛ والشرع لم یصدق العقل فی کل ما أخبربه&amp;quot;[۳].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ظاهراً ابن تیمیه مخالف عقل نیست، برای این که می&amp;zwnj;خواهد به نحوی مسئله&amp;zwnj;ی تعارض عقل و شرع را حل نماید. برای حل و رفع تعارض عقل و وحی، عقل را به دو نوع تقسیم می&amp;zwnj;کند. اولی، عقلی است که نبوت و فرآورده&amp;zwnj;های وحیانی را اثبات می&amp;zwnj;کند. این عقل مقبول است. دومی، عقلی که با فرآورده&amp;zwnj;های وحیانی/نقلی و ظواهر شرع در تعارض قرار می&amp;zwnj;گیرد. به نظر او، وقتی عقل معارض با شرع ابطال شود، عقل موید شرع و نقل تأیید می&amp;zwnj;گردد.ابطال عقل معارض با نقل به معنای بطلان کل عقلانیت نیست. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;الأدلة العقلیة التی تعارض السمع غیر الأدلة العقلیة التی یعلم بها أن الرسول صادق. و ان جنس المعقول یشملهما؛ و نحن اذا أبطلنا ما عارض السمع انما أبطلنا نوعاً یسمی معقولاً و لم نبطل کل معقول&amp;quot;[۴].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;اگر چه شیعیان در کلام مدعی قبول &amp;quot;مستقلات عقلیه&amp;quot; اند، اما در واقع، اخباری گری آن چنان بر اذهان و اعمال آنان سیطره یافته است که در صورت تعارض عقل و شرع، جانب نقل را گرفته و عقل را طرد می&amp;zwnj;کنند. اساس کار اینان &amp;quot;&lt;b&gt;قال الباقر&lt;/b&gt;&amp;quot; و &amp;quot;&lt;b&gt;قال الصادق&lt;/b&gt;&amp;quot; است. شیعیان حتی تا آنجا پیش رفته&amp;zwnj;اند که روایات نقل شده&amp;zwnj;ی از سوی ائمه را برتر از قرآن نشانده و در صورت تعارض آیات قرآن با روایات ائمه، قرآن را به سود روایت تأویل می&amp;zwnj;کنند. ملامحمد امین استرآبادی (وفات ۱۰۳۰) حتی برای فهم قرآن و سخنان پیامبر عقل را تعطیل می&amp;zwnj;کرد. به گفته&amp;zwnj;ی او، قرآن و سخنان پیامبر دارای ناسخ و منسوخ، عام و خاص و مطلق و مقید است و قابلیت تأویل دارند. ما آدمیان قادر به فهم و درک این سخنان نیستیم. اما کلام ائمه&amp;zwnj;ی شیعیان فاقد خصوصیات کلام خداوند و پیامبر است. یعنی سخنانشان ذو وجوه نیست. قرآن مطابق با سطح عقلی ائمه نازل شده و تنها آنان قادر به فهم معنای آنند.ائمه دقیقا مطابق با سطح مردم عوام سخن گفته&amp;zwnj;اند و هرکس به کلام آنان بیاویزد، نیازمند تفکر عقلانی و اجتهاد نیست. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;وایضاً مقتضی تصریح الأئمة بالفرق بین کلامهم و بین کلام رسوله (ص) بأن لهما وجوهاً مختلفة و بأنهما یحتملان الناسخ والمنسوخ و بأنهما وردا فی الأکثر علی وجه التعمیه بالنسبة الی أذهان الرعیة و ورد بقدر عقول الأئمة علیهم السلام بخلاف کلام الأئمة فأنه لا یحتمل أن یکون ناسخاً و منسوخاً و انه ورد بقدر ادراک الرعیة و هم مخاطبون به فیکون کلامهم خالیاً عن ذات الاحتمال&amp;quot;[۵].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;چرا فقیهان و محدثان و متکلمان، فیلسوفان را تکفیر می&amp;zwnj;کردند؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;شاید مهمترین پاسخ این باشد که چون فیلسوفان &amp;quot;&lt;b&gt;عقل مستقل از وحی&lt;/b&gt;&amp;quot; را به کار می&amp;zwnj;گرفتند و فرآورده&amp;zwnj;های آن را که با ظواهر کتاب و سنت معتبر تعارض داشت، در اختیار مومنان می&amp;zwnj;گذاردند. پاسخ تکمیلی به &amp;quot;رقیب ناپسندی&amp;quot; باز می&amp;zwnj;گردد. و پاسخ تکمیلی دیگر به جهل و تنگ نظری و عدم تحمل معطوف است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;حال نوبت آن است که تکفیر فیلسوفان از سوی فقیهان را گزارش کنیم. مسئله&amp;zwnj;ی قتل فیلسوفان باید جداگانه گزارش شود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;دوم- شیخ مفید:&lt;/b&gt;محمدبن محمدبن نعمان (۴۱۳- ۳۳۸) مشهور به شیخ مفید، بر این باور بود که همه&amp;zwnj;ی فضایل و کمالات انبیا در ائمه&amp;zwnj;ی شیعیان محقق است. او عقل را نیازمند شرع به شمار آورده و مدعی است که بدون پیامبر، تکلیف برای آدمیان تحقق نمی&amp;zwnj;پذیرفت.می گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;اتفقت الأمامیه علی ان العقل یحتاج فی علمه و نتائجه الی السمع و انه غیر منفک عن سمع ینبه الغافل علی کیفیة الأستدلال و انه لابد فی اول التکلیف و ابتدائه فی العالم من رسول&lt;/b&gt;:جماعت امامیه بر این امر اتفاق نظر دارند که عقل در علم و نتایج خود نیازمند نقل بوده و هرگز از نوعی نقل که غافل را بر کیفیت استدلال آگاه سازد منفک و جدا نیست.به همین جهت از آغاز پیدایش تکلیف در جهان وجود یک پیغمبر لازم و ضروری است&amp;quot;[۶].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;پس فرایند عقلانی در کسب دانش و پدید آوردن نتایج متوقف بر نقل است. شیخ مفید به اموری باور دارد که لزوماً هیچ ربطی به دین ندارند، اما منکر آنها را تکفیر کرده و به الحاد متهم می&amp;zwnj;سازد. به عنوان نمونه، مخالفان قول به جزء لایتجزی را اهل الحاد قلمداد کرده است. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;الجواهر عندی هی الأجزاء التی تتألف منها الأجسام و علی هذا القول اهل التوحید کافة...و یخالف فیه الملحدون...&amp;quot;[۷].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;سوم- امام محمد غزالی: &lt;/b&gt;غزالی (۵۰۵- ۴۵۰) یکی از بزرگترین متفکران جهان اسلام است. سیوطی درباره&amp;zwnj;ی او گفته است، اگر قرار بود خداوند پس از پیامبر اسلام پیامبر دیگری برانگیزد، بی شک آن پیامبر غزالی بود[۸]. غزالی دو کتاب (&lt;b&gt;&lt;i&gt;المنقذ من الضلال&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; و &lt;b&gt;&lt;i&gt;تهافت الفلاسفه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ) را علیه فیلسوفان نوشته است. در ابتدای &lt;b&gt;&lt;i&gt;مقاصدالفلاسفه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;من قصد دارم تناقض آرا و عقاید فلاسفه را برملا ساخته، &lt;b&gt;گمراهیها&lt;/b&gt; و &lt;b&gt;کج اندیشیهای&lt;/b&gt; آنان را آشکار نمایم؛ ولی قبل از این که به این کار دست یازم، لازم می&amp;zwnj;دانم که مقاصد این جماعت را در مورد علوم منطقی و طبیعی و الهی توضیح دهم؛ زیرا بدون وقوف و احاطه&amp;zwnj;ی به خصوصیات یک مسلک، &lt;b&gt;عیوب&lt;/b&gt; و &lt;b&gt;مفاسد &lt;/b&gt;آن را نمی&amp;zwnj;توان آشکار ساخت&amp;quot;[۹].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;غزالی در &lt;b&gt;&lt;i&gt;تهافت الفلاسفه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; اشتباه فلاسفه را در بیست مسئله دانسته، اما در سه مسئله&amp;zwnj;ی قول به قدم زمانی عالم، انکار علم خداوند به جزئیات و انکار بازگشت اجساد و حشر آنها در روز قیامت، این آرا را کفرآمیز دانسته و آنان را تکفیر کرده است. به گفته&amp;zwnj;ی غزالی باور به هریک از این سه، مستلزم باور به کذب پیامبران است و باور به کاذب بودن پیامبران، موجب کفر است. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;اگر کسی بگوید که مذهب این قوم را به تفصیل بیان کردید، حال آیا به طور قطع به کفر آنان فتوا می&amp;zwnj;دهید و کشتن کسی را که به اعتقاد این جماعت باشد واجب می&amp;zwnj;شمارید. گوییم در سه مسئله از تکفیر آنها چاره نیست:اول:مسئله&amp;zwnj;ی قدم عالم، و قول به اینکه همه&amp;zwnj;ی جواهر قدیم&amp;zwnj;اند. و دوم: قول آنها به اینکه: خدای تعالی به جزئیات حادث از سوی اشخاص احاطه&amp;zwnj;ی علمی ندارد. و سوم: انکار برانگیخته شدن تن&amp;zwnj;ها و حشر آنها را. و این سه مسئله به هیچ رو با اسلام سازگاری نیست، و آنکه به این امور باور دارد پیامبران را به دروغ نسبت داده و پنداشته است که آنچه پیامبران گفته&amp;zwnj;اند بر سبیل مصلحت و تمثیل و تفهیم مسائل برای توده&amp;zwnj;های مردم بوده است، و این همان کفر آشکار است، چه هیچ یک از فرقه&amp;zwnj;های اسلامی بدین اعتقاد نیست&amp;quot;[۱۰].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;او در پایان درباره&amp;zwnj;ی بدعت گزاران می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;ما اکنون در صدد آن نیستیم که اهل بدعت را تکفیر کرده و به صحت و سقم عقاید آنان بپردازیم، زیرا ورود در این مباحث از حوزه&amp;zwnj;ی آنچه مقصود این کتاب را تشکیل می&amp;zwnj;دهد خارج است&amp;quot;[۱۱].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;غزالی سخنان فلاسفه را یاوه گویی و پریشان اندیشی به شمار آورده و خودشان را اهل مکر و حیله قلمداد کرده است.وی در جای دیگر اسماعیلیه و اباحتیان را نیز تکفیر کرده است که به موضوع نوشتار کنونی مربوط نمی&amp;zwnj;شود.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;اما او اندیشمند بزرگی بود که به سادگی در چارچوب اشاعره و تکفیرگری نمی&amp;zwnj;گنجید. در کتاب بسیار مهم &lt;b&gt;&lt;i&gt;فیصل التفرقه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; به جد توصیه می&amp;zwnj;کند که مردم می&amp;zwnj;بایست زبان خود را از تکفیر &amp;quot;&lt;b&gt;اهل قبله&lt;/b&gt;&amp;quot; باز دارند، چرا که در صدور حکم تکفیر، خطرهایی وجود دارد که در سکوت، هیچ یک از آنها موجود نیست[۱۲]. پرسش اندیشه سوز این است: غزالی با آن آرای شاذ و کارهای عجیب- از نظر مسلمین- چگونه می&amp;zwnj;توانست تکفیرگر باشد؟ کار عجیب او، خلاصه کردن قرآن تحت عنوان &lt;b&gt;&lt;i&gt;جواهرالقرآن&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; بود که هیچ کس تاکنون چنین جرئتی نداشته است[۱۳]. غزالی تفکیک&amp;zwnj;های گوناگونی میان آیات و سوره&amp;zwnj;های قرآن انجام می&amp;zwnj;دهد. آیات گران بهاتر (آیات جواهر) متعلق به معرفت الله هستند. در مرتبه&amp;zwnj;ی بعد، نوبت به آیات دُرر می&amp;zwnj;رسد که مربوط به صراط مستقیم&amp;zwnj;اند. به گمان او، سوره&amp;zwnj;های قرآنی نیز از نظر درجه متفاوت با یکدیگرند. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;شاید این پرسش در ذهن تو خلجان می&amp;zwnj;کند که بگویی لازمه&amp;zwnj;ی سخنان تو آن است که برخی آیات قرآن بر برخی دیگر برتری دارند، حال آن که همه&amp;zwnj;ی این&amp;zwnj;ها قول خداوند است؛ پس چگونه می&amp;zwnj;توان آن&amp;zwnj;ها را از هم متمایز کرد؟ و چگونه برخی را بر برخی دیگر شرافت و برتری بود؟ پس بدان که اگر نور بصیرت در تو چندان نیست که بتوانی میان آیة الکرسی و آیه&amp;zwnj;ی دین یا میان سوره&amp;zwnj;ی تبت تفاوت بگذاری و نفس تو همچنان تقلید از این و آن را می&amp;zwnj;طلبد، بر تو لازم است که از صاحب این دین- صلوات الله و سلامه علیه- تقلید کنی، چرا که قرآن بر او نازل شده است. روایات فراوانی بر برتری برخی آیات قرآن و نیز فضیلت بیشتر در قرائت برخی سوره&amp;zwnj;های قرآن وارد شده است&amp;quot;[۱۴].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;غزالی حقیقتاً- نه مجازی- سوره&amp;zwnj;ی اخلاص را برابر با یک سوم قرآن به شمار می&amp;zwnj;آورد. می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;یک بار دیگر باز گرد و در آن اقسام سه گانه&amp;zwnj;ی علوم که برایت برشمردیم دقت کن: معرفت الله، شناخت صراط مستقیم و شناخت آخرت سه علم مهم و اساسی&amp;zwnj;اند و بقیه&amp;zwnj;ی علوم تا به این ها. سوره&amp;zwnj;ی اخلاص[را از آن رو ثلث قرآن خوانده&amp;zwnj;اند که] حاوی یکی از این سه علم است: معرفت الله، توحید و تنزیه او از هرگونه مشارکتی در جنس و نوع. مراد از نفی اصل و فرع و کفو همین است، و وصف صمد درباره&amp;zwnj;ی او اشارتی است به این که او بی نیازی است که در تمام هستی تنها مرجع همه&amp;zwnj;ی نیازهاست. آری در این سوره سخنی از صراط مستقیم و معرفت آخرت به میان نیامده است؛ هم از این روست که رسول خدا آن را برابر با ثلث اصول قرآن خوانده است&amp;quot;[۱۵].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;غزالی آیات و سوره&amp;zwnj;های قرانی را به مهم و غیر مهم، اصلی&amp;zwnj;ها و زیادات مکمل تقسیم می&amp;zwnj;کند. در محدوده&amp;zwnj;ای که برای آیات جواهر و دُرر می&amp;zwnj;سازد، شانزده سوره&amp;zwnj;ی کامل را کنار می&amp;zwnj;نهد. یعنی از نظر او از جمله&amp;zwnj;ی زیادات&amp;zwnj;اند که در آن جواهر و دُرر وجود ندارد. ضمن آن که مطابق تقسیم بندی او، آیات اصلی و مهم فقط بیست و پنج درصد کل آیات قرآن را تشکیل می&amp;zwnj;دهند. او در فهرست خویش ابتدأ آیات جواهر- متعلق به معرفت الله- و سپس آیات دُرر - متعلق به صراط مستقیم- را ذکر می&amp;zwnj;کند.چرا فقط به ذکر این دو نوع ایات بسنده کرده است؟ می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;بدان که ما به دو دلیل تنها به ذکر آیات جواهر و آیات دُرر پرداختیم:نخست آن که دیگر اقسام آیات قرآن فراوان و بیرون از حد و شمارند. دوم آن که تنها این دو دسته آیات&amp;zwnj;اند که مهم و بی بدیل اند، چرا که اصل، معرفت خدای تعالی و سپس سلوک در طریق مستقیم اوست؛ اما در امر آخرت، ایمان مطلق کافی است چرا که می&amp;zwnj;دانیم عارفان فرمان بردار، اهل سعادت&amp;zwnj;اند و منکران گناهکار اهل شقاوت. شناخت جزئیات این امور، دیگر شرط لازم برای سلوک نیست، بلکه زیادتی مکمل است برای تشویق و تحذیر مومنان&amp;quot;[۱۶].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;سخنان غزالی در عالم اسلام می&amp;zwnj;تواند خطرناک و گمراه کننده به شمار آید. اما او که چنین سخنانی بر زبان می&amp;zwnj;راند، در همین کتاب نیز به فیلسوفان و معتزله تاخته و آرای آنان را الحادی و گمراه کننده به شمار آورده است. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;دسته&amp;zwnj;ای از متفلسفان را دیده ایم که معانی ظاهری بر ایشان مشتبه گشته، ایرادهایی به خاطرشان رسیده است، و به گمان خود تناقض&amp;zwnj;هایی یافته&amp;zwnj;اند. پس &lt;b&gt;اساس اعتقاد دینی شان تباه گشته&lt;/b&gt; ، و این امر آنان را به انکار باطنی حشر و نشر، بهشت و دوزخ و بازگشت به خدای تعالی کشانیده است. &lt;b&gt;الحاد خویش را در سینه پنهان کرده&lt;/b&gt;، لگام تقوی و بند ورع از سر ستور برداشته، اسب هوی را در طلب حطام و حرام دنیا و پیروی شهوات تاخته و همت خویش را در طلب مال و مقام و لذت&amp;zwnj;های زودگذر مقصور داشته&amp;zwnj;اند...این همه از آن است که چشم عقل ایشان تنها صورت اشیا و قالب&amp;zwnj;های خیالی آن را می&amp;zwnj;بیند و از درک ارواح و معانی باطن آن عاجز است. توازن و تقارن میان عالم شهادت و عالم ملکوت را درک نکرده&amp;zwnj;اند و چون ظاهر امور بر ایشان متناقض نموده است، &lt;b&gt;خود گمراه شده و جمعی را گمراه کرده&amp;zwnj;اند.&lt;/b&gt; اینان نه از عالم ارواح با ذوق خواص، چیزی درک کرده&amp;zwnj;اند و نه چونان عوام، غیب را باور داشته&amp;zwnj;اند. زیرکی شان مایه&amp;zwnj;ی هلاکت شده است، [شگفتا که] جهالت به سعادت و رهایی اخروی، نزدیک تر بود تا فطانت و زیرکی ناقص. ما خود هیچ گاه این را بعید نمی&amp;zwnj;شماریم، زیرا مدتی به سبب شومی همنشینان بد و مصاحبت با ایشان، در سراشیبی این &lt;b&gt;گمراهی&lt;/b&gt;&amp;zwnj;ها لغزیده ایم، تا آن که خداوند ما را از سقوط در پرتگاه&amp;zwnj;های آن مصون داشت، پس سپاس و منت و فضل او را سزد که آدمیان را راه هدایت می&amp;zwnj;نماید، نعمت می&amp;zwnj;بخشد و از &lt;b&gt;سقوط در تباهی&lt;/b&gt; نگاه می&amp;zwnj;دارد، که این گونه رهایی امری نیست که بتوان با تلاش و طلب بدان رسید&amp;quot;[۱۷].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;غزالی مدعیات دین شناسانه&amp;zwnj;ی شاذ دیگری هم دارد. از جمله در &lt;b&gt;&lt;i&gt;مشکاة الأنوار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; گفته است که واصلان به حق از طریق تجلی الهی چنین می&amp;zwnj;یابند که صفت حق مطاع، منافی فردانیت محض است. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;...و انما الواصلون صنف رابع تجلی لهم ایضاً ان هذا المطاع موصوف بصفة تنافی الوحدانیة المحضه... والکمال البالغ لسر لیس تحتمل هذا الکتاب کشفه&amp;quot;[۱۸].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;چگونه است که بیان این مدعا که می&amp;zwnj;تواند از نظر دینداران مشرکانه به شمار رود، اشکالی ندارد، اما سخنان فلاسفه و معتزله و...کفرآمیز است؟ ابن طفیل در &lt;b&gt;&lt;i&gt;زنده&amp;zwnj;ی بیدار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; کوشیده است که از سوء تعبیری که مدعای غزالی پدید آورده بود، ممانعت به عمل آورد[۱۹]. غزالی نهنگی است که به سادگی در تور اشاعره و محدثان جای نمی&amp;zwnj;گیرد.آیا جای تعجب نیست که این نهنگ بزرگ، به دنبال حذف رقیبان و متفاوت&amp;zwnj;ها باشد؟&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;مسئله فقط نفی فلسفه و تکفیر فیلسوفان نیست. مذمت بحث&amp;zwnj;های عقلانی/ کلامی در &lt;b&gt;&lt;i&gt;احیاء علوم الدین&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; غزالی، به گونه&amp;zwnj;ای احیاگری دینی را با تحقیر عقلانیت همنشین می&amp;zwnj;سازد. می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;بدان که، هر کس ایمان ساده به خدا و رسول و مکتب الهی را ترک گوید و در بحثهای کلامی غوطه ور شود، با چنان خطری روبروست و چون کشتی شکسته&amp;zwnj;ای است که امواج متلاطم او را به بازی گرفته&amp;zwnj;اند. نادراً ممکن است به ساحل افتد اما خطر هلاک برای او بسی بیشتر از نجات است. و هر کس عقیده&amp;zwnj;ی خود را تقلیداً یا استدلالاً از باحثان و متکلمان بگیرد که به بضاعت مزجات عقل خویش تکیه کرده اند، از دو حال خارج نیست یا هنوز اسیر شک است که ایمانش ویران است یا به آن ادله و ایمان مطمئن است، که باز هم غره به عقل ناقص و ایمن از مکر خداوند است. مگر این که از مرزهای عقل بیرون رود و به نور مکاشفه که در عالم ولایت و نبوت می&amp;zwnj;تابد بپیوندد. اما این پیوستن به آسانی دست نمی&amp;zwnj;دهد و چنان رهرو از عقل رسته&amp;zwnj;ی به نور پیوسته&amp;zwnj;ای از گوگرد سرخ نایابتر است. و فقط عوام بی خبر و ابله&amp;zwnj;اند که از این خطر می&amp;zwnj;رهند، یا کسانی که از ترس عذاب الهی به طاعت حق مشغولند و گرد آن فضول و زواید نمی&amp;zwnj;گردند&amp;quot;[۲۰].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;چهارم- شهرستانی &lt;/b&gt;: حجت الحق محمدبن عبدالکریم شهرستانی (۵۴۸- ۴۷۹)، فقیه شیعی- یا به گفته&amp;zwnj;ی برخی شافعی- کتابی در رد فلسفه به نام &lt;b&gt;&lt;i&gt;مصارعة الفلاسفه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; نوشته است.او در کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;ملل و نحل&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; فلاسفه را در زمره&amp;zwnj;ی منکران نبوت و مستبدان آورده است. می&amp;zwnj;نویسد:این جماعت به شرایع و احکام الهی قائل نیستند، بلکه تنها حدود عقلی را ملاک کار خود قرار داده تا از این طریق بتوانند به زندگی ادامه دهند. شهرستانی سپس می&amp;zwnj;افزاید: کسانی که به احکام شرعیه اعتقاد دارند، احکام عقلیه را نیز می&amp;zwnj;پذیرند ولی عکس مسئله صادق نیست زیرا بسیارند کسانی که به احکام و حدود عقلی وفادارند، ولی شریعت را نمی&amp;zwnj;پذیرند&amp;quot;[۲۱].شهرستانی در تفسیرش - به نام &lt;b&gt;&lt;i&gt;مفاتیح الأسرار و مصابیح الأبرار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; - به مقایسه&amp;zwnj;ی انبیا با فلاسفه پرداخته و زبان ابلیس را همان زبان فلاسفه دانسته است. می&amp;zwnj;نویسد: &amp;quot;&lt;b&gt;و کما ان الله یتکلم علی لسان الانبیاء علیهم السلام، کذلک ابلیس یتکلم علی لسان الفلاسفه&lt;/b&gt;&amp;quot;[۲۲].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;چهارم- ابوالفرج ابن جوزی:&lt;/b&gt;امام ابو الفرج جمال الدين بن جعفر الجوزى بغدادى (۵۹۷- ۵۱۱ ق) ، مورخ، واعظ، مفسر و فقيه حنبلى، در کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;تلبيس ابليس&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; فلسفه، كلام و نجوم را از مصاديق تلبيس ابليس به شمار آورده است. وی عنوان کتاب خود را از غزالی گرفته است. غزالی در &lt;b&gt;&lt;i&gt;احیاء علوم الدین&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; گفته است که قصد دارد در آینده کتابی به نام تلبیس ابلیس بنویسد و در آن مائد شیطان را توضیح خواهد داد:&amp;quot;و لعلنا امهل الزمان صنفنافیه کتاباً علی الخصوص نسمیه تلبیس ابلیس فانه قد انتشر الان تلبیسه فی البلاد والعباد...&amp;quot;. عبدالرحمن بدوی در &lt;b&gt;&lt;i&gt;مولفات الغزالی&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، کتاب &lt;b&gt;تلبیس ابلیس&lt;/b&gt; را یکی از کتب مسلم غزالی به شمار آورده است.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ابن جوزی در ابتدای خطبه&amp;zwnj;ی آغازین کتابش از عقل تجلیل به عمل آورده و می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;الحمدلله&lt;/b&gt; &lt;b&gt;الذی سلم میزان العدل الی اکف ذوی الألباب&lt;/b&gt;: حمد و ستایش مخصوص پروردگاری است که میزان عدالت را به دست صاحبان عقل سپرد&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;خطبه را که پایان می&amp;zwnj;بخشد، در آغاز سخن دوباره از عقل می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;اما بعد فأن اعظم النعم علی الأنسان العقل لأنه الأله فی معرفة الأله سبحانه&lt;/b&gt; :بزرگترین نعمتی که خداوند به انسان ارزانی داشته عقل است زیرا عقل ابزار معرفت است&amp;quot;[۲۳].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;به گفته&amp;zwnj;ی ابن جوزی شریعت خورشید است و عقل چشم. چشمی که خورشید معجزات پیامبر و صدق سخنان وی را دیده و تسلیم آن می&amp;zwnj;شود. بدین ترتیب، عقلی که تجلیل می&amp;zwnj;شود، عقل خاضع در برابر شرع است. اما حتی اگر چنین باشد، باز هم می&amp;zwnj;توان با وی درپیچید. به عنوان مثال، نقل و شرع و دینداران عالم را قدیم یا حادث می&amp;zwnj;دانند. متشرعه هر دو مدعا را به کتاب و سنت نسبت داده&amp;zwnj;اند. اما وی به فلاسفه&amp;zwnj;ای که این بحث را طرح کرده&amp;zwnj;اند می&amp;zwnj;تازد و آنان را اهل هوا و هوس قلمداد می&amp;zwnj;کند. مسئله&amp;zwnj;ی اساسی این است که او عقل مستقل از شرع و ترک جمود بر ظواهر کتاب و سنت را راه ورود ابلیس قلمداد کرده است.ابن جوزی کلام و فلسفه را حرام و کفر آميز دانسته و در تحريم علم کلام از شافعی چنين نقل می&amp;zwnj;&amp;zwnj;کند:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;فقهای قديم اين امت چون ديدند که علم کلام تشنگی اهل حقيقت را شفايی نمی&amp;zwnj;&amp;zwnj;بخشد و مرد پاک اعتقاد را منحرف می&amp;zwnj;سازد، لذا از آن خود داری کردند و خوض و تأمل در آن را ممنوع کردند. شافعی رحمه الله گفت: اگر بنده&amp;zwnj;ای به همه&amp;zwnj;ی منهيات خداوند غير از شرک دچار شود، بهتر از آن است که در علم کلام نظر کند...حکم من در باب علماء کلام آن است که &lt;b&gt;آنان را به تازيانه بزنند و در ميان عشاير و قبائل بگردانند و بگويند اين سزای کسی است که کتاب و سنت را رها کرده و به کلام روی آورده است&lt;/b&gt;. احمد بن حنبل گفت که اهل کلام هيچ&amp;zwnj;گاه روی رستگاری را نخواهند ديد و همه&amp;zwnj;ی علماء کلام &lt;b&gt;زنديق&amp;zwnj;اند&lt;/b&gt;&amp;quot;[۲۴].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بدین ترتیب، فیلسوفان زندیقانی هستند که باید با تازیانه تربیت شوند.کفر فلاسفه بدترین کفرهاست. برای این که یهودیان و مسیحیان به هر حال به شریعتی باور دارند که در زمان نزول، برترین دین زمان خود بوده است.اما فیلسوفان از بدعت گزاران نیز پست ترند:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;اين متأخران از امت ما كه شنيدند حكمای قديم منكر صانع بوده شرايع را رد كرده&amp;zwnj;اند و آن را از مقوله&amp;zwnj;ی قانون سازی يا حيلت بازی شمرده اند، آنچه از حكما نقل می&amp;zwnj;شد تصديق نموده شعار دين را كنار نهادند و &lt;b&gt;نماز را ترك گفته مرتكب حرام شدند و حدود شرع را خوار داشتند و ريسمان اسلام را از گردن برداشتند&lt;/b&gt;. يهوديان و مسيحيان نزد خدا از اينان عذرشان مقبولتر است زيرا به هر حال تابع شرايعی هستند كه در موقع خود با معجزه&amp;zwnj;ی مدلل بود. همچنين پيروان بدعت در مذاهب نزد خدا عذرشان از فلسفی يان مقبولتر است كه دعوی نظر در ادله را دارند (و به هر حال دلايل شرعی را قبول دارند). اما فلسفی يان برای &lt;b&gt;كفر&lt;/b&gt; خود مستندی ندارند جز آن كه پيشينيانشان حكيم بوده اند، اما مگر نه اين كه پيغمبران هم حكيم بوده&amp;zwnj;اند و چيزی بيش از حكيم&amp;quot;[۲۵].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;پنجم- قطب الدین راوندی:&lt;/b&gt;شیخ امامقطب الدین ابوالحسن سعیدبن عبدالله بن الحسن راوندی (وفات ۵۷۳ ق) فقیه ومتکلم بزرگ شیعه کتابی بر ردّ فلاسفه به نام &lt;b&gt;&lt;i&gt;تهافت الفلاسفه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; نوشته وصریحاً مخالفت خود را با مبانی فلاسفه اعلام نموده است.از این کتاب اینک هیچ اطلاعی در دست نیست. وی در کتاب دیگرش با عنوان &lt;b&gt;&lt;i&gt;الخرائج والجرائح&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;فلاسفه اصول اسلام را اخذ کرده، سپس آن&amp;zwnj;ها را برطبق آرای خود تفسیر و تأویل کردند...آنان در ظاهر با مسلمانان توافق دارند اما در واقع، افکار و نظرات آنها در جهت &lt;b&gt;هدم اسلام&lt;/b&gt; و اطفاء نور شریعت است&amp;quot;[۲۶].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;ششم- خواجه نصیرالدین طوسی:&lt;/b&gt;نصیرالدین طوسی (۶۷۲- ۵۹۸)، همان گونه که در ابتدأ گفته شد، متکلمی عقلی مشرب است. &lt;b&gt;&lt;i&gt;تجریدالاعتقاد&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; به منظور پیراستن عقیده از آنچه نامعقول و غیر منطقی است، نگاشته شده است. &lt;b&gt;&lt;i&gt;شرح اشارات&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; &lt;b&gt;&lt;i&gt;والتنبیهات&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; او، به هر حال تفسیر فلسفه&amp;zwnj;ی ابن سیناست. خواجه نصیرالدین طوسی کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;مصارعة الفلاسفه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; محمد بن عبدالکریم شهرستانی را در کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;مصارعة المصارعة&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; نقد و رد کرده است. خواجه نصیرالدین طوسی به کفر و الحاد متهم شده است. ابن قیم (وفات ۷۵۱)- شاگرد ابن تیمیه- درباره&amp;zwnj;ی جواجه نصیرالدین طوسی گفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&amp;hellip; چون&amp;zwnj; نوبت&amp;zwnj; به&amp;zwnj; یاور شرک&amp;zwnj; و کفر و وزیر ملحد ملاحده&amp;zwnj; نصیر طوسی&amp;zwnj; رسید که&amp;zwnj; وزارت&amp;zwnj; هولاکو یافته&amp;zwnj; بود، خویش&amp;zwnj; را از پیروی&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; و اهل&amp;zwnj; دین&amp;zwnj; او بر کنار داشت&amp;zwnj; و آنان&amp;zwnj; را عرضه&amp;zwnj;&amp;zwnj;ی تیغ&amp;zwnj; گردانید تا از ملحدان&amp;zwnj; اسماعیلی&amp;zwnj; خلاص&amp;zwnj; گشت&amp;zwnj; و همو بود که&amp;zwnj; خلیفه&amp;zwnj; و قضاة&amp;zwnj; و فقیهان&amp;zwnj; و محدثان&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; قتل&amp;zwnj; رسانید و فیلسوفان&amp;zwnj; را زنده&amp;zwnj; نگاه&amp;zwnj; داشت&amp;zwnj; که&amp;zwnj; برادران&amp;zwnj; او بودند و منجمان&amp;zwnj; و طبیعت&amp;zwnj;شناسان&amp;zwnj; و جاودان&amp;zwnj; را گرامی&amp;zwnj; داشت&amp;zwnj; و اوقاف&amp;zwnj; و مدارس&amp;zwnj; و مساجد و اسلام&amp;zwnj; و مواجب&amp;zwnj; آنها را فسخ&amp;zwnj; کرد و مخصوص&amp;zwnj; خود و یارانش&amp;zwnj; کرد. او در کتابهای&amp;zwnj; خود قدم&amp;zwnj; عالم&amp;zwnj; و بطلان&amp;zwnj; معاد و انکار صفات&amp;zwnj; پروردگار جهانیان&amp;zwnj; را، از علم&amp;zwnj; و قدرت&amp;zwnj; و حیات&amp;zwnj; و سمع&amp;zwnj; و بصر&amp;hellip; نصرت&amp;zwnj; کرد و گفت: خدا نه&amp;zwnj; در داخل&amp;zwnj; عالم&amp;zwnj; است&amp;zwnj; و نه&amp;zwnj; در خارج&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; و بالای&amp;zwnj; عرش&amp;zwnj; پروردگاری&amp;zwnj; نیست&amp;zwnj; که&amp;zwnj; پرستیده&amp;zwnj; شود...برای&amp;zwnj; ملاحده&amp;zwnj; مدارس&amp;zwnj; ساخت&amp;zwnj; و خواست&amp;zwnj; تا &lt;b&gt;&lt;i&gt;اشارات&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; امام&amp;zwnj; ملحدان&amp;zwnj; ابن&amp;zwnj;سینا را جای&amp;zwnj; قرآن&amp;zwnj; قرار دهد! ولیکن&amp;zwnj; نتوانست&amp;zwnj; و گفت: این&amp;zwnj; قرآن&amp;zwnj; خواص&amp;zwnj; است&amp;zwnj; و آن&amp;zwnj; قرآن&amp;zwnj; عوام&amp;zwnj; است&amp;zwnj; و همو خواست&amp;zwnj; تا نماز را تغییر دهد و به&amp;zwnj; دو نماز بازگرداند. ولیکن&amp;zwnj; این&amp;zwnj; کار را هم&amp;zwnj; نتوانست؛ در آخر کار جادویی&amp;zwnj; بیاموخت&amp;zwnj; و خود ساحر شد و بتان&amp;zwnj; را عبادت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;کرد&amp;hellip;! . شهرستانی&amp;zwnj; در کتاب&amp;zwnj; &lt;b&gt;&lt;i&gt;المصارعه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&amp;zwnj; با ابن&amp;zwnj;سینا گلاویز شد و قول&amp;zwnj; او را راجع&amp;zwnj; به&amp;zwnj; قدم&amp;zwnj; عالم&amp;zwnj; و انکار معاد جسمانی&amp;zwnj; و نفی&amp;zwnj; علم&amp;zwnj; پروردگار و قدرت&amp;zwnj; او و برخی&amp;zwnj; مسائل&amp;zwnj; دیگر ابطال&amp;zwnj; کرد، این&amp;zwnj; نصیرالحاد به&amp;zwnj; یاری&amp;zwnj; ابن&amp;zwnj;سینا برخاست&amp;zwnj; و کتاب&amp;zwnj; شهرستانی&amp;zwnj; را نقض&amp;zwnj; کرد و کتابی&amp;zwnj; پرداخت&amp;zwnj; به&amp;zwnj; نام&amp;zwnj; &lt;b&gt;&lt;i&gt;مصارعة&amp;zwnj;المصارعة&lt;/i&gt;&amp;zwnj;&lt;/b&gt; ما هر دو کتاب&amp;zwnj; را دیدیم، نصیر طوسی&amp;zwnj; در آنجا این&amp;zwnj; اصل&amp;zwnj; را تأیید می&amp;zwnj;کرد که&amp;zwnj; خدا آسمانها و زمین&amp;zwnj; را در شش&amp;zwnj; روز نیافرید و او چیزی&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;داند و به&amp;zwnj; قدرت&amp;zwnj; و اختیار خویش&amp;zwnj; کاری&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;دهد و مردگان&amp;zwnj; از گور برنمی&amp;zwnj;خیزند&amp;hellip;&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;zwnj;سبکی&amp;zwnj; در یک&amp;zwnj; جا همین&amp;zwnj; نظر را در مورد خواجه&amp;zwnj; ابراز داشته&amp;zwnj; و سپس&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;به&amp;zwnj; هولاکو گفته&amp;zwnj; شد که&amp;zwnj; اگر خون&amp;zwnj; این&amp;zwnj; خلیفه&amp;zwnj; ریخته&amp;zwnj; شود جهان&amp;zwnj; به&amp;zwnj; شیون&amp;zwnj; و زاری&amp;zwnj; برخیزند و سبب&amp;zwnj; خراب&amp;zwnj; دیار تو می&amp;zwnj;شود، چه&amp;zwnj; پسر عموی&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; و خلیفه&amp;zwnj; خدا در زمین&amp;zwnj; است. پس&amp;zwnj; شیطان&amp;zwnj; مبین&amp;zwnj; نصیرالدین&amp;zwnj; طوسی&amp;zwnj; حکیم&amp;zwnj; برخاست&amp;zwnj; و گفت: کشته&amp;zwnj; می&amp;zwnj;شود به&amp;zwnj; نحوی&amp;zwnj; که&amp;zwnj; خونش&amp;zwnj; بر زمین&amp;zwnj; ریخته&amp;zwnj; نشود! و این&amp;zwnj; نصیرالدین&amp;zwnj; سخت&amp;zwnj;ترین&amp;zwnj; مردم&amp;zwnj; بر مسلمانان&amp;zwnj; بود! پس&amp;zwnj; خلیفه&amp;zwnj; را در نمد پیچیدند و لگدمالش&amp;zwnj; کردند تا جان&amp;zwnj; داد&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;همین خواجه نصیر کافر ملحد در پایان راه گفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;هفتاد سال در علوم عقلیه فکر کردم وکتاب&amp;zwnj;های بسیاری در آن&amp;zwnj;ها تصنیف کردم بیش از این نیافتم که این مخلوق را خالقی است و در این هم یقین &lt;b&gt;عجوزه&lt;/b&gt;&amp;zwnj;های &lt;b&gt;قبیله&lt;/b&gt; از من بالاتر است. پس طریق صحیح آن است که همه کس اصل ایمان و عقاید خود را از صاحب وحی اخذ کند و باطن خود را از صفات ذمیمه و اخلاق خبیثه پاک سازد&amp;quot;[۲۷].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;هفتم- علامه&amp;zwnj;ی حلی: &lt;/b&gt;علامه حلی (۷۲۶- ۶۴۸ ق) در آثار گوناگون خود فلاسفه را تکفیر کرده است. او جهاد با فیلسوفان را واجب قلمداد کرده است. می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;الذین یجب جهادهم قسمان: مسلمون خرجوا عن طاعة الإمام و بغوا علیه، وکفار، وهم قسمان: أهل کتاب أو شبهة کتاب، کالیهود والنصارى والمجوس وغیرهم من أصناف الکفار، کالدهریة وعباد الأوثان والنیران، و منکری ما یعلم ثبوته من الدین ضرورة، کالفلاسفة وغیرهم&lt;/b&gt; :آنان که باید با آنها جهاد کرد، دو دسته&amp;zwnj;اند: مسلمانانی که از اطاعت امام بیرون رفته و بر او شوریده&amp;zwnj;اند و آنها دو گروهند: اهل کتاب و کسانی که شبهه اهل کتاب بودنشان وجود دارد مانند یهود و نصاری و مجوس و غیر آنها از کفار مانند دهریه و پرستندگان بت و آتش و نیز منکران ضروریات دینی مانند فلاسفه و غیر فلاسفه&amp;quot;[۲۸].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;علامه حلی نظریه وحدت وجود فیلسوفان مسلمان را هم کفر و الحاد به شمار آورده است. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;برخی صوفیان سنی مذهب گفته اند: &amp;quot;خداوند نفس وجود است، و هر موجودی همان خداست&amp;quot;. و این مطلب عین &lt;b&gt;کفر&lt;/b&gt; و &lt;b&gt;الحاد&lt;/b&gt; است. و حمد مر خدایی را که ما را به پیروی از اهل &amp;rlm;بیت علیهم &amp;rlm;السلام ـ نه پیروی از نظرات گمراه کننده ـ فضیلت و برتری بخشید&amp;quot;[۲۹].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;حلی آموزه&amp;zwnj;هایی را به فیلسوفان نسبت داده که خلاف واقع است. او مدعی است که اسلام خداوند را قادر می&amp;zwnj;شناساند، اما فیلسوفان گفته&amp;zwnj;اند که خداوند قادر نیست و این وجه تمایز آنان است. اما نکته این است که همه&amp;zwnj;ی فیلسوفان مسلمان خداوند را عالم مطلق، قادر مطلق و خیر محض به شمار می&amp;zwnj;آورند. حلی بر اساس تهمتی که به فیلسوفان می&amp;zwnj;زند، دوباره نظریات آنان را کفر صریح قلمداد می&amp;zwnj;کند. می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;فارق بین اسلام و فلسفه این مسئله است که خداوند قادر نبوده و مجبور باشد، و این همان &lt;b&gt;کفر صریح&lt;/b&gt; است&amp;quot;[۳۰].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;علامه&amp;zwnj;ی حلی در پاسخ به پرسش :&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;چه می&amp;zwnj;فرمایید در مورد کسی که به توحید و عدل و نبوت و امامت معتقد است اما می&amp;zwnj;گوید عالم قدیم است؟ حکم وی در دنیا و آخرت چیست؟ &amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;گفته است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;بدون اختلاف بین علما، هر کسی معتقد به قدم&amp;rlm; عالم&amp;rlm; باشد &lt;b&gt;کافر است&lt;/b&gt;، زیرا فرق مسلمان با کافر همین است، و حکم او در آخرت، به اجماع، حکم بقیه&amp;zwnj;ی کفار است&amp;quot;[۳۱].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;علامه&amp;zwnj;ی حلی فلسفه را یکی از دانش&amp;zwnj;های حرام به شمار آورده است. می&amp;zwnj;گفت:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;العلم إمّا فرض عین أو فرض کفایة أو مستحبّ أو حرام... و الحرام: ما اشتمل علی وجه قبح، کعلم الفلسفة لغیر النقض، و علم الموسیقی و غیر ذلک ممّا نهی الشرع عن تعلّمه، کالسحر، و علم القیافة و الکهانة و غیرها&lt;/b&gt;:فراگیری دانش یا واجب عینی و یا واجب کفایی و یا مستحب و یا حرام است...علم حرام علمی است که مشتمل بر امری قبیح باشد مثل فراگیری دانش فلسفه به غیر منظور رد و نقض آن و مانند علم موسیقی و غیر اینها از علومی که شرع از فراگیری آن نهی کرده است مانند علم سحر و کهانت و ...&amp;quot;[۳۲].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;انکار فلسفه توسط حلی را نباید به معنای عقل ستیزی عام به شمار آورد. چرا که او شارح &lt;b&gt;&lt;i&gt;تجریدالاعتقاد&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; و مدافع بحث عقلانی درباره&amp;zwnj;ی اعتقادات است. می&amp;zwnj;گوید:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;&lt;b&gt;ولا یکفی فی ذلک التقلید، بل لا بدّ من العلم المستند إلى الأدلّة والبراهین...وذلک إنّما یتمّ بعلم الکلام&lt;/b&gt;: و در عقاید تقلید جایز نیست بلکه فراگیری مستند به ادله و براهین لازم است که این امر با فراگیری علم کلام محقق می&amp;zwnj;شود&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;او تقلید در حوزه&amp;zwnj;ی اعتقادات را به طور کلی رد کرده است. می&amp;zwnj;گوید آیا سخن خداوند به حرام بودن تقلید که در قرآن آمده به گوش شما نرسیده است:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;فلینظر العاقل المنصف من نفسه: هل یجوز له اتباع من ینکر الضروریات ، و یجحد الوجدانیات؟ و هل یشک عاقل فی انه قادر، مرید؟ ...و هل یسوغ لعاقل ان یجعل مثل هولاء وسائط بینه و بین ربه؟ و هل تتم له الحاجة عند الله تعالی بأنی اتبعت هولاء ؟ و لایسأل یومئذ کیف قلدت من تعلم بالضرورة بطلان قوله؟ و هل سمعت تحریم التقلید فی الکتاب العزیز مطلقا؟ فکیف الأمثال هولاء ؟ فما یکون جوابه غداً لربه؟ و ما علینا الا البلاغ المبین&amp;quot;[۳۳].&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;ادامه دارد&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;پانویس&amp;zwnj;ها:&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱- &lt;b&gt;&lt;i&gt;تلخیص المحصل&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ص ۱.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲- ابن تیمیه ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;درء تعارض العقل والنقل&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، دکتر محمدرشاد سالم، جمهوریة العربیة المتحدة، دارالکتب، ۱۹۷۱، ص ۱۷۸.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳- ابن تیمیه ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;درء تعارض العقل والنقل&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ص ۱۳۸.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۴- ابن تیمیه ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;درء تعارض العقل والنقل&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ص ۱۷۳.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۵- ملا محمد امین استرآبادی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;الفوائد المدینه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، تهران، میرزا محسن کتابفروش، ۱۳۲۱، ص ۹۰.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۶- شیخ مفید، &lt;b&gt;&lt;i&gt;اوائل المقالات&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، چاپب تبریز، صص ۱۲-۱۱.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۷- شیخ مفید، &lt;b&gt;&lt;i&gt;اوائل المقالات&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، چاپب تبریز، صص ۷۳- ۷۲.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۸- &lt;b&gt;&lt;i&gt;تاريخ فلسفه در ايران و جهان اسلامی&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ص ۲۵۹. به نقل از:جلال الدین سیوطی ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;بغية الوعاة فی طبقات اللغويين و النحاة&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، قاهره. مطبعة السعادة. ۱۹۶۴م، ص۲۱۱).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۹- غزالی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;مقاصد الفلاسفه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ص&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۰- محمد غزالی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;تهافت الفلاسفه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ترجمه علی اصغر حلبی، انتشارات زوار، چاپ دوم، ۱۳۶۳، ص ۳۰۷.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۱- غزالی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;تهافت الفلاسفه&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ص ۳۱۰.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۲- &lt;b&gt;&lt;i&gt;فیصل التفرقه از مجموعه&amp;zwnj;ی القصور العوالی من رسائل الأمام الغزالی&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، چاپ مصر، ص ۱۴۴ .&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۳- ابوحامد محمدبن محمد غزالی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;جواهرالقرآن&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، چاپ پنجم، بیروت، دارالآفاق الجدیدة ، ۱۹۸۳.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۴- ابوحامد محمدبن محمد غزالی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;جواهرالقرآن&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، صص ۳۸- ۳۷.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۵- ابوحامد محمدبن محمد غزالی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;جواهرالقرآن&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، صص ۴۸- ۴۷.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۶- غزالی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;جواهر القرآن&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ص ۱۶۷.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۷- ابوحامد محمدبن محمد غزالی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;جواهرالقرآن&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، صص ۳۷- ۳۶.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۸- &lt;b&gt;&lt;i&gt;مشکاة الأنوار و مصباح الأسرار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، چاپ دمشق- بیروت، ص ۱۲۹.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۱۹- ابن طفیل می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;quot;یکی از متأخرین از روی گفته&amp;zwnj;ی غزالی در آخر کتاب &lt;b&gt;&lt;i&gt;المشکاة&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، به اشتباهی بزرگ دچار شده و به مغاکی ژرف که از آن روی رهایی نیست، فرو افتاده است. این شخص به این نتیجه رسیده است که براساس اعتقاد غزالی، ذات حق تبارک و تعالی را کثرت گونه&amp;zwnj;ای متصور است. &lt;b&gt;تعالی&lt;/b&gt; &lt;b&gt;الله عما یقول الظالمون علواً کبیراً&lt;/b&gt;...هیچ شک نیست که شیخ ابوحامد از جمله کسانی است که به نهایت سعادت رسیده و به قرب حق نائل گشته است ؛ ولی کتابهای او درباره&amp;zwnj;ی مکاشفه که به نااهلان ارزانی نیست، به ما نرسیده است&amp;quot; (ابن طفیل ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;زنده&amp;zwnj;ی بیدار&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ترجمه&amp;zwnj;ی بدیع الزمان فروززانفر، صص ۳۷- ۳۶).&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۰- غزالی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;احیاء علوم الدین&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، جلد ۴ ، ربع المنجیات، کتاب الخوف و الرجاء، فی معنی سوء الخاتمه، صص ۱۷۶- ۱۷۵.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۱- عبدالکریم شهرستانی ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;الملل و النحل&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، تحقیق محمد فتح الله بدران، منشورات الرضی، ص ۴۳.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۲- شهرستانی، ۲۷۹:۱۳۸۶.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۳- عبد الرحمن ابن جوزی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;تلبيس ابليس&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، دارالفکر، بيروت ، ۱۴۲۶، ص ۲.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۴- عبد الرحمن ابن جوزی، &lt;b&gt;&lt;i&gt;تلبيس ابليس&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ص۸۲-۸۳.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۵- &lt;b&gt;&lt;i&gt;تلبيس ابليس&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ص ۵۰- ۴۵.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۶- قطب الدین راوندی ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;الخرائج و الجرائح&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ج۳ ، ص ۱۰۶۱.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۷-یک&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۸- للعلامه الحلی الحسن بن یوسف بن المطهر ، &lt;b&gt;&lt;i&gt;نهج الحق و کشف الصدق&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، تحقیق فرج الله حسینی ، دارالکتاب اللبنانی، مکتبة المدرسة، بیروت ، ۱۹۸۲ م، ص&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۲۹- &lt;b&gt;&lt;i&gt;کشف &amp;rlm;الحق و نهج &amp;rlm;الصدق&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ۵۷.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۰- &lt;b&gt;&lt;i&gt;نهج &amp;rlm;الحق&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ۱۲۵.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۱- &lt;b&gt;&lt;i&gt;أجوبة المسائل المهنائیة&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; ، ۸۹.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۲- &lt;b&gt;&lt;i&gt;تذکره&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ۹ / ۳۶.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;۳۳- &lt;b&gt;&lt;i&gt;کشف &amp;rlm;الحق و نهج &amp;rlm;الصدق&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;، ۱۳۱.&lt;/div&gt;
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 <pubDate>Sun, 22 Apr 2012 07:10:19 +0000</pubDate>
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